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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

प्राणप्रदानजं त्वत्तो मयि सौहृदमागतम् ।

धर्मज्ञोऽस्मि गुणज्ञोऽस्मि कृतज्ञोऽस्मि विशेषतः ।। १८७ ।।

मित्रेषु वत्सलश्चास्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः ।

तस्मादेवं पुनः साधो मय्याचरितुमर्हसि ।। १८८ ।।

तुमने मुझे प्राणदान दिया है। इसीसे मुझपर तुम्हारे सौहार्दका प्रभाव पड़ा। मैं धर्मको

जानता हूँ, गुणोंका मूल्य समझता हूँ, विशेषतः तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हूँ, मित्रवत्सल हूँ और

सबसे बड़ी बात यह है कि मैं तुम्हारा भक्त हो गया हूँ; अतः मेरे अच्छे मित्र! तुम फिर मेरे

साथ ऐसा ही बर्ताव करो—मेलजोल बढ़ाकर मेरे साथ घूमो-फिरो ।। १८७-१८८ ।।

त्वया हि वाच्यमानोऽहं जह्यां प्राणान् सबान्धवः ।

विश्रम्भो हि बुधैर्दृष्टो मद्धिधेषु मनस्विषु ।। १८९ ।।

यदि तुम कह दो तो मैं बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारे लिये अपने प्राण भी त्याग दे सकता

हूँ। विद्वानोंने मुझ-जैसे मनस्वी पुरुषोंपर सदा विश्वास ही किया और देखा है ।। १८९ ।।

तदेतद् धर्मतत्त्वज्ञ न त्वं शंकितुमर्हसि ।

अतः धर्मके तत्त्वको जाननेवाले पलित! तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये ।। १८९

१/२ ।।

इति संस्तूयमानोऽपि मार्जारिण स मूषिकः ।। १९० ।।

मनसा भावगम्भीरो मार्जारं वाक्यमब्रवीत् ।

बिलावके द्वारा इस प्रकारकी स्तुति की जानेपर भी चूहा अपने मनसे गम्भीर भाव ही

धारण किये रहा। उसने मार्जारसे पुनः इस प्रकार कहा— ।। १९० १/२ ।।

साधुर्भगवान् श्रुतार्थोऽस्मि प्रीये च न च विश्वसे ।। १९१ ।।

संस्तवैर्वा धनौघैर्वा नाहं शक्यः पुनस्त्वया ।

न ह्यमित्रे वशं यान्ति प्राज्ञा निष्कारणं सखे ।। १९२ ।।

‘भैया! तुम वास्तवमें बड़े साधु हो। यह बात मैंने तुम्हारे विषयमें सुन रखी है। उससे

मुझे प्रसन्नता भी है; परंतु मैं तुमपर विश्वास नहीं कर सकता। तुम मेरी कितनी ही स्तुति

क्यों न करो। मेरे लिये कितनी ही धनराशि क्यों न लुटा दो; परंतु अब मैं तुम्हारे साथ मिल

नहीं सकता। सखे! बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष बिना किसी विशेष कारणके अपने शत्रुके

वशमें नहीं जाते ।। १९१-१९२ ।।

अस्मिन्नर्थे च गाथे द्वे निबोधोशनसा कृते ।

शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। १९३ ।।

समाहितश्चरेद् युक्त्या कृतार्थश्च न विश्वसेत् ।

‘इस विषय में शुक्राचार्यने दो गाथाएँ कही हैं। उन्हें ध्यान देकर सुनो। जब अपने और शत्रुपर एक-सी विपत्ति आयी हो, तब निर्बलको सबल शत्रुके साथ मेल करके बड़ी सावधानी और युक्तिसे अपना काम निकालना चाहिये और जब काम हो जाय, तो फिर उसे शत्रुपर विश्वास नहीं करना चाहिये (यह पहली गाथा है)’ ।। १९३ १/२ ।।
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।। १९४ ।।
नित्यं विश्वासयेदन्यान् परेषां तु न विश्वसेत् ।
‘(दूसरी गाथा यों हैं) जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे तथा जो विश्वासपात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे। अपने प्रति सदा दूसरोंका विश्वास उत्पन्न करे; किंतु स्वयं दूसरोका विश्वास न करे ।। १९४ १/२ ।।
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षेज्जीवितमात्मनः ।। १९५ ।।
द्रव्याणि संततिश्चैव सर्वं भवति जीवितः ।
‘इसलिये सभी अवस्थाओंमें अपने जीवनकी रक्षा करे; क्योंकि जीवित रहनेपर पुरुषको धन और संतान—सभी मिल जाते हैं ।। १९५ १/२ ।।
संक्षेपो नीतिशास्त्राणामविश्वासः परो मतः ।। १९६ ।।
नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः ।
‘संक्षेपमें नीतिशास्त्रका सार यह है कि किसीका भी विश्वास न करना ही उत्तम माना गया है; इसलिये दूसरे लोगोंपर विश्वास न करनेमें ही अपना विशेष हित है ।।
वध्यन्ते न ह्यविश्वस्ताः शत्रुभिर्दुर्बला अपि ।। १९७ ।।
विश्वस्तास्तेषु वध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ।
‘जो विश्वास न करके सावधान रहते हैं, वे दुर्बल होनेपर भी शत्रुओंद्वारा मारे नहीं जाते। परंतु जो उनपर विश्वास करते हैं, वे बलवान् होनेपर भी दुर्बल शत्रुओंद्वारा मार डाले जाते हैं ।। १९७ १/२ ।।
त्वद्विधेभ्यो मया ह्यात्मा रक्ष्यो मार्जार सर्वदा ।। १९८ ।।
रक्ष त्वमपि चात्मानं चाण्डालाज्जातिकिल्बिषात् ।
‘बिलाव! तुम जैसे लोगोंसे मुझे सदा अपनी रक्षा करनी चाहिये और तुम भी अपने जन्मजात शत्रु चाण्डालसे अपनेको बचाये रखो’ ।। १९८ १/२ ।।
स तस्य ब्रुवतस्त्वेवं संत्रासाज्जातसाध्वसः ।। १९९ ।।
शाखां हित्वा जवेनाशु मार्जारः प्रययौ ततः ।
चूहेके इस प्रकार कहते समय चाण्डालका नाम सुनते ही बिलाव बहुत डर गया और वह डाली छोड़कर बड़े वेगसे तुरंत दूसरी ओर चला गया ।। १९९ १/२ ।।
ततः शास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बुद्धिसामर्थ्यमात्मनः ।। २०० ।।
विश्राव्य पलितः प्राज्ञो बिलमन्यज्जगाम ह ।

तदनन्तर नीतिशास्त्रके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला बुद्धिमान् पलित अपने बौद्धिक शक्तिका परिचय दे दूसरे बिलमें चला गया ।। २०० १/२ ।। एवं प्रज्ञावता बुद्ध्या दुर्बलेन महाबलाः ।। २०१ ।। एकेन बहवोऽमित्राः पलितेनाभिसंधिताः । अरिणापि समर्थेन संधिं कुर्वीत पण्डितः ।। २०२ ।। मूषिकश्च बिडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रयात् । इस प्रकार दुर्बल और अकेला होनेपर भी बुद्धिमान् पलित चूहेने अपने बुद्धि-बलसे बहुतेरे प्रबल शत्रुओंको परास्त कर दिया; अतः आपत्तिके समय विद्वान् पुरुष बलवान् शत्रुके साथ भी संधि कर ले। देखो, चूहे और बिलाव दोनों एक दूसरेका आश्रय लेकर विपत्तिसे छुटकारा पा गये थे ।। २०१-२०२ १/२ ।। इत्येवं क्षत्रधर्मस्य मया मार्गो निदर्शितः ।। २०३ ।। विस्तरेण महाराज संक्षेपमपि मे शृणु । महाराज! इस दृष्टान्तसे मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक क्षात्र-धर्मका मार्ग दिखाया है। अब संक्षेपमें कुछ मेरी बात सुनो ।। २०३ १/२ ।। अन्योन्यकृतवैरौ तु चक्रतुः प्रीतिमुत्तमाम् ।। २०४ ।। अन्योन्यमभिसंधातुं सम्बभूव तयोर्मतिः । चूहे और बिलाव एक दूसरेसे वैर रखनेवाले प्राणी हैं तो भी उन्होंने संकटके समय एक दूसरेसे उत्तम प्रीति कर ली। उनमें परस्पर संधि कर लेनेका विचार पैदा हो गया ।। २०४ १/२ ।। तत्र प्राज्ञोऽभिसंधत्ते सम्यग् बुद्धिसमाश्रयात् ।। २०५ ।। अभिसंधीयते प्राज्ञः प्रमादादपि वा बुधैः । ऐसे अवसरोंपर बुद्धिमान् पुरुष उत्तम बुद्धिका आश्रय ले संधि करके शत्रुको परास्त कर देता है। इसी तरह विद्वान् पुरुष भी यदि असावधान रहे तो उसे दूसरे बुद्धिमान् पुरुष परास्त कर देते हैं ।। २०५ १/२ ।। तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन् ।। २०६ ।। न ह्यप्रमत्तश्चलति चलितो वा विनश्यति । इसलिये मनुष्य भयभीत होकर भी निडरके समान और किसीपर विश्वास न करते हुए भी विश्वास करनेवालेके समान बर्ताव करे, उसे कभी असावधान होकर नहीं चलना चाहिये। यदि चलता है तो नष्ट हो जाता है ।। २०६ १/२ ।। कालेन रिपुणा संधिः काले मित्रेण विग्रहः ।। २०७ ।। कार्य इत्येव संधिज्ञाः प्राहुर्नित्यं नराधिप ।

नरेश्वर! समयानुसार शत्रुके साथ भी संधि और मित्रके साथ भी युद्ध करना उचित है। संधिके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् पुरुष इसी बातको सदा कहते हैं॥ २०७ १/२॥

एतज्ज्ञात्वा महाराज शास्त्रार्थमभिगम्य च॥ २०८॥
अभियुक्तोऽप्रमत्तश्च प्राग्भयाद् भीतवच्चरेत्।
महाराज! ऐसा जानकर नीतिशास्त्रके तात्पर्यको हृदयंगम करके उद्योगशील एवं सावधान रहकर भय आनेसे पहले भयभीतके समान आचरण करना चाहिये॥

भीतवत् संनिधिः कार्यः प्रतिसंधिस्तथैव च॥ २०९॥
भयादुत्पद्यते बुद्धिरप्रमत्ताभियोगजा।
बलवान् शत्रुके समीप डरे हुएके समान उपस्थित होना चाहिये। उसी तरह उसके साथ संधि भी कर लेनी चाहिये। सावधान पुरुषके उद्योगशील बने रहनेसे स्वयं ही संकटसे बचानेवाली बुद्धि उत्पन्न होती है॥ २०९ १/२॥

न भयं विद्यते राजन् भीतस्यानागते भये॥ २१०॥
अभीतस्य च विश्रम्भात् सुमहज्जायते भयम्।
राजन्! जो पुरुष भय आनेके पहलेसे ही उसकी ओरसे सशंक रहता है, उसके सामने प्रायः भयका अवसर ही नहीं आता है; परंतु जो निःशंक होकर दूसरोंपर विश्वास कर लेता है, उसे सहसा बड़े भारी भयका सामना करना पड़ता है॥ २१० १/२॥

अभीश्चरति यो नित्यं मन्त्रोऽदेयः कथंचन॥ २११॥
अविज्ञानाद्धि विज्ञातो गच्छेदास्पददर्शिषु।
जो मनुष्य अपनेको बुद्धिमान् मानकर निर्भय विचरता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिये; क्योंकि वह दूसरेकी सलाह सुनता ही नहीं है। भयको न जाननेकी अपेक्षा उसे जाननेवाला ठीक है; क्योंकि वह उससे बचनेके लिये उपाय जाननेकी इच्छा से परिणामदर्शी पुरुषोंके पास जाता है॥ २११ १/२॥

तस्मादभीतवद् भीतो विश्वस्तवदविश्वसन्॥ २१२॥
कार्याणां गुरुतां प्राप्य नानृतं किंचिदाचरेत्।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको डरते हुए भी निर्भयके समान रहना चाहिये तथा भीतरसे विश्वास न करते हुए भी ऊपरसे विश्वासी पुरुषकी भाँति बर्ताव करना चाहिये। कार्योंकी कठिनता देखकर कभी कोई मिथ्या आचरण नहीं करना चाहिये॥ २१२ १/२॥

एवमेतन्मया प्रोक्तमितिहासं युधिष्ठिर॥ २१३॥
श्रुत्वा त्वं सुहृदां मध्ये यथावत् समुपाचर।
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हारे सामने नीतिकी बात बतानेके लिये चूहे तथा बिलावके इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया है। इसे सुनकर तुम अपने सुहृदोंके बीचमें यथायोग्य बर्ताव करो॥ २१३ १/२॥

उपलभ्य मतिं चाग्रामरिमित्रान्तरं तथा ।। २१४ ।। संधिविग्रहकालौ च मोक्षोपायस्तथैव च । श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर शत्रु और मित्रके भेद, संधि और विग्रह के अवसरका तथा विपत्तिसे छूटनेके उपायका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।। २१४ १/२ ।। शत्रुसाधारणे कृत्ये कृत्वा संधिं बलीयसा ।। २१५ ।। समागतश्चरेद् युक्त्या कृतार्थो न च विश्वसेत् । अपने और शत्रुके प्रयोजन यदि समान हों तो बलवान् शत्रुके साथ संधि करके उससे मिलकर युक्तिपूर्वक अपना काम बनावे और कार्य पूरा हो जानेपर फिर कभी उसका विश्वास न करे ।। २१५ ।। अविरुद्धं त्रिवर्गेण नीतिमेतां महीपते ।। २१६ ।। अभ्युत्तिष्ठ श्रुतादस्माद् भूयः संरक्षयन् प्रजाः । पृथ्वीनाथ! यह नीति धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल है। तुम इसका आश्रय लो। मुझसे सुने हुए इस उपदेशके अनुसार कर्तव्यपालनमें तत्पर हो सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करते हुए अपनी उन्नतिके लिये उठकर खड़े हो जाओ ।। ब्राह्मणैश्चापि ते सार्धं यात्रा भवतु पाण्डव ।। २१७ ।। ब्राह्मणा वै परं श्रेयो दिवि चेह च भारत । पाण्डुनन्दन! तुम्हारी जीवनयात्रा ब्राह्मणोंके साथ होनी चाहिये। भरतनन्दन! ब्राह्मणलोग इहलोक और परलोकमें भी परम कल्याणकारी होते हैं ।। २१७ १/२ ।। एते धर्मस्य वेत्तारः कृतज्ञाः सततं प्रभो ।। २१८ ।। पूजिताः शुभकर्तारः पूजयेत् तान् नराधिप । प्रभो! नरेश्वर! ये ब्राह्मण धर्मज्ञ होनेके साथ ही सदा कृतज्ञ होते हैं। सम्मानित होनेपर शुभकारक एवं शुभचिन्तक होते हैं; अतः इनका सदा आदर-सम्मान करना चाहिये ।। २१८ १/२ ।। राज्यं श्रेयः परं राजन् यशः कीर्तिं च लप्स्यसे ।। २१९ ।। कुलस्य संततिं चैव यथान्यायं यथाक्रमम् ।। २२० ।। राजन्! तुम ब्राह्मणोंके यथोचित सत्कारसे क्रमशः राज्य, परम कल्याण, यश, कीर्ति तथा वंशपरम्पराको बनाये रखनेवाली संतति सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।। द्वयोरिमं भारत संधिविग्रहं सुभाषितं बुद्धिविशेषकारकम् । यथा त्ववेक्ष्य क्षितिपेन सर्वदा निषेवितव्यं नृप शत्रुमण्डले ।। २२१ ।। भरतनन्दन! नरेश्वर! चूहे और बिलावका जो यह सुन्दर उपाख्यान कहा गया है, यह संधि और विग्रहका ज्ञान तथा विशेष बुद्धि उत्पन्न करनेवाला है। भूपालको सदा इसीके

अनुसार दृष्टि रखकर शत्रुमण्डलके साथ यथोचित व्यवहार करना चाहिये ।। २२१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि मार्जारमूषिकसंवादे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें चूहे और बिलावका संवादविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३८ ।।

शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद

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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

शत्रुसे सदा सावधान रहनेके विषयमें राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़ियाका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

उक्तो मन्त्रो महाबाहो विश्वासो नास्ति शत्रुषु ।
कथं हि राजा वर्तेत यदि सर्वत्र नाश्वसेत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाबाहो! आपने यह सलाह दी है कि शत्रुओंपर विश्वास नहीं करना चाहिये। साथ ही यह कहा है कि कहीं भी विश्वास करना उचित नहीं है, परंतु यदि राजा सर्वत्र अविश्वास ही करे तो किस प्रकार वह राज्यसम्बन्धी व्यवहार चला सकता है? ॥

विश्वासाद्धि परं राजन् राज्ञामुत्पद्यते भयम् ।
कथं हि नाश्वसन् राजा शत्रून् जयति पार्थिवः ॥ २ ॥
राजन्! यदि विश्वाससे राजाओंपर महान् भय आता है तो सर्वत्र अविश्वास करनेवाला भूपाल अपने शत्रुओंपर विजय कैसे पा सकता है? ॥ २ ॥

एतन्मे संशयं छिन्धि मतिर्मे सम्प्रमुह्यति ।
अविश्वासकथामेतामुपश्रुत्य पितामह ॥ ३ ॥
पितामह! आपकी यह अविश्वास-कथा सुनकर तो मेरी बुद्धिपर मोह छा गया। कृपया आप मेरे इस संशयका निवारण कीजिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्व राजन् यद् वृत्तं ब्रह्मदत्तनिवेशने ।
पूजन्या सह संवादं ब्रह्मदत्तस्य भूपतेः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! राजा ब्रह्मदत्तके घरमें पूजनी चिड़ियाके साथ जो उनका संवाद हुआ था, उसे ही तुम्हारे समाधानके लिये उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥

काम्पिल्ये ब्रह्मदत्तस्य त्वन्तःपुरनिवासिनी ।
पूजनी नाम शकुनिर्दीर्घकालं सहोषिता ॥ ५ ॥
काम्पिल्य नगरमें ब्रह्मदत्त नामके एक राजा राज्य करते थे। उनके अन्तःपुरमें पूजनी नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया निवास करती थी। वह दीर्घकालतक उनके साथ रही थी ॥ ५ ॥

रुतज्ञा सर्वभूतानां यथा वै जीवजीवकः ।
सर्वज्ञा सर्वतत्त्वज्ञा तिर्यग्योनिं गतापि सा ॥ ६ ॥

वह चिड़िया 'जीवजीवक' नामक विशेष पक्षीके समान समस्त प्राणियोंकी बोली समझती थी तथा तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होनेपर भी सर्वज्ञ एवं सम्पूर्ण तत्त्वोंको जाननेवाली थी ॥ ६ ॥

अभिप्रजाता सा तत्र पुत्रमेकं सुवर्चसम् ।
समकालं च राज्ञोऽपि देव्यां पुत्रो व्यजायत ॥ ७ ॥
एक दिन उसने रनिवासमें ही एक बच्चा दिया, जो बड़ा तेजस्वी था; उसी दिन उसके साथ ही राजाकी रानीके गर्भसे भी एक बालक उत्पन्न हुआ ॥ ७ ॥

तयोरर्थे कृतज्ञा सा खेचरी पूजनी सदा ।
समुद्रतीरं सा गत्वा आजहार फलद्वयम् ॥ ८ ॥
आकाशमें विचरनेवाली वह कृतज्ञ पूजनी चिड़िया प्रतिदिन समुद्रतटपर जाकर वहाँसे उन दोनों बच्चोंके लिये दो फल ले आया करती थी ॥ ८ ॥

पुष्ट्यर्थं च स्वपुत्रस्य राजपुत्रस्य चैव ह ।
फलमेकं सुतायादाद् राजपुत्राय चापरम् ॥ ९ ॥
वह अपने बच्चेकी पुष्टिके लिये एक फल उसे देती तथा राजाके बेटेकी पुष्टिके लिये दूसरा फल उस राजकुमारको अर्पित कर देती थी ॥ ९ ॥

अमृतास्वादसदृशं बलतेजोऽभिवर्धनम् ।
आदायादाय सैवाशु तयोः प्रादात् पुनः पुनः ॥ १० ॥
पूजनीका लाया हुआ वह फल अमृतके समान स्वादिष्ट और बल तथा तेजकी वृद्धि करनेवाला होता था। वह बारंबार उस फलको ला-लाकर शीघ्रतापूर्वक उन दोनोंको दिया करती थी ॥ १० ॥

