भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 920

वध्यन्ते युगपत् केचिदेकैकस्य न चापरे । कालो दहति भूतानि सम्प्राप्याग्निरिवेन्धनम् ॥ ५१ ॥ कुछ लोग एक साथ ही मारे जाते हैं; कुछ एक-एक करके मरते हैं और बहुत-से लोग दीर्घकालतक मरते ही नहीं हैं। जैसे आग ईंधनको पाकर उसे जला देती है, उसी प्रकार काल ही समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देता है ॥

नाहं प्रमाणं नैव त्वमन्योन्यं कारणं शुभे । कालो नित्यमुपादत्ते सुखं दुःखं च देहिनाम् ॥ ५२ ॥ शुभे! एक दूसरेके प्रति किये गये अपराधमें न तो तुम यथार्थ कारण हो और न मैं ही वास्तविक हेतु हूँ। काल ही सदा समस्त देहधारियोंके सुख-दुःखको ग्रहण या उत्पन्न करता है ॥ ५२ ॥

एवं वसेह सस्नेहा यथाकाममहिंसिता । यत् कृतं तत् तु मे क्षान्तं त्वं च वै क्षम पूजनि ॥ ५३ ॥ पूजनी! मैं तेरी किसी प्रकार हिंसा नहीं करूँगा। तू यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार स्नेहपूर्वक निवास कर। तूने जो कुछ किया है, उसे मैंने क्षमा कर दिया और मैंने जो कुछ किया हो, उसे तू भी क्षमा कर दे ॥ ५३ ॥

पूजन्युवाच

यदि कालः प्रमाणं ते न वैरं कस्यचिद् भवेत् । कस्मात् त्वपचितिं यान्ति बान्धवा बान्धवैर्हतैः ॥ ५४ ॥ **पूजनी बोली—**राजन्! यदि आप कालको ही सब क्रियाओंका कारण मानते हैं, तब तो किसीका किसीके साथ वैर नहीं होना चाहिये; फिर अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर उनके सगे-सम्बन्धी बदला क्यों लेते हैं? ॥ ५४॥

कस्माद् देवासुराः पूर्वमन्योन्यमभिजघ्निरे । यदि कालेन निर्याणं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ५५ ॥ यदि कालसे ही मृत्यु, दुःख-सुख और उन्नति अवनति आदिका सम्पादन होता है, तब पूर्वकालमें देवताओं और असुरों ने क्यों आपसमें युद्ध करके एक दूसरे का वध किया? ॥ ५५ ॥

भिषजो भेषजं कर्तुं कस्मादिच्छन्ति रोगिणः । यदि कालेन पच्यन्ते भेषजैः किं प्रयोजनम् ॥ ५६ ॥ वैद्यलोग रोगियोंकी दवा करनेकी अभिलाषा क्यों करते हैं? यदि काल ही सबको पका रहा है तो दवाओंका क्या प्रयोजन है? ॥ ५६ ॥

प्रलापः सुमहान् कस्मात् क्रियते शोकमूर्च्छितैः । यदि कालः प्रमाणं ते कस्माद् धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥ ५७ ॥