भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 901

‘समय कारणके स्वरूपको बदल देता है; और स्वार्थ उस समयका अनुसरण करता रहता है। विद्वान् पुरुष उस स्वार्थको समझता है और साधारण लोग विद्वान् पुरुषके ही पीछे चलते हैं। तात्पर्य यह है कि मैं विद्वान् हूँ; इसलिये तुम्हारे स्वार्थको अच्छी तरह समझता हूँ; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।। १५७-१५८ ।।

अकाले हि समर्थस्य स्नेहहेतुरयं तव ।
तस्मान्नाहं चले स्वार्थात् सुस्थिरः संधिविग्रहे ।। १५९ ।।

‘तुम शक्तिशाली हो तो भी जो बेसमय मुझपर इतना स्नेह दिखा रहे हो, इसका यह स्वार्थ ही कारण है; अतः मैं भी अपने स्वार्थसे विचलित नहीं हो सकता। संधि और विग्रहके विषयमें मेरा विचार सुनिश्चित है ।। १५९ ।।

अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति क्षणे क्षणे ।
अद्यैव हि रिपुर्भूत्वा पुनरद्यैव मे सुहृत् ।। १६० ।।
पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम् ।

‘मित्रता और शत्रुताके रूप तो बादलोंके समान क्षण-क्षणमें बदलते रहते हैं। आज ही तुम मेरे शत्रु होकर फिर आज ही मेरे मित्र हो सकते हो और उसके बाद आज ही पुनः शत्रु भी बन सकते हो। देखो, यह स्वार्थका सम्बन्ध कितना चंचल है? ।। १६० १/२ ।।

आसीन्मैत्री तु तावन्नौ यावद्धेतुरभूत् पुरा ।। १६१ ।।
सा गता सह तेनैव कालयुक्तेन हेतुना ।

‘पहले जब उपयुक्त कारण था, तब हम दोनोंमें मैत्री हो गयी थी, किंतु कालने जिसे उपस्थित कर दिया था उस कारणके निवृत्त होनेके साथ ही वह मैत्री भी चली गयी ।। १६१ १/२ ।।

त्वं हि मे जातितः शत्रुः सामर्थ्यान्मित्रतां गतः ।। १६२ ।।
तत् कृत्यमभिनिर्वर्त्य प्रकृतिः शत्रुतां गता ।

‘तुम जातिसे ही मेरे शत्रु हो, किंतु विशेष प्रयोजनसे मित्र बन गये थे। वह प्रयोजन सिद्ध कर लेनेके पश्चात् तुम्हारी प्रकृति फिर सहज शत्रुभावको प्राप्त हो गयी ।। १६२ १/२ ।।

सोऽहमेवं प्रणीतानि ज्ञात्वा शास्त्राणि तत्त्वतः ।। १६३ ।।
प्रविशेयं कथं पाशं त्वत्कृते तद् वदस्व मे ।

‘मैं इस प्रकार शुक्र आदि आचार्योंके बनाये हुए नीतिशास्त्रकी बातोंको ठीक-ठीक जानकर भी तुम्हारे लिये उस जालके भीतर कैसे प्रवेश कर सकता था? यह तुम्हीं मुझे बताओ ।। १६३ १/२ ।।

त्वद्वीर्येण प्रमुक्तोऽहं मद्वीर्येण तथा भवान् ।। १६४ ।।
अन्योन्यानुग्रहे वृत्ते नास्ति भूयः समागमः ।