महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 914, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं ॥ २१ ॥
पापं कर्म कृतं किंचिद् यदि तस्मिन् न दृश्यते ।
नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥ २२ ॥
‘राजन्! यदि यहाँ किये हुए पापकर्मका कोई फल कर्ताको मिलता न दिखायी दे तो यह समझना चाहिये कि उसके पुत्रों, पोतों और नातियोंको उसका फल भोगना पड़ेगा’ ॥ २२ ॥
ब्रह्मदत्तः सुतं दृष्ट्वा पूजन्याहृतलोचनम् ।
कृते प्रतिकृतं मत्वा पूजनीमिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥
राजा ब्रह्मदत्तने देखा कि पूजनीने मेरे पुत्रकी आँखें ले लीं, तब उन्होंने यह समझ लिया कि राजकुमारको उसके कुकर्मका ही बदला मिला है। यह सोचकर राजाने रोष त्याग दिया और पूजनीसे इस प्रकार कहा ॥ २३ ॥
ब्रह्मदत्त उवाच
अस्ति वै कृतमस्माभिरस्ति प्रतिकृतं त्वया ।
उभयं तत् समीभूतं वस पूजनि मा गमः ॥ २४ ॥
ब्रह्मदत्त बोले— पूजनी! हमने तेरा अपराध किया था और तूने उसका बदला चुका लिया। अब हम दोनोंका कार्य बराबर हो गया। इसलिये अब यहीं रह। किसी दूसरी जगह न जा ॥ २४ ॥