महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐश्वर्यधनरत्नानां प्रत्यमित्रे निवर्तताम् ॥ १७९ ॥
दृष्ट्वा हि पुनरावृत्तिर्जीवतामिति नः श्रुतम् ।
‘हमने सुना है कि यदि प्राणी जीवित रहे तो वह शत्रुओं द्वारा अपने अधिकारमें किये हुए ऐश्वर्य, धन और रत्नोंको पुनः वापस ला सकता है। यह बात प्रत्यक्ष देखी भी गयी है॥ १७९ १/२ ॥
न त्वात्मनः सम्प्रदानं धनरत्नवदिष्यते ॥ १८० ॥
आत्मा हि सर्वदा रक्ष्यो दारैरपि धनैरपि ।
‘धन और रत्नोंकी भाँति अपने आपको शत्रुके हाथमें दे देना अभीष्ट नहीं है। धन और स्त्रीके द्वारा अर्थात् उनका त्याग करके भी सर्वदा अपनी रक्षा करनी चाहिये ॥ १८० १/२ ॥
आत्मरक्षणतन्त्राणां सुपरीक्षितकारिणाम् ॥ १८१ ॥
आपदो नोपपद्यन्ते पुरुषाणां स्वदोषजाः ।
‘जो आत्मरक्षामें तत्पर हैं और भलीभाँति परीक्षापूर्वक निर्णय करके काम करते हैं, ऐसे पुरुषोंको अपने ही दोषसे उत्पन्न होनेवाली आपत्तियाँ नहीं प्राप्त होतीं ॥
शत्रून् सम्यग् विजानन्ति दुर्बला ये बलीयसः ॥ १८२ ॥
न तेषां चाल्यते बुद्धिः शास्त्रार्थकृतनिश्चया ।
‘जो दुर्बल प्राणी अपने बलवान् शत्रुओंको अच्छी तरह जानते हैं, उनकी शास्त्रके अर्थज्ञानद्वारा स्थिर हुई बुद्धि कभी विचलित नहीं होती’ ॥ १८२ १/२ ॥
इत्यभिव्यक्तमेवं स पलितेनाभिभर्त्सितः ॥ १८३ ॥
मार्जारो व्रीडितो भूत्वा मूषिकं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८४ ॥
पलितने जब इस प्रकार स्पष्टरूपसे कड़ी फटकार सुनायी, तब बिलावने लज्जित होकर पुनः उस चूहेसे इस प्रकार कहा ॥ १८३-१८४ ॥
लोमश उवाच
सत्यं शपे त्वयाहं वै मित्रद्रोहो विगर्हितः ।
तन्मन्येऽहं तव प्रज्ञां यस्त्वं मम हिते रतः ॥ १८५ ॥
**लोमश बोला—**भाई! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, मित्रसे द्रोह करना तो बड़ी घृणित बात है। तुम जो सदा मेरे हितमें तत्पर रहते हो, इसे मैं तुम्हारी उत्तम बुद्धिका ही परिणाम समझता हूँ ॥ १८५ ॥
उक्तवानर्थतत्त्वेन मया सम्भिन्नदर्शनः ।
न तु मामन्यथा साधो त्वं ग्रहीतुमिहार्हसि ॥ १८६ ॥
श्रेष्ठ पुरुष! तुमने तो यथार्थरूपसे नीति-शास्त्रका सार ही बता दिया। मुझसे तुम्हारा विचार पूरा-पूरा मिलता है। मित्रवर! किंतु तुम मुझे गलत न समझो। मेरा भाव तुमसे विपरीत नहीं है ॥ १८६ ॥