भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 923

जब किसी कुलमें दुःखदायी वैर बँध जाता है, तब वह शान्त नहीं होता। उसे याद दिलानेवाले बने ही रहते हैं, इसलिये जबतक कुलमें एक भी पुरुष जीवित रहता है, तबतक वह वैर नहीं मिटता है ।। ७२ ।।

उपगृह्य तु वैराणि सान्त्वयन्ति नराधिप । अथैनं प्रतिपिंषन्ति पूर्णं घटमिवाश्मनि ॥ ७३ ॥

नरेश्वर! दुष्ट प्रकृतिके लोग मनमें वैर रखकर ऊपरसे शत्रुको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना देते रहते हैं। तदनन्तर अवसर पाकर उसे उसी प्रकार पीस डालते हैं, जैसे कोई पानीसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटककर चूर-चूर कर दे ।। ७३ ।।

सदा न विश्वसेद् राजन् पापं कृत्वेह कस्यचित् । अपकृत्य परेषां हि विश्वासाद् दुःखमश्रुते ॥ ७४ ॥

राजन्! किसीका अपराध करके फिर उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। जो दूसरोंका अपकार करके भी उनपर विश्वास करता है, उसे दुःख भोगना पड़ता है ।। ७४ ।।

ब्रह्मदत्त उवाच

नाविश्वासाद् विन्दतेऽर्थानीहते चापि किंचन । भयात् त्वेकतरान्नित्यं मृतकल्पा भवन्ति च ॥ ७५ ॥

**ब्रह्मदत्तने कहा—**पूजनी! अविश्वास करनेसे तो मनुष्य संसारमें अपने अभीष्ट पदार्थोंको कभी नहीं प्राप्त कर सकता और न किसी कार्यके लिये कोई चेष्टा ही कर सकता है। यदि मनमें एक पक्षसे सदा भय बना रहे तो मनुष्य मृतकतुल्य हो जायेंगे—उनका जीवन ही मिट्टी हो जायगा ।। ७५ ।।

पूजन्युवाच

यस्येह व्रणिनौ पादौ पद्भ्यां च परिसर्पति । खन्येते तस्य तौ पादौ सुगुप्तमिह धावतः ॥ ७६ ॥

**पूजनीने कहा—**राजन्! जिसके दोनों पैरोंमें घाव हो गया हो; फिर भी वह उन पैरोंसे ही चलता रहे तो कितना ही बचा-बचाकर क्यों न चले; यहाँ दौड़ते हुए उन पैरोंमें पुनः घाव होते ही रहेंगे ।। ७६ ।।

नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते । तस्य वायुरुजात्यर्थं नेत्रयोर्भवति ध्रुवम् ॥ ७७ ॥

जो मनुष्य अपने रोगी नेत्रोंसे हवाकी ओर रुख करके देखता है, उसके उन नेत्रोंमें वायुके कारण अवश्य ही बहुत पीड़ा बढ़ जाती है ।। ७७ ।।

दुष्टं पन्थानमासाद्य यो मोहादुपपद्यते । आत्मनो बलमज्ञाय तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ७८ ॥