महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 900, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारणात् प्रियतामेति द्वेष्यो भवति कारणात् ।। १५१ ।। 'इसके सिवा तुम जो यह मीठी-मीठी बात कह रहे हो कि 'आज तुम मुझे बड़े प्रिय लगते हो' इसका भी कारण है, मेरे मित्र! वह सब मैं विस्तारके साथ बताता हूँ, सुनो। मनुष्य कारणसे ही प्रेमपात्र और कारणसे ही द्वेषका पात्र बनता है ।। १५०-१५१ ।।
अर्थार्थी जीवलोकोऽयं न कश्चित् कस्यचित् प्रियः । सख्यं सोदर्ययोर्भ्रात्रोर्दम्पत्योर्वा परस्परम् ।। १५२ ।। कस्यचिन्नाभिजानामि प्रीतिं निष्कारणामिह । 'यह जीव-जगत् स्वार्थका ही साथी है। कोई किसीका प्रिय नहीं है। दो सगे भाइयों तथा पति और पत्नीमें भी जो परस्पर प्रेम होता है, वह भी स्वार्थवश ही है। इस जगत्में किसीके भी प्रेमको मैं निष्कारण (स्वार्थरहित) नहीं समझता ।। १५२ १/२ ।।
यद्यपि भ्रातरः क्रुद्धा भार्या वा कारणान्तरे ।। १५३ ।। स्वभावतस्ते प्रीयन्ते नेतरः प्रीयते जनः । 'कभी-कभी किसी स्वार्थको लेकर भाई भी कुपित हो जाते हैं अथवा पत्नी भी रूठ जाती है। यद्यपि वे स्वभावतः एक-दूसरेसे जैसा प्रेम करते हैं, ऐसा प्रेम दूसरे लोग नहीं करते हैं ।। १५३ १/२ ।।
प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः ।। १५४ ।। मन्त्रहोमजपैरन्यः कार्यार्थं प्रीयते जनः । 'कोई दान देनेसे प्रिय होता है, कोई प्रिय वचन बोलनेसे प्रीतिपात्र बनता है और कोई कार्यसिद्धिके लिये मन्त्र, होम एवं जप करनेसे प्रेमका भाजन बन जाता है ।। १५४ १/२ ।।
उत्पन्ना कारणे प्रीतिरासीन्नौ कारणान्तरे ।। १५५ ।। प्रध्वस्ते कारणस्थाने सा प्रीतिर्विनिवर्तते । 'किसी कारण (स्वार्थ) को लेकर उत्पन्न होनेवाली प्रीति जबतक वह कारण रहता है, तबतक बनी रहती है। उस कारणका स्थान नष्ट हो जानेपर उसको लेकर की हुई प्रीति भी स्वतः निवृत्त हो जाती है ।। १५५ १/२ ।।
किं नु तत् कारणं मन्ये येनाहं भवतः प्रियः ।। १५६ ।। अन्यत्राभ्यवहारार्थं तत्रापि च बुधा वयम् । 'अब मेरे शरीरको खा जानेके सिवा दूसरा कौन-सा ऐसा कारण रह गया है, जिससे मैं यह मान लूँ कि वास्तवमें तुम्हारा मुझपर प्रेम है। इस समय जो तुम्हारा स्वार्थ है, उसे मैं अच्छी तरह समझता हूँ ।। १५६ १/२ ।।
कालो हेतुं विकुरुते स्वार्थस्तमनुवर्तते ।। १५७ ।। स्वार्थं प्राज्ञोऽभिजानाति प्राज्ञं लोकोऽनुवर्तते । न त्वीदृशं त्वया वाच्यं विदुषि स्वार्थपण्डिते ।। १५८ ।।