महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि आप कालको ही प्रमाण मानते हैं तो शोकसे मूर्च्छित हुए प्राणी क्यों महान् प्रलाप एवं हाहाकार करते हैं? फिर कर्म करनेवालोंके लिये विधि-निषेधरूपी धर्मके पालनका नियम क्यों रखा गया है? ।। ५७ ।। तव पुत्रो ममापत्यं हतवान् स हतो मया । अनन्तरं त्वयाहं च हन्तव्या हि नराधिप ।। ५८ ।। नरेश्वर! आपके बेटेने मेरे बच्चेको मार डाला और मैंने भी उसकी आँखोंको नष्ट कर दिया। इसके बाद अब आप मेरा वध कर डालेंगे ।। ५८ ।। अहं हि पुत्रशोकेन कृतपापा तवात्मजे । यथा त्वया प्रहर्तव्यं तथा तत्त्वं च मे शृणु ।। ५९ ।। जैसे मैं पुत्र शोकसे संतप्त होकर आपके पुत्रके प्रति पापपूर्ण बर्ताव कर बैठी, उसी प्रकार आप भी मुझपर प्रहार कर सकते हैं। यहाँ जो यथार्थ बात है, वह मुझसे सुनिये ।। ५९ ।। भक्ष्यार्थं क्रीडनार्थं च नरा वाञ्छन्ति पक्षिणः । तृतीयो नास्ति संयोगो वधबन्धादृते क्षमः ।। ६० ।। मनुष्य खाने और खेलनेके लिये ही पक्षियोंकी कामना करते हैं। वध करने या बन्धनमें डालनेके सिवा तीसरे प्रकारका कोई सम्पर्क पक्षियोंके साथ उनका नहीं देखा जाता है ।। ६० ।। वधबन्धभयादेते मोक्षतन्त्रमुपाश्रिताः । जनीमरणजं दुःखं प्राहुर्वेदविदो जनाः ।। ६१ ।। इस वध और बन्धनके भयसे ही मुमुक्षुलोग मोक्ष-शास्त्रका आश्रय लेकर रहते हैं; क्योंकि वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि जन्म और मरणका दुःख असह्य होता है ।। ६१ ।। सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वस्य दयिताः सुताः । दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम् ।। ६२ ।। सबको अपने प्राण प्रिय होते हैं, सभीको अपने पुत्र प्यारे लगते हैं; सब लोग दुःखसे उद्विग्न हो उठते हैं और सभीको सुखकी प्राप्ति अभीष्ट होती है ।। ६२ ।। दुःखं जरा ब्रह्मदत्त दुःखमर्थविपर्ययः । दुःखं चानिष्टसंवासो दुःखमिष्टवियोजनम् ।। ६३ ।। महाराज ब्रह्मदत्त! दुःखके अनेक रूप हैं। बुढ़ापा दुःख है, धनका नाश दुःख है, अप्रियजनोंके साथ रहना दुःख है और प्रियजनोंसे बिछुड़ना दुःख है ।। ६३ ।। वधबन्धकृतं दुःखं स्वीकृतं सहजं तथा । दुःखं सुतेन सततं जनान् विपरिवर्तते ।। ६४ ।। वध और बन्धनसे भी सबको दुःख होता है। स्त्रीके कारण और स्वाभाविक रूपसे भी दुःख हुआ करता है तथा पुत्र यदि नष्ट हो जाय या दुष्ट निकल जाय तो उससे भी लोगोंको