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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

घर, ताँबा आदि धातु, खेत, स्त्री और सुहृद्जन—ये उपमित्र बताये गये हैं। इन्हें मनुष्य सर्वत्र पा सकता है ॥ ८६ ॥

सर्वत्र रमते प्राज्ञः सर्वत्र च विराजते । न विभीषयते कश्चिद् भीषितो न बिभेति च ॥ ८७ ॥ विद्वान् पुरुष सर्वत्र आनन्दमें रहता है और सर्वत्र उसकी शोभा होती है। उसे कोई डराता नहीं है और किसीके डरानेपर भी वह डरता नहीं है ॥ ८७ ॥

नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते । दाक्ष्येण कुर्वतः कर्म संयमात् प्रतितिष्ठति ॥ ८८ ॥ बुद्धिमान्‌के पास थोड़ा-सा धन हो तो वह भी सदा बढ़ता रहता है। वह दक्षतापूर्वक काम करते हुए संयमके द्वारा प्रतिष्ठित होता है ॥ ८८ ॥

गृहस्नेहावबद्धानां नराणामल्पमेधसाम् । कुस्त्री खादति मांसानि माघमां सेगवा इव ॥ ८९ ॥ घरकी आसक्तिमें बँधे हुए मन्दबुद्धि मनुष्योंके मांसोंको कुटिल स्त्री खा जाती है अर्थात् उसे सुखा डालती है, जैसे केकड़ेकी मादाको उसकी संतानें ही नष्ट कर देती हैं ॥ ८९ ॥

गृहं क्षेत्राणि मित्राणि स्वदेश इति चापरे । इत्येवमवसीदन्ति नरा बुद्धिविपर्यये ॥ ९० ॥ बुद्धिके विपरीत हो जानेसे दूसरे-दूसरे बहुतेरे मनुष्य घर, खेत, मित्र और अपने देश आदिकी चिन्तासे ग्रस्त होकर सदा दुखी बने रहते हैं ॥ ९० ॥

उत्पतेत् सहजाद् देशाद् व्याधिदुर्भिक्षपीडितात् । अन्यत्र वस्तुं गच्छेद् वा वसेद् वा नित्यमानितः ॥ ९१ ॥ अपना जन्मस्थान भी यदि रोग और दुर्भिक्षसे पीडित हो तो आत्मरक्षाके लिये वहाँसे हट जाना या अन्यत्र निवासके लिये चले जाना चाहिये। यदि वहाँ रहना ही हो तो सदा सम्मानित होकर रहे ॥ ९१ ॥

तस्मादन्यत्र यास्यामि वस्तुं नाहमिहोत्सहे । कृतमेतदनार्यं मे तव पुत्रे च पार्थिव ॥ ९२ ॥ भूपाल! मैंने तुम्हारे पुत्रके साथ दुष्टतापूर्ण बर्ताव किया है, इसलिये मैं अब यहाँ रहनेका साहस नहीं कर सकती, दूसरी जगह चली जाऊँगी ॥ ९२ ॥

कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसौहृदम् । कुसम्बन्धं कुदेशं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ९३ ॥ दुष्टा भार्या, दुष्ट पुत्र, कुटिल राजा, दुष्ट मित्र, दूषित सम्बन्ध और दुष्ट देशको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ९३ ॥

कुपुत्रे नास्ति विश्वासः कुभार्यायां कुतो रतिः । कुराज्ये निर्वृतिर्नास्ति कुदेशे नास्ति जीविका ॥ ९४ ॥

कुपुत्रपर कभी विश्वास नहीं हो सकता। दुष्टा भार्यापर प्रेम कैसे हो सकता है? कुटिल राजाके राज्यमें कभी शान्ति नहीं मिल सकती और दुष्ट देशमें जीवन-निर्वाह नहीं हो सकता ॥ ९४ ॥

कुमित्रे संगतिर्नास्ति नित्यमस्थिरसौहृदे ।
अवमानः कुसम्बन्धे भवत्यर्थविपर्यये ॥ ९५ ॥
कुमित्रका स्नेह कभी स्थिर नहीं रह सकता, इसलिये उसके साथ सदा मेल बना रहे— यह असम्भव है और जहाँ दूषित सम्बन्ध हो, वहाँ स्वार्थमें अन्तर आनेपर अपमान होने लगता है ॥ ९५ ॥

सा भार्या या प्रियं ब्रूते स पुत्रो यत्र निर्वृतिः ।
तन्मित्रं यत्र विश्वासः स देशो यत्र जीव्यते ॥ ९६ ॥
पत्नी वही अच्छी है, जो प्रिय वचन बोले। पुत्र वही अच्छा है, जिससे सुख मिले। मित्र वही श्रेष्ठ है, जिसपर विश्वास बना रहे और देश भी वही उत्तम है, जहाँ जीविका चल सके ॥ ९६ ॥

यत्र नास्ति बलात्कारः स राजा तीव्रशासनः ।
भीरेव नास्ति सम्बन्धो दरिद्रं यो बुभूषते ॥ ९७ ॥
उग्र शासनवाला राजा वही श्रेष्ठ है, जिसके राज्यमें बलात्कार न हो, किसी प्रकारका भय न रहे, जो दरिद्रका पालन करना चाहता हो तथा प्रजाके साथ जिसका पाल्य-पालक सम्बन्ध सदा बना रहे ॥ ९७ ॥

भार्या देशोऽथ मित्राणि पुत्रसम्बन्धिबान्धवाः ।
एते सर्वे गुणवति धर्मनेत्रे महीपतौ ॥ ९८ ॥
जिस देशका राजा गुणवान् और धर्मपरायण होता है, वहाँ स्त्री, पुत्र, मित्र सम्बन्धी तथा देश सभी उत्तम गुणसे सम्पन्न होते हैं ॥ ९८ ॥

अधर्मज्ञस्य विलयं प्रजा गच्छन्ति निग्रहात् ।
राजा मूलं त्रिवर्गस्य स्वप्रमत्तोऽनुपालयेत् ॥ ९९ ॥
जो राजा धर्मको नहीं जानता, उसके अत्याचारसे प्रजाका नाश हो जाता है। राजा ही धर्म, अर्थ और काम—इन तीनोंका मूल है। अतः उसे पूर्ण सावधान रहकर निरन्तर अपनी प्रजाका पालन करना चाहिये ॥