ततोऽगच्छत् परां वृद्धिं राजपुत्रः फलाशनात् ।
ततः स धात्र्या कक्षेण उह्यमानो नृपात्मजः ॥ ११ ॥
ददर्श तं पक्षिसुतं बाल्यादागत्य बालकः ।
ततो बाल्याच्च यत्नेन तेनाक्रीडत पक्षिणा ॥ १२ ॥
राजकुमार उस फलको खा-खाकर बड़ा हृष्ट-पुष्ट हो गया। एक दिन धाय उस राजपुत्रको गोदमें लिये घूम रही थी। वह बालक ही तो ठहरा, बाल-स्वभाववश आकर उसने उस चिड़ियाके बच्चेको देखा और उसके साथ यत्नपूर्वक वह खेलने लगा ॥ ११-१२ ॥

शून्ये च तमुपादाय पक्षिणं समजातकम् ।
हत्वा ततः स राजेन्द्र धात्र्या हस्तमुपागतः ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! अपने साथ ही पैदा हुए उस पक्षीको सूने स्थानमें ले जाकर राजकुमारने मार डाला और मारकर वह धायकी गोदमें जा बैठा ॥ १३ ॥

अथ सा पूजनी राजन्नागमत् फलहारिणी ।

अपश्यन्निहतं पुत्रं तेन बालेन भूतले ॥ १४ ॥ राजन्! तदनन्तर जब पूजनी फल लेकर लौटी तो उसने देखा कि राजकुमारने उसके बच्चेको मार डाला है और वह धरतीपर पड़ा है ॥ १४ ॥ बाष्पपूर्णमुखी दीना दृष्ट्वा तं रुदती सुतम् । पूजनी दुःखसंतप्ता रुदती वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥ अपने बच्चेकी ऐसी दुर्गति देखकर पूजनीके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वह दुःखसे संतप्त हो रोती हुई इस प्रकार कहने लगी— ॥ १५ ॥ क्षत्रिये संगतं नास्ति न प्रीतिर्न च सौहृदम् । कारणात् सान्त्वयन्त्येते कृतार्थाः संत्यजन्ति च ॥ १६ ॥ ‘क्षत्रियमें संगति निभानेकी भावना नहीं होती। उसमें न प्रेम होता है, न सौहार्द। ये किसी हेतु या स्वार्थसे ही दूसरोंको सान्त्वना देते हैं। जब इनका काम निकल जाता है, तब ये आश्रित व्यक्तिको त्याग देते हैं ॥ १६ ॥ क्षत्रियेषु न विश्वासः कार्यः सर्वापकारिषु । अपकृत्यापि सततं सान्त्वयन्ति निरर्थकम् ॥ १७ ॥ ‘क्षत्रिय सबकी बुराई ही करते हैं। इनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। ये दूसरोंका अपकार करके भी सदा उसे व्यर्थ सान्त्वना दिया करते हैं ॥ अहमस्य करोम्यद्य सदृशीं वैरयातनाम् । कृतघ्नस्य नृशंसस्य भृशं विश्वासघातिनः ॥ १८ ॥ ‘देखो तो सही, यह राजकुमार कैसा कृतघ्न, अत्यन्त क्रूर और विश्वासघाती है! अच्छा, आज मैं इससे इस वैरका बदला लेकर ही रहूँगी ॥ १८ ॥ सहसंजातवृद्धस्य तथैव सहभोजिनः । शरणागतस्य च वधस्त्रिविधं ह्येव पातकम् ॥ १९ ॥ ‘जो साथ ही पैदा हुआ और साथ ही पाला-पोसा गया हो, साथ ही भोजन करता हो और शरणमें आकर रहता हो, ऐसे व्यक्तिका वध करनेसे उपर्युक्त तीन प्रकारका पातक लगता है’ ॥ १९ ॥ इत्युक्त्वा चरणाभ्यां तु नेत्रे नृपसुतस्य सा । भित्त्वा स्वस्था तत इदं पूजनी वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥ ऐसा कहकर पूजनीने अपने दोनों पंजोंसे राजकुमारकी दोनों आँखें फोड़ डालीं। फोड़कर वह आकाशमें स्थिर हो गयी और इस प्रकार बोली— ॥ इच्छयेह कृतं पापं सद्यस्तं चोपसर्पति । कृतं प्रतिकृतं येषां न नश्यति शुभाशुभम् ॥ २१ ॥ ‘इस जगत्में स्वेच्छासे जो पाप किया जाता है, उसका फल तत्काल ही कर्ताको मिल जाता है। जिनके पापका बदला मिल जाता है, उनके पूर्वकृत शुभाशुभ कर्म नष्ट नहीं होते

हैं ॥ २१ ॥
पापं कर्म कृतं किंचिद् यदि तस्मिन् न दृश्यते ।
नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥ २२ ॥
‘राजन्! यदि यहाँ किये हुए पापकर्मका कोई फल कर्ताको मिलता न दिखायी दे तो यह समझना चाहिये कि उसके पुत्रों, पोतों और नातियोंको उसका फल भोगना पड़ेगा’ ॥ २२ ॥
ब्रह्मदत्तः सुतं दृष्ट्वा पूजन्याहृतलोचनम् ।
कृते प्रतिकृतं मत्वा पूजनीमिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
राजा ब्रह्मदत्तने देखा कि पूजनीने मेरे पुत्रकी आँखें ले लीं, तब उन्होंने यह समझ लिया कि राजकुमारको उसके कुकर्मका ही बदला मिला है। यह सोचकर राजाने रोष त्याग दिया और पूजनीसे इस प्रकार कहा ॥ २३ ॥

ब्रह्मदत्त उवाच

अस्ति वै कृतमस्माभिरस्ति प्रतिकृतं त्वया ।
उभयं तत् समीभूतं वस पूजनि मा गमः ॥ २४ ॥
ब्रह्मदत्त बोले— पूजनी! हमने तेरा अपराध किया था और तूने उसका बदला चुका लिया। अब हम दोनोंका कार्य बराबर हो गया। इसलिये अब यहीं रह। किसी दूसरी जगह न जा ॥ २४ ॥

पूजन्युवाच

सकृत् कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः ।
न तद् बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम् ।। २५ ।।
**पूजनी बोली—**राजन्! एक बार किसीका अपराध करके फिर वहीं आश्रय लेकर रहे तो विद्वान् पुरुष उसके इस कार्यकी प्रशंसा नहीं करते हैं। वहाँसे भाग जानेमें ही उसका कल्याण है ।। २५ ।।
सान्त्वे प्रयुक्ते सततं कृतवैरे न विश्वसेत् ।
क्षिप्रं स बध्यते मूढो न हि वैरं प्रशाम्यति ।। २६ ।।
जब किसीसे वैर बँध जाय तो उसकी चिकनी-चुपड़ी बातोंमें आकर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे वैरकी आग तो बुझती नहीं, वह विश्वास करनेवाला मूर्ख शीघ्र ही मारा जाता है ।। २६ ।।
अन्योन्यकृतवैराणां पुत्रपौत्रं नियच्छति ।
पुत्रपौत्रविनाशे च परलोकं नियच्छति ।। २७ ।।

