भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 922

सदा दुःख प्राप्त होता रहता है ।। ६४ ।। न दुःखं परदुःखे वै केचिदाहुरबुद्धयः । यो दुःखं नाभिजानाति स जल्पति महाजने ।। ६५ ।। कुछ मूढ़ मनुष्य कहा करते हैं कि पराये दुःखमें दुःख नहीं होता; परंतु वही ऐसी बात श्रेष्ठ पुरुषोंके निकट कहा करता है, जो दुःखके तत्त्वको नहीं जानता ।। ६५ ।। यस्तु शोचति दुःखार्तः स कथं वक्तुमुत्सहेत् । रसज्ञः सर्वदुःखस्य यथाऽऽत्मनि तथा परे ।। ६६ ।। जो दुःखसे पीड़ित होकर शोक करता है तथा जो अपने और पराये सभीके दुःखका रस जानता है, वह ऐसी बात कैसे कह सकता है? ।। ६६ ।। यत् कृतं ते मया राजंस्त्वया च मम यत् कृतम् । न तद् वर्षशतैः शक्यं व्यपोहितुमरिंदम ।। ६७ ।। शत्रुदमन नरेश! आपने जो मेरा अपकार किया है तथा मैंने बदलेमें जो कुछ किया है, उसे सैकड़ों वर्षोंमें भी भुलाया नहीं जा सकता ।। ६७ ।। आवयोः कृतमन्योन्यं पुनः संधिर्न विद्यते । स्मृत्वा स्मृत्वा हि ते पुत्रं नवं वैरं भविष्यति ।। ६८ ।। इस प्रकार आपसमें एक दूसरेका अपकार करनेके कारण अब हमारा फिर मेल नहीं हो सकता। अपने पुत्रको याद कर-करके आपका वैर ताजा होता रहेगा ।। ६८ ।। वैरमन्तिकमासाद्य यः प्रीतिं कर्तुमिच्छति । मृन्मयस्येव भग्नस्य यथा संधिर्न विद्यते ।। ६९ ।। इस प्रकार मरणान्त वैर ठन जानेपर जो प्रेम करना चाहता है, उसका वह प्रेम उसी प्रकार असम्भव है, जैसे मिट्टीका बर्तन एक बार फूट जानेपर फिर नहीं जुटता है ।। ६९।। निश्चयः स्वार्थशास्त्रेषु विश्वासश्चासुखोदयः । उशना चैव गाथे द्वे प्रह्रादायाब्रवीत् पुरा ।। ७० ।। विश्वास दुःख देनेवाला है, यही नीतिशास्त्रोंका निश्चय है। प्राचीनकालमें शुक्राचार्यने भी प्रह्लादसे दो गाथाएँ कही थीं, जो इस प्रकार हैं ।। ७० ।। ये वैरिणः श्रद्दधते सत्ये सत्येतरेऽपि वा । वध्यन्ते श्रद्दधानास्तु मधु शुष्कतृणैर्यथा ।। ७१ ।। जैसे सूखे तिनकोंसे ढके हुए गड्ढेके ऊपर रखे हुए मधुको लेने जानेवाले मनुष्य मारे जाते हैं, उसी प्रकार जो लोग वैरीकी झूठी या सच्ची बातपर विश्वास करते हैं, वे भी बेमौत मरते हैं ।। ७१ ।। न हि वैराणि शाम्यन्ति कुले दुःखगतानि च । आख्यातारश्च विद्यन्ते कुले वै ध्रियते पुमान् ।। ७२ ।।