बलिषड्भागमुद्धृत्य बलिं समुपयोजयेत् ।
न रक्षति प्रजाः सम्यग् यः स पार्थिवतस्करः ॥ १०० ॥
जो प्रजाकी आयका छठा भाग कररूपसे ग्रहण करके उसका उपभोग करता है और प्रजाका भलीभाँति पालन नहीं करता, वह तो राजाओंमें चोर है ॥ १०० ॥

दत्त्वाभयं यः स्वयमेव राजा
न तत् प्रमाणं कुरुतेऽर्थलोभात् ।

स सर्वलोकादुपलभ्य पापं सोऽधर्मबुद्धिर्निरयं प्रयाति ॥ १०१ ॥ जो प्रजाको अभयदान देकर धनके लोभसे स्वयं ही उसका पालन नहीं करता, वह पापबुद्धि राजा सारे जगत्का पाप बटोरकर नरकमें जाता है ॥ १०१ ॥

दत्त्वाभयं स्वयं राजा प्रमाणं कुरुते यदि । स सर्वसुखकृज्ज्ञेयः प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १०२ ॥ जो अभयदान देकर प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए स्वयं ही अपनी प्रतिज्ञाको सत्य प्रमाणित कर देता है, वह राजा सबको सुख देनेवाला समझा जाता है ॥

माता पिता गुरुर्गोप्ता वह्निर्वैश्रवणो यमः । सप्त राज्ञो गुणानेतान् मनुराह प्रजापतिः ॥ १०३ ॥ प्रजापति मनुने राजाके सात गुण बताये हैं, और उन्हींके अनुसार उसे माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि, कुबेर और यमकी उपमा दी है ॥ १०३ ॥

पिता हि राजा राष्ट्रस्य प्रजानां योऽनुकम्पनः । तस्मिन् मिथ्याविनीतो हि तिर्यग् गच्छति मानवः ॥ १०४ ॥ जो राजा प्रजापर सदा कृपा रखता है, वह अपने राष्ट्रके लिये पिताके समान है। उसके प्रति जो मिथ्याभाव प्रदर्शित करता है, वह मनुष्य दूसरे जन्ममें पशु-पक्षीकी योनिमें जाता है ॥ १०४ ॥

सम्भावयति मातेव दीनमप्युपपद्यते । दहत्याग्निरिवानिष्टान् यमयन्नसतो यमः ॥ १०५ ॥ राजा दीन-दुःखियोंकी भी सुधि लेता और सबका पालन करता है, इसलिये वह माताके समान है। अपने और प्रजाके अप्रियजनोंको वह जलाता रहता है; अतः अग्निके समान है और दुष्टोंका दमन करके उन्हें संयममें रखता है; इसलिये यम कहा गया है ॥

इष्टेषु विसृजन्नर्थान् कुबेर इव कामदः । गुरुर्धर्मोपदेशेन गोप्ता च परिपालयन् ॥ १०६ ॥ प्रियजनोंको खुले हाथ धन लुटाता है और उनकी कामना पूरी करता है, इसलिये कुबेरके समान है। धर्मका उपदेश करनेके कारण गुरु और सबका संरक्षण करनेके कारण रक्षक है ॥ १०६ ॥

यस्तु रञ्जयते राजा पौरजानपदान् गुणैः । न तस्य भ्रमते राज्यं स्वयं धर्मानुपालनात् ॥ १०७ ॥ जो राजा अपने गुणोंसे नगर और जनपदके लोगोंको प्रसन्न रखता है, उसका राज्य कभी डावाँडोल नहीं होता क्योंकि वह स्वयं धर्मका निरन्तर पालन करता रहता है ॥ १०७ ॥

स्वयं समुपजानन् हि पौरजानपदार्चनम् ।

स सुखं प्रेक्षते राजा इह लोके परत्र च ॥ १०८ ॥ जो स्वयं नगर और गाँवोंके लोगोंका सम्मान करना जानता है, वह राजा इहलोक और परलोकमें सर्वत्र सुख-ही-सुख देखता है ॥ १०८ ॥

नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः । अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ॥ १०९ ॥ जिसकी प्रजा सर्वदा करके भारसे पीड़ित हो नित्य उद्विग्न रहती है और नाना प्रकारके अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभवको प्राप्त होता है ॥ १०९ ॥

प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् । स सर्वफलभाग् राजा स्वर्गलोके महीयते ॥ ११० ॥ इसके विपरीत जिसकी प्रजा सरोवरमें कमलोंके समान विकास एवं वृद्धिको प्राप्त होती रहती है, वह सब प्रकारके पुण्यफलोंका भागी होता है और स्वर्गलोकमें भी सम्मान पाता है ॥ ११० ॥

बलिना विग्रहो राजन् न कदाचित् प्रशस्यते । बलिना विग्रहो यस्य कुतो राज्यं कुतः सुखम् ॥ १११ ॥ राजन्! बलवान्‌के साथ युद्ध छेड़ना कभी अच्छा नहीं माना जाता। जिसने बलवान्‌के साथ झगड़ा मोल ले लिया, उसके लिये कहाँ राज्य है और कहाँ सुख? ॥ १११ ॥

भीष्म उवाच

सैवमुक्त्वा शकुनिका ब्रह्मदत्तं नराधिप । राजानं समनुज्ञाप्य जगामाभीप्सितां दिशम् ॥ ११२ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! राजा ब्रह्मदत्तसे ऐसा कहकर वह पूजनी चिड़िया उनसे विदा ले अभीष्ट दिशाको चली गयी ॥ ११२ ॥

एतत् ते ब्रह्मदत्तस्य पूजन्या सह भाषितम् । मयोक्तं नृपतिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ११३ ॥ नृपश्रेष्ठ! राजा ब्रह्मदत्तका पूजनी चिड़ियाके साथ जो संवाद हुआ था, यह मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ११३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि ब्रह्मदत्तपूजन्योः संवाद एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें ब्रह्मदत्त और पूजनीका संवादविषयक एकसौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥

युगक्षयात् परिक्षीणे धर्मे लोके च भारत ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