जो लोग आपसमें वैर बाँध लेते हैं, उनका वह वैरभाव पुत्रों और पौत्रोंतकको पीड़ा देता है। पुत्रों-पौत्रोंका विनाश हो जानेपर परलोकमें भी वह साथ नहीं छोड़ता है ॥ २७ ॥ सर्वेषां कृतवैराणामविश्वासः सुखोदयः । एकान्ततो न विश्वासः कार्यो विश्वासघातकैः ॥ २८ ॥ जो लोग आपसमें वैर रखनेवाले हैं, उन सबके लिये सुखकी प्राप्तिका उपाय यही है कि परस्पर विश्वास न करे। विश्वासघाती मनुष्योंका सर्वथा विश्वास तो करना ही नहीं चाहिये ॥ २८ ॥ न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद् भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति । कामं विश्वासयेदन्यान् परेषां च न विश्वसेत् ॥ २९ ॥ जो विश्वासपात्र न हो, उसपर विश्वास न करे। जो विश्वासका पात्र हो, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न होनेवाला भय विश्वास करनेवालेका मूलोच्छेद कर डालता है। अपने प्रति दूसरोंका विश्वास भले ही उत्पन्न कर ले; किंतु स्वयं दूसरोंका विश्वास न करे ॥ २९ ॥ माता पिता बान्धवानां वरिष्ठौ भार्या जरा बीजमात्रं तु पुत्रः । भ्राता शत्रुः क्लिन्नपाणिर्वयस्य आत्मा ह्येकः सुखदुःखस्य भोक्ता ॥ ३० ॥ माता और पिता स्वाभाविक स्नेह होनेके कारण बान्धवगणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, पत्नी वीर्यकी नाशक (होनेसे) वृद्धावस्थाका मूर्तिमान् रूप है, पुत्र अपना ही अंश है, भाई (धनमें हिस्सा बँटानेके कारण) शत्रु समझा जाता है और मित्र तभीतक मित्र है, जबतक उसका हाथ गीला रहता है अर्थात् जबतक उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहता है; केवल आत्मा ही सुख और दुःखका भोग करनेवाला कहा गया है ॥ ३० ॥ अन्योन्यकृतवैराणां न संधिरुपपद्यते । स च हेतुरतिक्रान्तो यदर्थमहमावसम् ॥ ३१ ॥ जब आपसमें वैर हो जाय, तब संधि करना ठीक नहीं होता। मैं अबतक जिस उद्देश्यसे यहाँ रही हूँ, वह तो समाप्त हो गया ॥ ३१ ॥ पूजितस्यार्थमानाभ्यां जन्तोः पूर्वापकारिणः । मनो भवत्यविश्वस्तं कर्म त्रासयतेऽबलान् ॥ ३२ ॥ जो पहलेका अपकार करनेवाला प्राणी है, वह दान और मानसे पूजित हो तो भी उसका मन विश्वस्त नहीं होता। अपना किया हुआ अनुचित कर्म ही दुर्बल प्राणियोंको डराता रहता है ॥ ३२ ॥ पूर्वं सम्मानना यत्र पश्चाच्चैव विमानना ।

जह्यात् तत् सत्त्ववान् स्थानं शत्रोः सम्मानितोऽपि सन् ॥
जहाँ पहले सम्मान मिला हो, वहीं पीछे अपमान होने लगे तो प्रत्येक शक्तिशाली पुरुषको पुनः सम्मान मिलनेपर भी उस स्थानका परित्याग कर देना चाहिये ॥ ३३ ॥
उषितास्मि तवागारे दीर्घकालं समर्चिता ।
तदिदं वैरमुत्पन्नं सुखमाशु व्रजाम्यहम् ॥ ३४ ॥
राजन्! मैं आपके घरमें बहुत दिनोंतक बड़े आदरके साथ रही हूँ; परंतु अब यह वैर उत्पन्न हो गया; इसलिये मैं बहुत जल्दी यहाँसे सुखपूर्वक चली जाऊँगी ॥ ३४ ॥

ब्रह्मदत्त उवाच

यः कृते प्रतिकुर्याद् वै न स तत्रापराध्नुयात् ।
अनृणस्तेन भवति वस पूजनि मा गमः ॥ ३५ ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! जो एक व्यक्तिके अपराध करनेपर बदलेमें स्वयं भी कुछ करे, वह कोई अपराध नहीं करता—अपराधी नहीं माना जाता। इससे तो पहलेका अपराधी ऋणमुक्त हो जाता है; इसलिये तू यहीं रह। कहीं मत जा ॥ ३५ ॥

पूजन्युवाच

न कृतस्य तु कर्तुश्च सख्यं संधीयते पुनः ।
हृदयं तत्र जानाति कर्तुश्चैव कृतस्य च ॥ ३६ ॥
**पूजनी बोली—**राजन्! जिसका अपकार किया जाता है और जो अपकार करता है, उन दोनोंमें फिर मेल नहीं हो सकता। जो अपराध करता है और जिसपर किया जाता है, उन दोनोंके ही हृदयोंमें वह बात खटकती रहती है ॥ ३६ ॥

ब्रह्मदत्त उवाच

कृतस्य चैव कर्तुश्च सख्यं संधीयते पुनः ।
वैरस्योपशमो दृष्टः पापं नोपाश्नुते पुनः ॥ ३७ ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! बदला ले लेनेपर तो वैर शान्त हो जाता है और अपकार करनेवालेको उस पापका फल भी नहीं भोगना पड़ता; अतः अपराध करने और सहनेवालेका मेल पुनः हो सकता है ॥ ३७ ॥

पूजन्युवाच

नास्ति वैरमतिक्रान्तं सान्त्वितोऽस्मीति नाश्वसेत् ।
विश्वासाद् वध्यते लोके तस्माच्छ्रेयोऽप्यदर्शनम् ॥ ३८ ॥
**पूजनी बोली—**राजन्! इस प्रकार कभी वैर शान्त नहीं होता है। 'शत्रुने मुझे सान्त्वना दी है,' ऐसा समझकर उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। ऐसी अवस्थामें विश्वास

करनेसे जगत्में अपने प्राणोंसे भी (कभी-न-कभी) हाथ धोना पड़ता है, इसलिये वहाँ मुँह न दिखाना ही अच्छा है ॥ ३८ ॥

तरसा ये न शक्यन्ते शस्त्रैः सुनिशितैरपि ।
साम्ना तेऽपि निगृह्यन्ते गजा इव करेणुभिः ॥ ३९ ॥
जो लोग बलपूर्वक तीखे शस्त्रोंसे भी वशमें नहीं किये जा सकते, उन्हें भी मीठी वाणीद्वारा बंदी बना लिया जाता है। जैसे हथिनियोंकी सहायतासे हाथी कैद कर लिये जाते हैं ॥ ३९ ॥

ब्रह्मदत्त उवाच

संवासाज्जायते स्नेहो जीवितान्तकरेष्वपि ।
अन्योन्यस्य च विश्वासः श्वपचेन शुनो यथा ॥ ४० ॥
**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! प्राणोंका नाश करनेवाले भी यदि एक साथ रहने लगें तो उनमें परस्पर स्नेह उत्पन्न हो जाता है और वे एक-दूसरेका विश्वास भी करने लगते हैं; जैसे श्वपच (चाण्डाल) के साथ रहनेसे कुत्तेका उसके प्रति स्नेह और विश्वास हो जाता है ॥

अन्योन्यकृतवैराणां संवासान्मृदुतां गतम् ।
नैव तिष्ठति तद् वैरं पुष्करस्थमिवोदकम् ॥ ४१ ॥
आपसमें जिनका वैर हो गया है, उनका वह वैर भी एक साथ रहनेसे मृदु हो जाता है, अतः कमल के पत्तेपर जैसे जल नहीं ठहरता है, उसी प्रकार वह वैर भी टिक नहीं पाता है ॥ ४१ ॥

पूजन्युवाच

वैरं पञ्चसमुत्थानं तच्च बुध्यन्ति पण्डिताः ।
स्त्रीकृतं वास्तुजं वाग्जं ससापत्नापराधजम् ॥ ४२ ॥
**पूजनी बोली—**राजन्! वैर पाँच कारणोंसे हुआ करता है; इस बातको विद्वान् पुरुष अच्छी तरह जानते हैं। १. स्त्रीके लिये, २. घर और जमीनके लिये, ३. कठोर वाणीके कारण, ४. जातिगत द्वेषके कारण और ५. किसी समय किये हुए अपराधके कारण ॥ ४२ ॥

तत्र दाता न हन्तव्यः क्षत्रियेण विशेषतः ।
प्रकाशं वाप्रकाशं वा बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ४३ ॥
इन कारणोंसे भी ऐसे व्यक्तिका वध नहीं करना चाहिये जो दाता हो अर्थात् परोपकारी हो, विशेषतः क्षत्रियनरेशको छिपकर या प्रकटरूपमें ऐसे व्यक्तिपर हाथ नहीं उठाना चाहिये। पहले यह विचार कर लेना चाहिये कि उसका दोष हल्का है या भारी। उसके बाद कोई कदम उठाना चाहिये ॥ ४३ ॥

कृतवैरे न विश्वासः कार्यस्त्विह सुहृद्यपि ।

छन्नं संतिष्ठते वैरं गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ ४४ ॥
जिसने वैर बाँध लिया हो, ऐसे सुहृद्पर भी इस जगत्में विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जैसे लकड़ीके भीतर आग छिपी रहती है, उसी प्रकार उसके हृदयमें वैरभाव छिपा रहता है ॥ ४४ ॥

न वित्तेन न पारुष्यैर्न सान्त्वेन न च श्रुतैः ।
कोपाग्निः शाम्यते राजंस्तोयाग्निरिव सागरे ॥ ४५ ॥
राजन्! जिस प्रकार बडवानल समुद्रमें किसी तरह शान्त नहीं होता, उसी प्रकार क्रोधाग्नि भी न धनसे, न कठोरता दिखानेसे, न मीठे वचनों द्वारा समझाने-बुझानेसे और न शास्त्रज्ञानसे ही शान्त होती है ॥ ४५ ॥

न हि वैराग्निरुद्धूतः कर्म चाप्यपराधजम् ।
शाम्यत्यदग्ध्वा नृपते विना ह्येकतरक्षयात् ॥ ४६ ॥
नरेश्वर! प्रज्वलित हुई वैरकी आग एक पक्षको दग्ध किये बिना नहीं बुझती है और अपराधजनित कर्म भी एक पक्षका संहार किये बिना शान्त नहीं होता है ॥

सत्कृतस्यार्थमानाभ्यां तत्र पूर्वापकारिणः ।
नादेयोऽमित्रविश्वासः कर्म त्रासयतेऽबलान् ॥ ४७ ॥
जिसने पहले अपकार किया है, उसका यदि अपकृत व्यक्तिके द्वारा धन और मानसे सत्कार किया जाय तो भी उसे उस शत्रु का विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि अपना किया हुआ पापकर्म ही दुर्बलोंको डराता रहता है ॥ ४७ ॥

नैवापकारे कस्मिंश्चिदहं त्वयि तथा भवान् ।
उषितास्मि गृहेऽहं ते नेदानीं विश्वसाम्यहम् ॥ ४८ ॥
अब तक तो न मैंने कोई आपका अपकार किया था और न आपने ही मेरी कोई हानि की थी; इसलिये मैं आपके महलमें रहती थी, किंतु अब मैं आपका विश्वास नहीं कर सकती ॥ ४८ ॥

ब्रह्मदत्त उवाच

कालेन क्रियते कार्यं तथैव विविधाः क्रियाः ।
कालेनैते प्रवर्तन्ते कः कस्येहापराध्यति ॥ ४९ ॥
ब्रह्मदत्तने कहा— पूजनी! काल ही समस्त कार्य करता है तथा कालके ही प्रभावसे भाँति-भाँतिकी क्रियाएँ आरम्भ होती हैं। इसमें कौन किसका अपराध करता है? ॥

तुल्यं चोभे प्रवर्तते मरणं जन्म चैव ह ।
कार्यते चैव कालेन तन्निमित्तं न जीवति ॥ ५० ॥
जन्म और मृत्यु—ये दोनों क्रियाएँ समानरूपसे चलती रहती हैं। और काल ही इन्हें कराता है। इसीलिये प्राणी जीवित नहीं रह पाता ॥ ५० ॥

वध्यन्ते युगपत् केचिदेकैकस्य न चापरे । कालो दहति भूतानि सम्प्राप्याग्निरिवेन्धनम् ॥ ५१ ॥ कुछ लोग एक साथ ही मारे जाते हैं; कुछ एक-एक करके मरते हैं और बहुत-से लोग दीर्घकालतक मरते ही नहीं हैं। जैसे आग ईंधनको पाकर उसे जला देती है, उसी प्रकार काल ही समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देता है ॥

नाहं प्रमाणं नैव त्वमन्योन्यं कारणं शुभे । कालो नित्यमुपादत्ते सुखं दुःखं च देहिनाम् ॥ ५२ ॥ शुभे! एक दूसरेके प्रति किये गये अपराधमें न तो तुम यथार्थ कारण हो और न मैं ही वास्तविक हेतु हूँ। काल ही सदा समस्त देहधारियोंके सुख-दुःखको ग्रहण या उत्पन्न करता है ॥ ५२ ॥

एवं वसेह सस्नेहा यथाकाममहिंसिता । यत् कृतं तत् तु मे क्षान्तं त्वं च वै क्षम पूजनि ॥ ५३ ॥ पूजनी! मैं तेरी किसी प्रकार हिंसा नहीं करूँगा। तू यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार स्नेहपूर्वक निवास कर। तूने जो कुछ किया है, उसे मैंने क्षमा कर दिया और मैंने जो कुछ किया हो, उसे तू भी क्षमा कर दे ॥ ५३ ॥

पूजन्युवाच

यदि कालः प्रमाणं ते न वैरं कस्यचिद् भवेत् । कस्मात् त्वपचितिं यान्ति बान्धवा बान्धवैर्हतैः ॥ ५४ ॥ **पूजनी बोली—**राजन्! यदि आप कालको ही सब क्रियाओंका कारण मानते हैं, तब तो किसीका किसीके साथ वैर नहीं होना चाहिये; फिर अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर उनके सगे-सम्बन्धी बदला क्यों लेते हैं? ॥ ५४॥

कस्माद् देवासुराः पूर्वमन्योन्यमभिजघ्निरे । यदि कालेन निर्याणं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ५५ ॥ यदि कालसे ही मृत्यु, दुःख-सुख और उन्नति अवनति आदिका सम्पादन होता है, तब पूर्वकालमें देवताओं और असुरों ने क्यों आपसमें युद्ध करके एक दूसरे का वध किया? ॥ ५५ ॥

भिषजो भेषजं कर्तुं कस्मादिच्छन्ति रोगिणः । यदि कालेन पच्यन्ते भेषजैः किं प्रयोजनम् ॥ ५६ ॥ वैद्यलोग रोगियोंकी दवा करनेकी अभिलाषा क्यों करते हैं? यदि काल ही सबको पका रहा है तो दवाओंका क्या प्रयोजन है? ॥ ५६ ॥

प्रलापः सुमहान् कस्मात् क्रियते शोकमूर्च्छितैः । यदि कालः प्रमाणं ते कस्माद् धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥ ५७ ॥

यदि आप कालको ही प्रमाण मानते हैं तो शोकसे मूर्च्छित हुए प्राणी क्यों महान् प्रलाप एवं हाहाकार करते हैं? फिर कर्म करनेवालोंके लिये विधि-निषेधरूपी धर्मके पालनका नियम क्यों रखा गया है? ।। ५७ ।। तव पुत्रो ममापत्यं हतवान् स हतो मया । अनन्तरं त्वयाहं च हन्तव्या हि नराधिप ।। ५८ ।। नरेश्वर! आपके बेटेने मेरे बच्चेको मार डाला और मैंने भी उसकी आँखोंको नष्ट कर दिया। इसके बाद अब आप मेरा वध कर डालेंगे ।। ५८ ।। अहं हि पुत्रशोकेन कृतपापा तवात्मजे । यथा त्वया प्रहर्तव्यं तथा तत्त्वं च मे शृणु ।। ५९ ।। जैसे मैं पुत्र शोकसे संतप्त होकर आपके पुत्रके प्रति पापपूर्ण बर्ताव कर बैठी, उसी प्रकार आप भी मुझपर प्रहार कर सकते हैं। यहाँ जो यथार्थ बात है, वह मुझसे सुनिये ।। ५९ ।। भक्ष्यार्थं क्रीडनार्थं च नरा वाञ्छन्ति पक्षिणः । तृतीयो नास्ति संयोगो वधबन्धादृते क्षमः ।। ६० ।। मनुष्य खाने और खेलनेके लिये ही पक्षियोंकी कामना करते हैं। वध करने या बन्धनमें डालनेके सिवा तीसरे प्रकारका कोई सम्पर्क पक्षियोंके साथ उनका नहीं देखा जाता है ।। ६० ।। वधबन्धभयादेते मोक्षतन्त्रमुपाश्रिताः । जनीमरणजं दुःखं प्राहुर्वेदविदो जनाः ।। ६१ ।। इस वध और बन्धनके भयसे ही मुमुक्षुलोग मोक्ष-शास्त्रका आश्रय लेकर रहते हैं; क्योंकि वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि जन्म और मरणका दुःख असह्य होता है ।। ६१ ।। सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वस्य दयिताः सुताः । दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम् ।। ६२ ।। सबको अपने प्राण प्रिय होते हैं, सभीको अपने पुत्र प्यारे लगते हैं; सब लोग दुःखसे उद्विग्न हो उठते हैं और सभीको सुखकी प्राप्ति अभीष्ट होती है ।। ६२ ।। दुःखं जरा ब्रह्मदत्त दुःखमर्थविपर्ययः । दुःखं चानिष्टसंवासो दुःखमिष्टवियोजनम् ।। ६३ ।। महाराज ब्रह्मदत्त! दुःखके अनेक रूप हैं। बुढ़ापा दुःख है, धनका नाश दुःख है, अप्रियजनोंके साथ रहना दुःख है और प्रियजनोंसे बिछुड़ना दुःख है ।। ६३ ।। वधबन्धकृतं दुःखं स्वीकृतं सहजं तथा । दुःखं सुतेन सततं जनान् विपरिवर्तते ।। ६४ ।। वध और बन्धनसे भी सबको दुःख होता है। स्त्रीके कारण और स्वाभाविक रूपसे भी दुःख हुआ करता है तथा पुत्र यदि नष्ट हो जाय या दुष्ट निकल जाय तो उससे भी लोगोंको

सदा दुःख प्राप्त होता रहता है ।। ६४ ।। न दुःखं परदुःखे वै केचिदाहुरबुद्धयः । यो दुःखं नाभिजानाति स जल्पति महाजने ।। ६५ ।। कुछ मूढ़ मनुष्य कहा करते हैं कि पराये दुःखमें दुःख नहीं होता; परंतु वही ऐसी बात श्रेष्ठ पुरुषोंके निकट कहा करता है, जो दुःखके तत्त्वको नहीं जानता ।। ६५ ।। यस्तु शोचति दुःखार्तः स कथं वक्तुमुत्सहेत् । रसज्ञः सर्वदुःखस्य यथाऽऽत्मनि तथा परे ।। ६६ ।। जो दुःखसे पीड़ित होकर शोक करता है तथा जो अपने और पराये सभीके दुःखका रस जानता है, वह ऐसी बात कैसे कह सकता है? ।। ६६ ।। यत् कृतं ते मया राजंस्त्वया च मम यत् कृतम् । न तद् वर्षशतैः शक्यं व्यपोहितुमरिंदम ।। ६७ ।। शत्रुदमन नरेश! आपने जो मेरा अपकार किया है तथा मैंने बदलेमें जो कुछ किया है, उसे सैकड़ों वर्षोंमें भी भुलाया नहीं जा सकता ।। ६७ ।। आवयोः कृतमन्योन्यं पुनः संधिर्न विद्यते । स्मृत्वा स्मृत्वा हि ते पुत्रं नवं वैरं भविष्यति ।। ६८ ।। इस प्रकार आपसमें एक दूसरेका अपकार करनेके कारण अब हमारा फिर मेल नहीं हो सकता। अपने पुत्रको याद कर-करके आपका वैर ताजा होता रहेगा ।। ६८ ।। वैरमन्तिकमासाद्य यः प्रीतिं कर्तुमिच्छति । मृन्मयस्येव भग्नस्य यथा संधिर्न विद्यते ।। ६९ ।। इस प्रकार मरणान्त वैर ठन जानेपर जो प्रेम करना चाहता है, उसका वह प्रेम उसी प्रकार असम्भव है, जैसे मिट्टीका बर्तन एक बार फूट जानेपर फिर नहीं जुटता है ।। ६९।। निश्चयः स्वार्थशास्त्रेषु विश्वासश्चासुखोदयः । उशना चैव गाथे द्वे प्रह्रादायाब्रवीत् पुरा ।। ७० ।। विश्वास दुःख देनेवाला है, यही नीतिशास्त्रोंका निश्चय है। प्राचीनकालमें शुक्राचार्यने भी प्रह्लादसे दो गाथाएँ कही थीं, जो इस प्रकार हैं ।। ७० ।। ये वैरिणः श्रद्दधते सत्ये सत्येतरेऽपि वा । वध्यन्ते श्रद्दधानास्तु मधु शुष्कतृणैर्यथा ।। ७१ ।। जैसे सूखे तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेके ऊपर रखे हुए मधुको लेने जानेवाले मनुष्य मारे जाते हैं, उसी प्रकार जो लोग वैरीकी झूठी या सच्ची बातपर विश्वास करते हैं, वे भी बेमौत मरते हैं ।। ७१ ।। न हि वैराणि शाम्यन्ति कुले दुःखगतानि च । आख्यातारश्च विद्यन्ते कुले वै ध्रियते पुमान् ।। ७२ ।।

जब किसी कुलमें दुःखदायी वैर बँध जाता है, तब वह शान्त नहीं होता। उसे याद दिलानेवाले बने ही रहते हैं, इसलिये जबतक कुलमें एक भी पुरुष जीवित रहता है, तबतक वह वैर नहीं मिटता है ।। ७२ ।।

उपगृह्य तु वैराणि सान्त्वयन्ति नराधिप । अथैनं प्रतिपिंषन्ति पूर्णं घटमिवाश्मनि ॥ ७३ ॥

नरेश्वर! दुष्ट प्रकृतिके लोग मनमें वैर रखकर ऊपरसे शत्रुको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना देते रहते हैं। तदनन्तर अवसर पाकर उसे उसी प्रकार पीस डालते हैं, जैसे कोई पानीसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटककर चूर-चूर कर दे ।। ७३ ।।

सदा न विश्वसेद् राजन् पापं कृत्वेह कस्यचित् । अपकृत्य परेषां हि विश्वासाद् दुःखमश्रुते ॥ ७४ ॥

राजन्! किसीका अपराध करके फिर उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। जो दूसरोंका अपकार करके भी उनपर विश्वास करता है, उसे दुःख भोगना पड़ता है ।। ७४ ।।

ब्रह्मदत्त उवाच

नाविश्वासाद् विन्दतेऽर्थानीहते चापि किंचन । भयात् त्वेकतरान्नित्यं मृतकल्पा भवन्ति च ॥ ७५ ॥

**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! अविश्वास करनेसे तो मनुष्य संसारमें अपने अभीष्ट पदार्थोंको कभी नहीं प्राप्त कर सकता और न किसी कार्यके लिये कोई चेष्टा ही कर सकता है। यदि मनमें एक पक्षसे सदा भय बना रहे तो मनुष्य मृतकतुल्य हो जायेंगे—उनका जीवन ही मिट्टी हो जायगा ।। ७५ ।।

पूजन्युवाच

यस्येह व्रणिनौ पादौ पद्भ्यां च परिसर्पति । खन्येते तस्य तौ पादौ सुगुप्तमिह धावतः ॥ ७६ ॥

**पूजनीने कहा—**राजन्! जिसके दोनों पैरोंमें घाव हो गया हो; फिर भी वह उन पैरोंसे ही चलता रहे तो कितना ही बचा-बचाकर क्यों न चले; यहाँ दौड़ते हुए उन पैरोंमें पुनः घाव होते ही रहेंगे ।। ७६ ।।

नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते । तस्य वायुरुजात्यर्थं नेत्रयोर्भवति ध्रुवम् ॥ ७७ ॥

जो मनुष्य अपने रोगी नेत्रोंसे हवाकी ओर रुख करके देखता है, उसके उन नेत्रोंमें वायुके कारण अवश्य ही बहुत पीड़ा बढ़ जाती है ।। ७७ ।।

दुष्टं पन्थानमासाद्य यो मोहादुपपद्यते । आत्मनो बलमज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ७८ ॥

जो अपनी शक्तिको न समझकर मोहवश दुर्गम मार्गपर चल देता है, उसका जीवन वहीं समाप्त हो जाता है ।। ७८ ।।

यस्तु वर्षमविज्ञाय क्षेत्रं कर्षति कर्षकः ।
हीनः पुरुषकारेण सस्यं नैवाश्नुते ततः ।। ७९ ।।
जो किसान वर्षाके समयका विचार न करके खेत जोतता है, उसका पुरुषार्थ व्यर्थ जाता है; और उस जुताईसे उसको अनाज नहीं मिल पाता ।। ७९ ।।

यस्तु तिक्तं कषायं वा स्वादु वा मधुरं हितम् ।
आहारं कुरुते नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।। ८० ।।
जो प्रतिदिन तीता, कसैला, स्वादिष्ट अथवा मधुर, जैसा भी हो, हितकर भोजन करता है, वही अन्न उसके लिये अमृतके समान लाभकारी होता है ।। ८० ।।

पथ्यं मुक्त्वा तु यो मोहाद् दुष्टमश्नाति भोजनम् ।
परिणाममविज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ।। ८१ ।।
परंतु जो परिणामके विचार किये बिना ही मोहवश पथ्य छोड़कर अपथ्य भोजन करता है, उसके जीवनका वहीं अन्त हो जाता है ।। ८१ ।।

दैवं पुरुषकारश्च स्थितावन्योन्यसंश्रयात् ।
उदाराणां तु सत्कर्म दैवं क्लीबा उपासते ।। ८२ ।।
दैव और पुरुषार्थ दोनों एक-दूसरेके सहारे रहते हैं, परंतु उदार विचारवाले पुरुष सर्वदा शुभ कर्म करते हैं और नपुंसक दैवके भरोसे पड़े रहते हैं ।। ८२ ।।

कर्म चात्महितं कार्यं तीक्ष्णं वा यदि वा मृदु ।
ग्रस्यतेऽकर्मशीलस्तु सदानर्थैरकिञ्चनः ।। ८३ ।।
कठोर अथवा कोमल, जो अपने लिये हितकर हो, वह कर्म करते रहना चाहिये। जो कर्मको छोड़ बैठता है, वह निर्धन होकर सदा अनर्थोंका शिकार बना रहता है ।। ८३ ।।

तस्मात् सर्वं व्यपोह्यार्थं कार्य एव पराक्रमः ।
सर्वस्वमपि संत्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ।। ८४ ।।
अतः काल, दैव और स्वभाव आदि सारे पदार्थोंका भरोसा छोड़कर पराक्रम ही करना चाहिये। मनुष्यको सर्वस्वकी बाजी लगाकर भी अपने हितका साधन ही करना चाहिये ।। ८४ ।।

विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च बलं धैर्यं च पञ्चमम् ।
मित्राणि सहजान्याहुर्वर्तयन्तीह तैर्बुधाः ।। ८५ ।।
विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और पाँचवाँ धैर्य—ये पाँच मनुष्य के स्वाभाविक मित्र बताये गये हैं। विद्वान् पुरुष इनके द्वारा ही इस जगत्में सारे कार्य करते हैं ।। ८५ ।।

निवेशनं च कुप्यं च क्षेत्रं भार्या सुहृज्जनः ।
एतान्युपहितान्याहुः सर्वत्र लभते पुमान् ।। ८६ ।।