महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 899, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।। १४४ ।। विश्वासाद् भयमुत्पन्नमपि मूलानि कृन्तति । ‘जो विश्वासपात्र न हो, उसपर कभी विश्वास न करे और जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मनुष्यका मूलोच्छेद कर डालता है ।। १४४ १/२ ।।
अर्थयुक्त्या हि जायन्ते पिता माता सुतस्तथा ।। १४५ ।। मातुला भागिनेयाश्च तथा सम्बन्धिबान्धवाः । ‘माता-पिता, पुत्र, मामा, भांजे, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव-इन सबमें स्वार्थके सम्बन्धसे ही स्नेह होता है ।।
पुत्रं हि मातापितरौ त्यजतः पतितं प्रियम् ।। १४६ ।। लोको रक्षति चात्मानं पश्य स्वार्थस्य सारताम् । ‘अपना प्यारा पुत्र भी यदि पतित हो जाता है तो माँ-बाप उसे त्याग देते हैं और सब लोग सदा अपनी ही रक्षा करना चाहते हैं। अतः देख लो, इस जगत्में स्वार्थ ही सार है’ ।। १४६ १/२ ।।
सामान्या निष्कृतिः प्राज्ञ यो मोक्षात् प्रत्यनन्तरम् ।। १४७ ।। कृतं मृगयसे शत्रुं सुखोपायमसंशयम् । ‘बुद्धिमान् लोमश! जो तुम आज जालके बन्धनसे छूटनेके बाद ही कृतज्ञतावश मुझ अपने शत्रुको सुख पहुँचानेका असंदिग्ध उपाय ढूँढ़ने लगे हो, इसका क्या कारण है? जहाँतक उपकारका बदला चुकानेका प्रश्न है, वहाँतक तो हमारी-तुम्हारी समान स्थिति है। यदि मैंने तुम्हें संकटसे छुड़ाया है, तो तुमने भी तो मुझे वैसी ही विपत्तिसे बचाया है; फिर मैं तो कुछ करता नहीं, तुम्हीं क्यों उपकारका बदला देनेके लिये उतावले हो उठे हो? ।। १४७ १/२ ।।
अस्मिन् निलय एव त्वं न्यग्रोधादवतारितः ।। १४८ ।। पूर्वं निविष्टमुन्माथं चपलत्वान्न बुद्धवान् । ‘तुम इसी स्थानपर बरगदसे उतरे थे और पहलेसे ही यहाँ जाल बिछा हुआ था; परंतु तुमने चपलताके कारण उधर ध्यान नहीं दिया और फँस गये ।। १४८ १/२ ।।
आत्मनश्चपलो नास्ति कुतोऽन्येषां भविष्यति ।। १४९ ।। तस्मात् सर्वाणि कार्याणि चपलो हन्त्यसंशयम् । ‘चपल प्राणी जब अपने ही लिये कल्याणकारी नहीं होता तो वह दूसरेकी भलाई क्या करेगा? अतः यह निश्चित है कि चपल पुरुष सब काम चौपट कर देता है ।। १४९ १/२ ।।
ब्रवीषि मधुरं यच्च प्रियो मेऽद्य भवानिति ।। १५० ।। तन्मित्र कारणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु ।