महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 906, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इस विषय में शुक्राचार्यने दो गाथाएँ कही हैं। उन्हें ध्यान देकर सुनो। जब अपने और शत्रुपर एक-सी विपत्ति आयी हो, तब निर्बलको सबल शत्रुके साथ मेल करके बड़ी सावधानी और युक्तिसे अपना काम निकालना चाहिये और जब काम हो जाय, तो फिर उसे शत्रुपर विश्वास नहीं करना चाहिये (यह पहली गाथा है)’ ।। १९३ १/२ ।।
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।। १९४ ।।
नित्यं विश्वासयेदन्यान् परेषां तु न विश्वसेत् ।
‘(दूसरी गाथा यों हैं) जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे तथा जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे। अपने प्रति सदा दूसरोंका विश्वास उत्पन्न करे; किंतु स्वयं दूसरोका विश्वास न करे ।। १९४ १/२ ।।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः ।। १९५ ।।
द्रव्याणि संततिश्चैव सर्वं भवति जीवितः ।
‘इसलिये सभी अवस्थाओंमें अपने जीवनकी रक्षा करे; क्योंकि जीवित रहनेपर पुरुषको धन और संतान—सभी मिल जाते हैं ।। १९५ १/२ ।।
संक्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः ।। १९६ ।।
नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः ।
‘संक्षेपमें नीतिशास्त्रका सार यह है कि किसीका भी विश्वास न करना ही उत्तम माना गया है; इसलिये दूसरे लोगोंपर विश्वास न करनेमें ही अपना विशेष हित है ।।
वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ताः शत्रुभिर्दुर्बला अपि ।। १९७ ।।
विश्वस्तास्तेषु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ।
‘जो विश्वास न करके सावधान रहते हैं, वे दुर्बल होनेपर भी शत्रुओंद्वारा मारे नहीं जाते। परंतु जो उनपर विश्वास करते हैं, वे बलवान् होनेपर भी दुर्बल शत्रुओंद्वारा मार डाले जाते हैं ।। १९७ १/२ ।।
त्वद्विधेभ्यो मया ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा ।। १९८ ।।
रक्ष त्वमपि चात्मानं चाण्डालाज्जातिकिल्बिषात् ।
‘बिलाव! तुम जैसे लोगोंसे मुझे सदा अपनी रक्षा करनी चाहिये और तुम भी अपने जन्मजात शत्रु चाण्डालसे अपनेको बचाये रखो’ ।। १९८ १/२ ।।
स तस्य ब्रुवतस्त्वेवं संत्रासाज्जातसाध्वसः ।। १९९ ।।
शाखां हित्वा जवेनाशु मार्जारः प्रययौ ततः ।
चूहेके इस प्रकार कहते समय चाण्डालका नाम सुनते ही बिलाव बहुत डर गया और वह डाली छोड़कर बड़े वेगसे तुरंत दूसरी ओर चला गया ।। १९९ १/२ ।।
ततः शास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बुद्धिसामर्थ्यमात्मनः ।। २०० ।।
विश्राव्य पलितः प्राज्ञो बिलमन्यज्जगाम ह ।