युगक्षयात् परिक्षीणे धर्मे लोके च भारत ।
दस्युभिः पीड्यमाने च कथं स्थेयं पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन! पितामह! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर-ये तीनों युग प्रायः समाप्त हो रहे हैं, इसलिये जगत्‌में धर्मका क्षय हो चला है। डाकू और लुटेरे इस धर्ममें और भी बाधा डाल रहे हैं; ऐसे समयमें किस तरह रहना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि नीतिमापत्सु भारत ।
उत्सृज्यापि घृणां काले यथा वर्तेत भूमिपः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन! ऐसे समयमें मैं तुम्हें आपत्तिकालकी वह नीति बता रहा हूँ, जिसके अनुसार भूमिपालको दयाका परित्याग करके भी समयोचित बर्ताव करना चाहिये ॥ २ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भारद्वाजस्य संवादं राज्ञः शत्रुंजयस्य च ॥ ३ ॥
इस विषयमें भारद्वाज कणिक तथा राजा शत्रुंजयके संवादरूप एक प्रचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ ३ ॥

राजा शत्रुंजयो नाम सौवीरेषु महारथः ।
भारद्वाजमुपागम्य पप्रच्छार्थविनिश्चयम् ॥ ४ ॥
सौवीरदेशमें शत्रुंजय नामसे प्रसिद्ध एक महारथी राजा थे। उन्होंने भारद्वाज कणिकके पास जाकर अपने कर्तव्यका निश्चय करनेके लिये उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ४ ॥

अलब्धस्य कथं लिप्सा लब्धं केन विवर्धते ।
वर्धितं पाल्यते केन पालितं प्रणयेत् कथम् ॥ ५ ॥
‘अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति कैसे होती है? प्राप्त द्रव्यकी वृद्धि किस प्रकार हो सकती है? बढ़े हुए द्रव्यकी रक्षा किससे की जाती है? और उस सुरक्षित द्रव्यका सदुपयोग कैसे किया जाना चाहिये?’ ॥ ५ ॥

तस्मै विनिश्चिताथार्य परिपृष्टोऽर्थनिश्चयम् ।

उवाच ब्राह्मणो वाक्यमिदं हेतुमदुत्तमम् ॥ ६ ॥
राजा शत्रुंजयको शास्त्रका तात्पर्य निश्चितरूपसे ज्ञात था। उन्होंने जब कर्तव्य-निश्चयके लिये प्रश्न उपस्थित किया, तब ब्राह्मण भारद्वाज कणिकने यह युक्तियुक्त उत्तम वचन बोलना आरम्भ किया— ॥ ६ ॥

नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।
अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी च परेषां विवरानुगः ॥ ७ ॥
‘राजाको सर्वदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये और सदा ही पुरुषार्थ प्रकट करना चाहिये। राजा अपनेमें छिद्र अर्थात् दुर्बलता न रहने दे। शत्रुपक्षके छिद्र या दुर्बलतापर सदा ही दृष्टि रखे और यदि शत्रुओंकी दुर्बलताका पता चल जाय तो उनपर आक्रमण कर दे ॥ ७ ॥

नित्यमुद्यतदण्डस्य भृशमुद्विजते नरः ।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ ८ ॥
‘जो सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहता है, उससे प्रजाजन बहुत डरते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंको दण्डके द्वारा ही काबूमें करे ॥ ८ ॥

एवं दण्डं प्रशंसन्ति पण्डितास्तत्त्वदर्शिनः ।
तस्माच्चतुष्टये तस्मिन् प्रधानो दण्ड उच्यते ॥ ९ ॥
‘इस प्रकार तत्त्वदर्शी विद्वान् दण्डकी प्रशंसा करते हैं; अतः साम, दान आदि चारों उपायोंमें दण्डको ही प्रधान बताया जाता है ॥ ९ ॥

छिन्नमूले त्वधिष्ठाने सर्वेषां जीवनं हतम् ।
कथं हि शाखास्तिष्ठेयुश्छिन्नमूले वनस्पतौ ॥ १० ॥
‘यदि मूल आधार नष्ट हो जाय तो उसके आश्रयसे जीवननिर्वाह करनेवाले सभी शत्रुओंका जीवन नष्ट हो जाता है। यदि वृक्षकी जड़ काट दी जाय तो उसकी शाखाएँ कैसे रह सकती हैं? ॥ १० ॥

मूलमेवादितश्छिन्द्यात् परपक्षस्य पण्डितः ।
ततः सहायान् पक्षं च मूलमेवानुसाधयेत् ॥ ११ ॥
‘विद्वान् पुरुष पहले शत्रुपक्षके मूलका ही उच्छेद कर डाले। तत्पश्चात् उसके सहायकों और पक्षपातियोंको भी उस मूलके पथका ही अनुसरण करावे ॥ ११ ॥

सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ।
आपदास्पदकाले तु कुर्वीत न विचारयेत् ॥ १२ ॥
‘संकटकाल उपस्थित होनेपर राजा सुन्दर मन्त्रणा, उत्तम पराक्रम एवं उत्साहपूर्वक युद्ध करे तथा अवसर आ जाय तो सुन्दर ढंगसे पलायन भी करे। आपत्कालके समय आवश्यक कर्म ही करना चाहिये, पर सोच-विचार नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥

वाङ्मात्रेण विनीतः स्याद् हृदयेन यथा क्षुरः ।

श्लक्ष्णपूर्वाभिभाषी च कामक्रोधौ विवर्जयेत् ॥ १३ ॥ ‘राजा केवल बातचीतमें ही अत्यन्त विनयशील हो, हृदयको छूरेके समान तीखा बनाये रखे; पहले मुसकराकर मीठे वचन बोले तथा काम-क्रोधको त्याग दे ॥ १३ ॥

सपत्नसहिते कार्ये कृत्वा सन्धिं न विश्वसेत् । अपक्रामेत् ततः शीघ्रं कृतकार्यो विचक्षणः ॥ १४ ॥ ‘शत्रुके साथ किये जानेवाले समझौते आदि कार्यमें संधि करके भी उसपर विश्वास न करे। अपना काम बना लेनेपर बुद्धिमान् पुरुष शीघ्र ही वहाँसे हट जाय ॥ १४ ॥

शत्रुं च मित्ररूपेण सान्त्वेनैवाभिसान्त्वयेत् । नित्यशश्चोद्विजेत् तस्माद् गृहात् सर्पयुतादिव ॥ १५ ॥ ‘शत्रुको उसका मित्र बनकर मीठे वचनोंसे ही सान्त्वना देता रहे; परंतु जैसे सर्पयुक्त गृहसे मनुष्य डरता है, उसी प्रकार उस शत्रुसे भी सदा उद्विग्न रहे ॥ १५ ॥

यस्य बुद्धिः परिभवेत् तमतीतेन सान्त्वयेत् । अनागतेन दुष्प्रज्ञं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् ॥ १६ ॥ ‘जिसकी बुद्धि संकटमें पड़कर शोकाभिभूत हो जाय, उसे भूतकालकी बातें (राजा नल तथा भगवान् श्रीराम आदिके जीवन-वृत्तान्त) सुनाकर सान्त्वना दे, जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे भविष्यमें लाभकी आशा दिलाकर तथा विद्वान् पुरुषको तत्काल ही धन आदि देकर शान्त करे ॥ १६ ॥

अञ्जलिं शपथं सान्त्वं प्रणम्य शिरसा वदेत् । अश्रुप्रमार्जनं चैव कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ १७ ॥ ‘ऐश्वर्य चाहनेवाले राजाको चाहिये कि वह अवसर देखकर शत्रुके सामने हाथ जोड़े, शपथ खाय, आश्वासन दे और चरणोंमें सिर झुकाकर बातचीत करे। इतना ही नहीं, वह धीरज देकर उसके आँसूतक पोंछे ॥ १७ ॥

वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालस्य पर्ययः । प्राप्तकालं तु विज्ञाय भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि ॥ १८ ॥ ‘जबतक समय बदलकर अपने अनुकूल न हो जाय, तबतक शत्रुको कंधेपर बिठाकर ढोना पड़े तो वह भी करे; परंतु जब अनुकूल समय आ जाय, तब उसे उसी प्रकार नष्ट कर दे, जैसे घड़ेको पत्थरपर पटककर फोड़ दिया जाता है ॥ १८ ॥

मुहूर्तमपि राजेन्द्र तिन्दुकालातवज्ज्वलेत् । न तुषाग्निरिवानर्चिर्धूमायेत चिरं नरः ॥ १९ ॥ ‘राजेन्द्र! दो ही घड़ी सही, मनुष्य तिन्दुककी लकड़ीकी मशालके समान जोर-जोरसे प्रज्वलित हो उठे (शत्रुके सामने घोर पराक्रम प्रकट करे), दीर्घकालतक भूसीकी आगके समान बिना ज्वालाके ही धुआँ न उठावे (मन्द पराक्रमका परिचय न दे) ॥ १९ ॥

नानार्थिकोऽर्थसम्बन्धं कृतघ्नेन समाचरेत् ।

अर्थी तु शक्यते भोक्तुं कृतकार्योऽवमन्यते । तस्मात् सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् ॥ २० ॥ ‘अनेक प्रकारके प्रयोजन रखनेवाला मनुष्य कृतघ्नके साथ आर्थिक सम्बन्ध न जोड़े, किसीका भी काम पूरा न करे, क्योंकि जो अर्थी (प्रयोजन-सिद्धिकी इच्छावाला) होता है, उससे तो बारंबार काम लिया जा सकता है; परंतु जिसका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, वह अपने उपकारी पुरुषकी उपेक्षा कर देता है; इसलिये दूसरोंके सारे कार्य (जो अपने द्वारा होनेवाले हों) अधूरे ही रखने चाहिये ॥ २० ॥ कोकिलस्य वराहस्य मेरोः शून्यस्य वेश्मनः । नटस्य भक्तिमित्रस्य यच्छ्रेयस्तत् समाचरेत् ॥ २१ ॥ ‘कोयल, सूअर, सुमेरु पर्वत, शून्यगृह, नट तथा अनुरक्त सुहृद्—इनमें जो श्रेष्ठ गुण या विशेषताएँ हैं, उन्हें राजा काममें लावे* ॥ २१ ॥ उत्थायोत्थाय गच्छेत नित्ययुक्तो रिपोर्गृहान् । कुशलं चास्य पृच्छेत यद्यप्यकुशलं भवेत् ॥ २२ ॥ ‘राजाको चाहिये कि वह प्रतिदिन उठ-उठकर पूर्ण सावधान हो शत्रुके घर जाय और उसका अमंगल ही क्यों न हो रहा हो, सदा उसकी कुशल पूछे और मंगल कामना करे ॥ २२ ॥ नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान् न क्लीबा नाभिमानिनः । न च लोकरवाद् भीता न वै शश्वत् प्रतीक्षिणः ॥ २३ ॥ ‘जो आलसी हैं, कायर हैं, अभिमानी हैं, लोक-चर्चासे डरनेवाले और सदा समयकी प्रतीक्षामें बैठे रहनेवाले हैं, ऐसे लोग अपने अभीष्ट अर्थको नहीं पा सकते ॥ २३ ॥ नात्मच्छिद्रं रिपुर्विद्याद् विद्याच्छिद्रं परस्य तु । गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः ॥ २४ ॥ ‘राजा इस तरह सतर्क रहे कि उसके छिद्रका शत्रुको पता न चले, परंतु वह शत्रुके छिद्रको जान ले। जैसे कछुआ अपने सब अंगोंको समेटकर छिपा लेता है, उसी प्रकार राजा अपने छिद्रोंको छिपाये रखे ॥ २४ ॥ बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् । वृकवच्चावलुम्पेत शरवच्च विनिष्पतेत् ॥ २५ ॥ ‘राजा बगुलेके समान एकाग्रचित्त होकर कर्तव्य-विषयका चिन्तन करे। सिंहके समान पराक्रम प्रकट करे। भेड़ियेकी भाँति सहसा आक्रमण करके शत्रु का धन लूट ले तथा बाणकी भाँति शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ २५ ॥ पानमक्षास्तथा नार्यो मृगया गीतवादितम् । एतानि युक्त्या सेवेत प्रसंगो ह्यत्र दोषवान् ॥ २६ ॥

'पान, जूआ, स्त्री, शिकार, तथा गाना-बजाना—इन सबका संयमपूर्वक अनासक्तभावसे सेवन करे; क्योंकि इनमें आसक्ति होना अनिष्टकारक है ।। २६ ।।

कुर्यात् तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम् ।
अन्धः स्यादन्धवेलायां बाधिर्यमपि संश्रयेत् ।। २७ ।।
'राजा बाँसका धनुष बनावे, हिरनके समान चौकन्ना होकर सोये, अंधा बने रहनेयोग्य समय हो तो अंधेका भाव किये रहे और अवसरके अनुसार बहरेका भाव भी स्वीकार कर ले ।। २७ ।।

देशकालौ समासाद्य विक्रमेत विचक्षणः ।
देशकालव्यतीतो हि विक्रमो निष्फलो भवेत् ।। २८ ।।
'बुद्धिमान् पुरुष देश और कालको अपने अनुकूल पाकर पराक्रम प्रकट करे। देशकालकी अनुकूलता न होनेपर किया गया पराक्रम निष्फल होता है ।। २८ ।।

कालाकालौ सम्प्रधार्य बलाबलमथात्मनः ।
परस्य च बलं ज्ञात्वा तत्रात्मानं नियोजयेत् ।। २९ ।।
'अपने लिये समय अच्छा है या खराब? अपना पक्ष प्रबल है या निर्बल? इन सब बातोंका निश्चय करके तथा शत्रुके भी बलको समझकर युद्ध या संधि के कार्यमें अपने आपको लगावे ।। २९ ।।

दण्डेनोपनतं शत्रुं यो राजा न नियच्छति ।
स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ।। ३० ।।
'जो राजा दण्डसे नतमस्तक हुए शत्रुको पाकर भी उसे नष्ट नहीं कर देता, वह अपनी मृत्युको आमन्त्रित करता है। ठीक उसी तरह जैसे, खच्चरी मौतके लिये ही गर्भ धारण करती है ।। ३० ।।

सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान् स्याद् दुरारुहः ।
आमः स्यात् पक्वसंकाशो न च शीर्येत कस्यचित् ।। ३१ ।।
'नीतिज्ञ राजा ऐसे वृक्षके समान रहे, जिसमें फूल तो खूब लगे हों, परंतु फल न हो। फल लगनेपर भी उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन हो, वह रहे तो कच्चा, पर दीखे पकेके समान तथा स्वयं कभी जीर्ण-शीर्ण न हो ।। ३१ ।।

आशां कालवतीं कुर्यात् तां च विघ्नेन योजयेत् ।
विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं चापि हेतुतः ।। ३२ ।।
'राजा शत्रु की आशा पूर्ण होनेमें विलम्ब पैदा करे, उसमें विघ्न डाल दे। उस विघ्नका कुछ कारण बता दे और उस कारणको युक्तिसंगत सिद्ध कर दे ।। ३२ ।।

भीतवत् संविधातव्यं यावद् भयमानागतम् ।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ।। ३३ ।।

‘जबतक अपने ऊपर भय न आया हो, तबतक डरे हुएकी भाँति उसे टालनेका प्रयत्न करना चाहिये; परंतु जब भयको सामने आया हुआ देखे तो निडर होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये ।। ३३ ।।

न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति ।
संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ।। ३४ ।।
‘जहाँ प्राणोंका संशय हो, ऐसे कष्टको स्वीकार किये बिना मनुष्य कल्याणका दर्शन नहीं कर पाता। प्राण-संकटमें पड़ कर यदि वह पुनः जीवित रह जाता है तो अपना भला देखता है ।। ३४ ।।

अनागतं विजानीयाद् यच्छेद् भयमुपस्थितम् ।
पुनर्वृद्धिभयात् किंचिदनिर्वृत्तं निशामयेत् ।। ३५ ।।
‘भविष्यमें जो संकट आनेवाले हों, उन्हें पहलेसे ही जाननेका प्रयत्न करे और जो भय सामने उपस्थित हो जाय, उसे दबानेकी चेष्टा करे। दबा हुआ भय भी पुनः बढ़ सकता है, इस डरसे यही समझे कि अभी वह निवृत्त ही नहीं हुआ है (और ऐसा समझकर सतत सावधान रहे) ।। ३५ ।।

प्रत्युपस्थितकालस्य सुखस्य परिवर्जनम् ।
अनागतसुखाशा च नैव बुद्धिमतां नयः ।। ३६ ।।
‘जिसके सुलभ होनेका समय आ गया हो, उस सुखको त्याग देना और भविष्यमें मिलनेवाले सुखकी आशा करना—यह बुद्धिमानोंकी नीति नहीं है ।। ३६ ।।

योऽरिणा सह संधाय सुखं स्वपिति विश्वसन् ।
स वृक्षाग्रे प्रसुप्तो वा पतितः प्रतिबुद्ध्यते ।। ३७ ।।
‘जो शत्रुके साथ संधि करके विश्वासपूर्वक सुखसे सोता है, वह उसी मनुष्यके समान है, जो वृक्षकी शाखापर गाढ़ी नींदमें सो गया हो। ऐसा पुरुष नीचे गिरने (शत्रुद्वारा संकटमें पड़ने) पर ही सजग या सचेत होता है ।। ३७ ।।

कर्मणा येन तेनैव मृदुना दारुणेन च ।
उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ।। ३८ ।।
‘मनुष्य कोमल या कठोर, जिस किसी भी उपायसे सम्भव हो, दीनदशासे अपना उद्धार करे। इसके बाद शक्तिशाली हो पुनः धर्माचरण करे ।। ३८ ।।

ये सपत्नाः सपत्नानां सर्वांस्तानुपसेवयेत् ।
आत्मनश्चापि बोद्धव्याश्चारा विनिहिताः परैः ।। ३९ ।।
‘जो लोग शत्रुके शत्रु हों, उन सबका सेवन करना चाहिये। अपने ऊपर शत्रुओंद्धारा जो गुप्तचर नियुक्त किये गये हों, उनको भी पहचाननेका प्रयत्न करे ।। ३९ ।।

चारस्त्वविदितः कार्य आत्मनोऽथ परस्य च ।
पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रे प्रवेशयेत् ।। ४० ।।

