महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राणप्रदानजं त्वत्तो मयि सौहृदमागतम् ।
धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः ।। १८७ ।।
मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः ।
तस्मादेवं पुनः साधो मय्याचरितुमर्हसि ।। १८८ ।।
तुमने मुझे प्राणदान दिया है। इसीसे मुझपर तुम्हारे सौहार्दका प्रभाव पड़ा। मैं धर्मको
जानता हूँ, गुणोंका मूल्य समझता हूँ, विशेषतः तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हूँ, मित्रवत्सल हूँ और
सबसे बड़ी बात यह है कि मैं तुम्हारा भक्त हो गया हूँ; अतः मेरे अच्छे मित्र! तुम फिर मेरे
साथ ऐसा ही बर्ताव करो—मेलजोल बढ़ाकर मेरे साथ घूमो-फिरो ।। १८७-१८८ ।।
त्वया हि वाच्यमानोऽहं जह्यां प्राणान् सबान्धवः ।
विश्रम्भो हि बुधैर्दृष्टो मद्धिधेषु मनस्विषु ।। १८९ ।।
यदि तुम कह दो तो मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारे लिये अपने प्राण भी त्याग दे सकता
हूँ। विद्वानोंने मुझ-जैसे मनस्वी पुरुषोंपर सदा विश्वास ही किया और देखा है ।। १८९ ।।
तदेतद् धर्मतत्त्वज्ञ न त्वं शंकितुमर्हसि ।
अतः धर्मके तत्त्वको जाननेवाले पलित! तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये ।। १८९
१/२ ।।
इति संस्तूयमानोऽपि मार्जारिण स मूषिकः ।। १९० ।।
मनसा भावगम्भीरो मार्जारं वाक्यमब्रवीत् ।
बिलावके द्वारा इस प्रकारकी स्तुति की जानेपर भी चूहा अपने मनसे गम्भीर भाव ही
धारण किये रहा। उसने मार्जारसे पुनः इस प्रकार कहा— ।। १९० १/२ ।।
साधुर्भगवान् श्रुतार्थोऽस्मि प्रीये च न च विश्वसे ।। १९१ ।।
संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्यः पुनस्त्वया ।
न ह्यमित्रे वशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे ।। १९२ ।।
‘भैया! तुम वास्तवमें बड़े साधु हो। यह बात मैंने तुम्हारे विषयमें सुन रखी है। उससे
मुझे प्रसन्नता भी है; परंतु मैं तुमपर विश्वास नहीं कर सकता। तुम मेरी कितनी ही स्तुति
क्यों न करो। मेरे लिये कितनी ही धनराशि क्यों न लुटा दो; परंतु अब मैं तुम्हारे साथ मिल
नहीं सकता। सखे! बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष बिना किसी विशेष कारणके अपने शत्रुके
वशमें नहीं जाते ।। १९१-१९२ ।।
अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निबोधोशनसा कृते ।
शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। १९३ ।।
समाहितश्चरेद् युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ।