भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 913, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 913

अपश्यन्निहतं पुत्रं तेन बालेन भूतले ॥ १४ ॥ राजन्! तदनन्तर जब पूजनी फल लेकर लौटी तो उसने देखा कि राजकुमारने उसके बच्चेको मार डाला है और वह धरतीपर पड़ा है ॥ १४ ॥ बाष्पपूर्णमुखी दीना दृष्ट्वा तं रुदती सुतम् । पूजनी दुःखसंतप्ता रुदती वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥ अपने बच्चेकी ऐसी दुर्गति देखकर पूजनीके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वह दुःखसे संतप्त हो रोती हुई इस प्रकार कहने लगी— ॥ १५ ॥ क्षत्रिये संगतं नास्ति न प्रीतिर्न च सौहृदम् । कारणात् सान्त्वयन्त्येते कृतार्थाः संत्यजन्ति च ॥ १६ ॥ ‘क्षत्रियमें संगति निभानेकी भावना नहीं होती। उसमें न प्रेम होता है, न सौहार्द। ये किसी हेतु या स्वार्थसे ही दूसरोंको सान्त्वना देते हैं। जब इनका काम निकल जाता है, तब ये आश्रित व्यक्तिको त्याग देते हैं ॥ १६ ॥ क्षत्रियेषु न विश्वासः कार्यः सर्वापकारिषु । अपकृत्यापि सततं सान्त्वयन्ति निरर्थकम् ॥ १७ ॥ ‘क्षत्रिय सबकी बुराई ही करते हैं। इनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। ये दूसरोंका अपकार करके भी सदा उसे व्यर्थ सान्त्वना दिया करते हैं ॥ अहमस्य करोम्यद्य सदृशीं वैरयातनाम् । कृतघ्नस्य नृशंसस्य भृशं विश्वासघातिनः ॥ १८ ॥ ‘देखो तो सही, यह राजकुमार कैसा कृतघ्न, अत्यन्त क्रूर और विश्वासघाती है! अच्छा, आज मैं इससे इस वैरका बदला लेकर ही रहूँगी ॥ १८ ॥ सहसंजातवृद्धस्य तथैव सहभोजिनः । शरणागतस्य च वधस्त्रिविधं ह्येव पातकम् ॥ १९ ॥ ‘जो साथ ही पैदा हुआ और साथ ही पाला-पोसा गया हो, साथ ही भोजन करता हो और शरणमें आकर रहता हो, ऐसे व्यक्तिका वध करनेसे उपर्युक्त तीन प्रकारका पातक लगता है’ ॥ १९ ॥ इत्युक्त्वा चरणाभ्यां तु नेत्रे नृपसुतस्य सा । भित्त्वा स्वस्था तत इदं पूजनी वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥ ऐसा कहकर पूजनीने अपने दोनों पंजोंसे राजकुमारकी दोनों आँखें फोड़ डालीं। फोड़कर वह आकाशमें स्थिर हो गयी और इस प्रकार बोली— ॥ इच्छयेह कृतं पापं सद्यस्तं चोपसर्पति । कृतं प्रतिकृतं येषां न नश्यति शुभाशुभम् ॥ २१ ॥ ‘इस जगत्में स्वेच्छासे जो पाप किया जाता है, उसका फल तत्काल ही कर्ताको मिल जाता है। जिनके पापका बदला मिल जाता है, उनके पूर्वकृत शुभाशुभ कर्म नष्ट नहीं होते