'अपने तथा शत्रुके राज्यमें ऐसे गुप्तचर नियुक्त करे जिसको कोई जानता-पहचानता न हो। शत्रुके राज्योंमें पाखण्डवेषधारी और तपस्वी आदिको ही गुप्तचर बनाकर भेजना चाहिये ॥ ४० ॥ उद्यानेषु विहारेषु प्रपास्वावसथेषु च । पानागारे प्रवेशेषु तीर्थेषु च सभासु च ॥ ४१ ॥ 'वे गुप्तचर बगीचा, घूमने-फिरनेके स्थान, पौंसला, धर्मशाला, मदबिक्रीके स्थान, नगरके प्रवेशद्वार, तीर्थस्थान और सभाभवन—इन सब स्थलोंमें विचरें ॥ ४१ ॥ धर्माभिचारिणः पापांश्चौरा लोकस्य कण्टकाः । समागच्छन्ति तान् बुद्ध्वा नियच्छेच्छमयीत च ॥ ४२ ॥ 'कपटपूर्ण धर्मका आचरण करनेवाले, पापात्मा, चोर तथा जगत्के लिये कण्टकरूप मनुष्य वहाँ छद्मवेष धारण करके आते रहते हैं, उन सबका पता लगाकर उन्हें कैद कर ले अथवा भय दिखाकर उनकी पापवृत्ति शान्त कर दे ॥ ४२ ॥ न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत् ॥ ४३ ॥ 'जो विश्वासपात्र नहीं है, उसपर कभी विश्वास न करे, परंतु जो विश्वासपात्र है, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि अधिक विश्वाससे भय उत्पन्न होता है अतः बिना जाँचे-बूझे किसीपर भी विश्वास न करे ॥ विश्वासयित्वा तु परं तत्त्वभूतेन हेतुना । अथास्य प्रहरेत् काले किंचिद् विचलिते पदे ॥ ४४ ॥ 'किसी यथार्थ कारणसे शत्रुके मनमें विश्वास उत्पन्न करके जब कभी उसका पैर लड़खड़ाता देखे अर्थात् उसे कमजोर समझे तभी उसपर प्रहार कर दे ॥ अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात् । भयं ह्यशङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति ॥ ४५ ॥ 'जो संदेह करने योग्य न हो, ऐसे व्यक्तिपर भी संदेह करे—उसकी ओरसे चौकन्ना रहे और जिससे भयकी आशंका हो, उसकी ओरसे तो सदा सब प्रकारसे सावधान रहे ही; क्योंकि जिसकी ओरसे भयकी आशंका नहीं है, उसकी ओरसे यदि भय उत्पन्न होता है तो वह जड़मूलसहित नष्ट कर देता है ॥ अवधानेन मौनेन काषायेण जटाजिनैः । विश्वासयित्वा द्वेषारमवलुम्पेद यथा वृकः ॥ ४६ ॥ 'शत्रुके हितके प्रति मनोयोग दिखाकर, मौनव्रत लेकर, गेरुआ वस्त्र पहनकर तथा जटा और मृगचर्म धारण करके अपने प्रति विश्वास उत्पन्न करे और जब विश्वास हो जाय तो मौका देखकर भूखे भेड़ियेकी तरह शत्रुपर टूट पड़े ॥ ४६ ॥ पुत्रो वा यदि वा भ्राता पिता वा यदि वा सुहृत् ।

अर्थस्य विघ्नं कुर्वाणा हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥ ४७ ॥
‘पुत्र, भाई, पिता अथवा मित्र जो भी अर्थप्राप्तिमें विघ्न डालनेवाले हों, उन्हें ऐश्वर्य चाहनेवाला राजा अवश्य मार डाले ॥ ४७ ॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य दण्डो भवति शासनम् ॥ ४८ ॥
‘यदि गुरु भी घमंडमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यको नहीं समझ रहा हो और बुरे मार्गपर चलता हो तो उसके लिये भी दण्ड देना उचित है; दण्ड उसे राहपर लाता है ॥ ४८ ॥
अभ्युत्थानाभिवादाभ्यां सम्प्रदानेन केनचित् ।
प्रतिपुष्पफलाघाती तीक्ष्णतुण्ड इव द्विजः ॥ ४९ ॥
‘शत्रुके आनेपर उठकर उसका स्वागत करे, उसे प्रणाम करे और कोई अपूर्व उपहार दे। इन सब बर्तावोंके द्वारा पहले उसे वशमें करे। इसके बाद ठीक वैसे ही जैसे तीखी चोंचवाला पक्षी वृक्षके प्रत्येक फूल और फलपर चोंच मारता है, उसी प्रकार उसके साधन और साध्यपर आघात करे ॥ ४९ ॥
नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् ।
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ ५० ॥
‘राजा मछलीमारोंकी भाँति दूसरोंके मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्यन्त क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतोंके प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं पा सकता है ॥
नास्ति जात्या रिपुर्नाम मित्रं वापि न विद्यते ।
सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा ॥ ५१ ॥
‘कोई जन्मसे ही मित्र अथवा शत्रु नहीं होता है। सामर्थ्ययोगसे ही शत्रु और मित्र उत्पन्न होते रहते हैं ॥
अमित्रं नैव मुञ्चेत वदन्तं करुणान्यपि ।
दुःखं तत्र न कर्तव्यं हन्यात् पूर्वापकारिणम् ॥ ५२ ॥
‘शत्रु करुणाजनक वचन बोल रहा हो तो भी उसे मारे बिना न छोड़े। जिसने पहले अपना अपकार किया हो, उसको अवश्य मार डाले और उसमें दुःख न माने ॥
संग्रहानुग्रहे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता ।
निग्रहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥ ५३ ॥
‘ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाला राजा दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा लोगोंको अपने पक्षमें मिलाये रखने तथा दूसरोंपर अनुग्रह करनेके लिये यत्नशील बना रहे और शत्रुओंका दमन भी प्रयत्नपूर्वक करे ॥ ५३ ॥
प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहृत्यैव प्रियोत्तरम् ।
असिनापि शिरश्छित्त्वा शोचेत च रुदेत च ॥ ५४ ॥

