महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘तुम्हारे साथ मुझे देखकर तुम्हारी प्यारी पत्नी और पुत्र जो तुमसे बड़ा प्रेम रखते हैं, हर्षसे उल्लसित हो मुझे कैसे नहीं खा जायँगे? ।। १७१ १/२ ।।
नाहं त्वया समेष्यामि वृत्तो हेतुः समागमे ।। १७२ ।।
शिवं ध्यायस्व मे स्वस्थः सुकृतं स्मरसे यदि ।
‘अब मैं तुमसे नहीं मिलूँगा। हम दोनोंके मिलनका जो उद्देश्य था, वह पूरा हो गया। यदि तुम्हें मेरे शुभ कर्म (उपकार) का स्मरण है तो स्वयं स्वस्थ रहकर मेरे भी कल्याणका चिन्तन करो ।। १७२ १/२ ।।
शत्रोरनार्यभूतस्य क्लिष्टस्य क्षुधितस्य च ।। १७३ ।।
भक्ष्यं मृगयमाणस्य कः प्राज्ञो विषयं व्रजेत् ।
‘जो अपना शत्रु हो, दुष्ट हो, कष्टमें पड़ा हुआ हो, भूखा हो और अपने लिये भोजनकी तलाश कर रहा हो, उसके सामने कोई भी बुद्धिमान् (जो उसका भोज्य है)’ कैसे जा सकता है ।। १७३ १/२ ।।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि दूरादपि तवोद्विजे ।। १७४ ।।
विश्वस्तं वा प्रमत्तं वा एतदेव कृतं भवेत् ।
बलवत्संनिकर्षो हि न कदाचित् प्रशस्यते ।। १७५ ।।
‘तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं चला जाऊँगा। मुझे दूरसे भी तुमसे डर लगता है। मेरा यह पलायन विश्वासपूर्वक हो रहा हो या प्रमादके कारण; इस समय यही मेरा कर्तव्य है। बलवानोंके निकट रहना दुर्बल प्राणीके लिये कभी अच्छा नहीं माना जाता ।।
नाहं त्वया समेष्यामि निवृत्तो भव लोमश ।
यदि त्वं सुकृतं वेत्सि तत् सख्यमनुसारय ।। १७६ ।।
‘लोमश! अब मैं तुमसे कभी नहीं मिलूँगा। तुम लौट जाओ। यदि तुम समझते हो कि मैंने तुम्हारा कोई उपकार किया है तो तुम मेरे प्रति सदा मैत्रीभाव बनाये रखना ।। १७६ ।।
प्रशान्तादपि मे पापाद् भेतव्यं बलिनः सदा ।
यदि स्वार्थं न ते कार्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ।। १७७ ।।
‘जो बलवान् और पापी हो, वह शान्तभावसे रहता हो तो भी मुझे सदा उससे डरना चाहिये। यदि तुम्हें मुझसे कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं करना है तो बताओ मैं तुम्हारा (इसके अतिरिक्त) कौन-सा कार्य करूँ? ।।
कामं सर्वं प्रदास्यामि न त्वाऽऽत्मानं कदाचन ।
आत्मार्थे संततिस्त्याज्या राज्यं रत्नं धनानि च ।। १७८ ।।
अपि सर्वस्वमुत्सृज्य रक्षेदात्मानमात्मना ।
‘मैं तुम्हें इच्छानुसार सब कुछ दे सकता हूँ; परंतु अपने आपको कभी नहीं दूँगा। अपनी रक्षा करनेके लिये तो संतति, राज्य, रत्न और धन—सबका त्याग किया जा सकता है। अपना सर्वस्व त्यागकर भी स्वयं ही अपनी रक्षा करनी चाहिये ।। १७८ १/२ ।।