महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 902, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'तुम्हारे पराक्रमसे मैं प्राण-संकटसे मुक्त हुआ और मेरी शक्तिसे तुम। जब एक दूसरेपर अनुग्रह करनेका काम पूरा हो गया, तब फिर हमें परस्पर मिलनेकी आवश्यकता नहीं॥ १६४ १/२॥ त्वं हि सौम्य कृतार्थोऽद्य निर्वृत्तार्थस्तथा वयम्॥ १६५॥ न तेऽस्त्यद्य मया कृत्यं किंचिदन्यत्र भक्षणात्। 'सौम्य! अब तुम्हारा काम बन गया और मेरा प्रयोजन भी सिद्ध हो गया; अतः अब मुझे खा लेनेके सिवा मेरे द्वारा तुम्हारा दूसरा कोई प्रयोजन सिद्ध होनेवाला नहीं है॥ १६५ १/२॥ अहमन्नं भवान् भोक्ता दुर्बलोऽहं भवान् बली॥ १६६॥ नावयोर्विद्यते संधिवियुक्ते विषमे बले। 'मैं अन्न हूँ और तुम मुझे खानेवाले हो। मैं दुर्बल हूँ और तुम बलवान् हो। इस प्रकार मेरे और तुम्हारे बलमें कोई समानता नहीं है। दोनोंमें बहुत अन्तर है। अतः हम दोनोंमें संधि नहीं हो सकती॥ १६६ १/२॥ स मन्येऽहं तव प्रज्ञां यन्मोक्षात् प्रत्यनन्तरम्॥ १६७॥ भक्ष्यं मृगयसे नूनं सुखोपायेन कर्मणा। 'मैं तुम्हारा विचार जान गया हूँ, निश्चय ही तुम जालसे छूटनेके बादसे ही सहज उपाय तथा प्रयत्नद्वारा आहार ढूँढ़ रहे हो॥ १६७ १/२॥ भक्ष्यार्थं ह्यवबद्धस्त्वं स मुक्तः पीडितः क्षुधा॥ १६८॥ शास्त्रजां मतिमास्थाय नूनं भक्षयिताद्य माम्। जानामि क्षुधितं तु त्वामाहारसमयश्च ते॥ १६९॥ स त्वं मामभिसंधाय भक्ष्यं मृगयसे पुनः। 'आहारकी खोजके लिये ही निकलनेपर तुम इस जालमें फँसे थे और अब इससे छूटकर भूखसे पीड़ित हो रहे हो। निश्चय ही शास्त्रीय बुद्धिका सहारा लेकर अब तुम मुझे खा जाओगे। मैं जानता हूँ कि तुम भूखे हो और यह तुम्हारे भोजनका समय है; अतः तुम पुनः मुझसे संधि करके अपने लिये भोजनकी तलाश करते हो॥ १६८-१६९ १/२॥ त्वं चापि पुत्रदारस्थो यत् संधिं सृजसे मयि॥ १७०॥ शुश्रूषां यतसे कर्तुं सखे मम न तत् क्षमम्। 'सखे! तुम जो बाल-बच्चोंके बीचमें बैठकर मुझपर संधिका भाव दिखा रहे हो तथा मेरी सेवा करनेका यत्न करते हो, वह सब मेरे योग्य नहीं है॥ १७० १/२॥ त्वया मां सहितं दृष्ट्वा प्रिया भार्या सुताश्च ते॥ १७१॥ कस्मात् ते मां न खादेयुर्हृष्टाः प्रणयिनस्त्वयि।