'प्रहार करनेके लिये उद्यत होकर भी प्रिय वचन बोले, प्रहार करनेके पश्चात् भी प्रिय वाणी ही बोले, तलवारसे शत्रुको मस्तक काटकर भी उसके लिये शोक करे और रोये ।। ५४ ।।
निमन्त्रयीत सान्त्वेन सम्मानेन तितिक्षया ।
लोकाराधनमित्येतत् कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।। ५५ ।।
'ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको मधुर वचन बोलकर दूसरोंका सम्मान करके और सहनशील होकर लोगोंको अपने पास आनेके लिये निमन्त्रित करना चाहिये, यही लोककी आराधना अथवा साधारण जनताका सम्मान है। इसे अवश्य करना चाहिये ।। ५५ ।।
न शुष्कवैरं कुर्वीत बाहुभ्यां न नदीं तरेत् ।
अनर्थकमनायुष्यं गोविषाणस्य भक्षणम् ।
दन्ताश्च परिमृज्यन्ते रसश्चापि न लभ्यते ।। ५६ ।।
'सूखा वैर न करे तथा दोनों बाँहोंसे तैरकर नदीके पार न जाय। यह निरर्थक और आयुनाशक कर्म है। यह कुत्तेके द्वारा गायका सींग चबाने-जैसा कार्य है, जिससे उसके दाँत भी रगड़ उठते हैं और रस भी नहीं मिलता है ।। ५६ ।।
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडानुबन्धास्त्रय एव च ।
अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडाश्च परिवर्जयेत् ।। ५७ ।।
धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें लोभ, मूर्खता और दुर्बलता-यह तीन प्रकारकी बाधा-अड़चन उपस्थित होती है। उसी प्रकार उनके शान्ति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग—ये तीन ही प्रकारके फल होते हैं। इन (तीनों प्रकारके) फलोंको शुभ जानना चाहिये; परंतु (उक्त तीनों प्रकारकी) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये ।। ५७ ।।
ऋणशेषमग्निशेषं शत्रुशेषं तथैव च ।
पुनः पुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न धारयेत् ।। ५८ ।।
'ऋण, अग्नि और शत्रुमेंसे कुछ बाकी रह जाय तो वह बारंबार बढ़ता रहता है; इसलिये इनमेंसे किसीको शेष नहीं छोड़ना चाहिये ।। ५८ ।।
वर्धमानमृणं तिष्ठेत् परिभूताश्च शत्रवः ।
जनयन्ति भयं तीव्रं व्याधयश्चाप्युपेक्षिताः ।। ५९ ।।
'यदि बढ़ता हुआ ऋण रह जाय, तिरस्कृत शत्रु जीवित रहें और उपेक्षित रोग शेष रह जायँ तो ये सब तीव्र भय उत्पन्न करते हैं ।। ५९ ।।
नासम्यक् कृतकारी स्यादप्रमत्तः सदा भवेत् ।
कण्टकोऽपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम् ।। ६० ।।
'किसी कार्यको अच्छी तरह सम्पन्न किये बिना न छोड़े और सदा सावधान रहे। शरीरमें गड़ा हुआ काँटा भी यदि पूर्णरूपसे निकाल न दिया जाय—उसका कुछ भाग शरीरमें ही टूटकर रह जाय तो वह चिरकालतक विकार उत्पन्न करता है ।। ६० ।।

वधेन च मनुष्याणां मार्गाणां दूषणेन च । अगाराणां विनाशैश्च परराष्ट्रं विनाशयेत् ॥ ६१ ॥ 'मनुष्योंका वध करके, सड़कें तोड़-फोड़कर और घरोंको नष्ट-भ्रष्ट करके शत्रुके राष्ट्रका विध्वंस करना चाहिये ॥ ६१ ॥ गृध्रदृष्टिर्बकलीनः श्वचेष्टः सिंहविक्रमः । अनुद्विग्नः काकशङ्की भुजङ्गरितं चरेत् ॥ ६२ ॥ 'राजा गीधके समान दूरतक दृष्टि डाले, बगुलेके समान लक्ष्यपर दृष्टि जमाये, कुत्तेके समान चौकन्ना रहे और सिंह के समान पराक्रम प्रकट करे, मनमें उद्वेग को स्थान न दे, कौएकी भाँति सशंक रहकर दूसरोंकी चेष्टा पर ध्यान रक्खे और दूसरेके बिलमें प्रवेश करनेवाले सर्पके समान शत्रु का छिद्र देखकर उसपर आक्रमण करे ॥ ६२ ॥ शूरमञ्जलिपातेन भीरुं भेदेन भेदयेत् । लुब्धमर्थप्रदानेन समं तुल्येन विग्रहः ॥ ६३ ॥ 'जो अपनेसे शूरवीर हो, उसे हाथ जोड़कर वशमें करे, जो डरपोक हो, उसे भय दिखाकर फोड़ ले लोभीको धन देकर काबूमें कर ले तथा जो बराबर हो उसके साथ युद्ध छेड़ दे ॥ ६३ ॥ श्रेणीमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च । अमात्यान् परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि ॥ ६४ ॥ अनेक जातिके लोग जो एक कार्यके लिये संगठित होकर अपना दल बना लेते हैं, उस दलको श्रेणी कहते हैं। ऐसी श्रेणियोंके जो प्रधान हैं, उनमें जब भेद डाला जा रहा हो और अपने मित्रोंको अनुनय-विनयके द्वारा जब दूसरे लोग अपनी ओर खींच रहे हों तथा जब सब ओर भेदनीति और दलबंदीके जाल बिछाये जा रहे हों, ऐसे अवसरोंपर अपने मन्त्रियोंकी पूर्णरूपसे रक्षा करनी चाहिये। (न तो वे फूटने पावें और और न स्वयं ही कोई दल बनाकर अपने विरुद्ध कार्य करने पावें। इसके लिये सतत सावधान रहना चाहिये) ॥ ६४ ॥ मृदुरित्यवजानन्ति तीक्ष्ण इत्युद्विजन्ति च । तीक्ष्णकाले भवेत् तीक्ष्णो मृदुकाले मृदुर्भवेत् ॥ ६५ ॥ 'राजा सदा कोमल रहे तो लोग उसकी अवहेलना करते हैं और सदा कठोर बना रहे तो उससे उद्विग्न हो उठते हैं, अतः जब कठोरता दिखाने का समय हो तो वह कठोर बने और जब कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेका अवसर हो तो कोमल बन जाय ॥ ६५ ॥ मृदुनैव मृदुं हन्ति मृदुना हन्ति दारुणम् । नासाध्यं मृदुना किंचित् तस्मात् तीक्ष्णतरो मृदुः ॥ ६६ ॥ 'बुद्धिमान् राजा कोमल उपायसे कोमल शत्रु का नाश करता है और कोमल उपायसे ही दारुण शत्रु का भी संहार कर डालता है। कोमल उपायसे कुछ भी असाध्य नहीं है; अतः

