महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ
पृष्ठ 915, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 915
पूजन्युवाच
सकृत् कृतापराधस्य तत्रैव परिलम्बतः ।
न तद् बुधाः प्रशंसन्ति श्रेयस्तत्रापसर्पणम् ।। २५ ।।
**पूजनी बोली—**राजन्! एक बार किसीका अपराध करके फिर वहीं आश्रय लेकर रहे तो विद्वान् पुरुष उसके इस कार्यकी प्रशंसा नहीं करते हैं। वहाँसे भाग जानेमें ही उसका कल्याण है ।। २५ ।।
सान्त्वे प्रयुक्ते सततं कृतवैरे न विश्वसेत् ।
क्षिप्रं स बध्यते मूढो न हि वैरं प्रशाम्यति ।। २६ ।।
जब किसीसे वैर बँध जाय तो उसकी चिकनी-चुपड़ी बातोंमें आकर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे वैरकी आग तो बुझती नहीं, वह विश्वास करनेवाला मूर्ख शीघ्र ही मारा जाता है ।। २६ ।।
अन्योन्यकृतवैराणां पुत्रपौत्रं नियच्छति ।
पुत्रपौत्रविनाशे च परलोकं नियच्छति ।। २७ ।।