कोमल ही अत्यन्त तीक्ष्ण है॥ ६६ ॥ काले मृदुर्ग्रो भवति काले भवति दारुणः। प्रसाधयति कृत्यानि शत्रुं चाप्यधितिष्ठति ॥ ६७ ॥ 'जो समयपर कोमल होता है और समयपर कठोर बन जाता है, वह अपने सारे कार्य सिद्ध कर लेता है और शत्रु पर भी उसका अधिकार हो जाता है ॥ ६७ ॥ पण्डितेन विरुद्धः सन् दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत्। दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ॥ ६८ ॥ 'विद्वान् पुरुषसे विरोध करके 'मैं दूर हूँ' ऐसा समझकर निश्चिन्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि बुद्धिमान्‌की बाँहे बहुत बड़ी होती हैं (उसके द्वारा किये गये प्रतीकारके उपाय दूरतक प्रभाव डालते हैं), अतः यदि बुद्धिमान् पुरुषपर चोट की गयी तो वह अपनी उन विशाल भुजाओं द्वारा दूरसे भी शत्रु का विनाश कर सकता है॥ ६८ ॥ न तत् तरेद् यस्य न पारमुत्तरे- न्न तद्धरेद् यत् पुनराहरेत् परः। न तत् खनेद् यस्य न मूलमुद्धरे- न्न तं हन्याद् यस्य शिरो न पातयेत् ॥ ६९ ॥ 'जिसके पार न उतर सके, उस नदीको तैरनेका साहस न करे। जिसको शत्रु पुनः बलपूर्वक वापस ले सके ऐसे धनका अपहरण ही न करे। ऐसे वृक्ष या शत्रुको खोदने या नष्ट करनेकी चेष्टा न करे जिसकी जड़को उखाड़ फेंकना सम्भव न हो सके तथा उस वीरपर आघात न करे, जिसका मस्तक काटकर धरतीपर गिरा न सके ॥ इतीदमुक्तं वृजिनाभिसंहितं न चैतदेवं पुरुषः समाचरेत्। परप्रयुक्ते न कथं विभावये- दतो मयोक्तं भवतो हितार्थिना ॥ ७० ॥ 'यह जो मैंने शत्रुके प्रति पापपूर्ण बर्तावका उपदेश किया है, इसे समर्थ पुरुष सम्पत्तिके समय कदापि आचरणमें न लावे। परंतु जब शत्रु ऐसे ही बर्तावोंद्वारा अपने ऊपर संकट उपस्थित कर दे, तब उसके प्रतीकारके लिये वह इन्हीं उपायोंको काममें लानेका विचार क्यों न करे, इसीलिये तुम्हारे हितकी इच्छासे मैंने यह सब कुछ बताया है' ॥ ७० ॥ यथावदुक्तं वचनं हितार्थिना निशम्य विप्रेण सुवीरराष्ट्रपः। तथाकरोद् वाक्यमदीनचेतनः श्रियं च दीप्तां बुभुजे सबान्धवः ॥ ७१ ॥ हितार्थी ब्राह्मण भारद्वाज कणिककी कही हुई उन यथार्थ बातोंको सुनकर सौवीरदेशके राजाने उनका यथोचितरूपसे पालन किया, जिससे वे बन्धु-बान्धवों-सहित

समुज्ज्वल राजलक्ष्मीका उपभोग करने लगे ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कणिकोपदेशे चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कणिकका उपदेशविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४० ।।


* कोयलका श्रेष्ठ गुण है कण्ठकी मधुरता, सूअरके आक्रमणको रोकना कठिन है, यही उसकी विशेषता है; मेरुका गुण है सबसे अधिक उन्नत होना, सूने घरकी विशेषता है अनेकको आश्रय देना, नटका गुण है दूसरोंको अपने क्रिया-कौशलद्वारा संतुष्ट करना तथा अनुरक्त सुहृद्की विशेषता है हितपरायणता। ये सारे गुण राजाको अपनाने चाहिये।

‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद

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एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

‘ब्राह्मण भयंकर संकटकालमें किस तरह जीवन-निर्वाह करे’ इस विषयमें विश्वामित्र मुनि और चाण्डालका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

हीने परमेके धर्मे सर्वलोकाभिलङ्घिते ।
अधर्मे धर्मतां नीते धर्मे चाधर्मतां गते ॥ १ ॥
मर्यादासु विनष्टासु क्षुभिते धर्मनिश्चये ।
राजभिः पीडिते लोके परैर्वापि विशाम्पते ॥ २ ॥
सर्वाश्रमेषु मूढेषु कर्मसूपहतेषु च ।
कामाल्लोभाच्च मोहाच्च भयं पश्यत्सु भारत ॥ ३ ॥
अविश्वस्तेषु सर्वेषु नित्यं भीतेषु पार्थिव ।
निकृत्या हन्यमानेषु वञ्चयत्सु परस्परम् ॥ ४ ॥
सम्प्रदीप्तेषु देशेषु ब्राह्मणे चातिपीडिते ।
अवर्षति च पर्जन्ये मिथो भेदे समुत्थिते ॥ ५ ॥
सर्वस्मिन् दस्युसाद् भूते पृथिव्यामुपजीवने ।
केनस्विद् ब्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते ॥ ६ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— प्रजानाथ! भरतनन्दन! भूपाल-शिरोमणे! जब सब लोगोंके द्वारा धर्मका उल्लंघन होनेके कारण श्रेष्ठ धर्म क्षीण हो चले, अधर्मको धर्म मान लिया जाय और धर्मको अधर्म समझा जाने लगे, सारी मर्यादाएँ नष्ट हो जायँ, धर्मका निश्चय डावाँडोल हो जाय, राजा अथवा शत्रु प्रजाको पीड़ा देने लगें, सभी आश्रम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायँ, धर्म-कर्म नष्ट हो जायँ, काम, लोभ तथा मोहके कारण सबको सर्वत्र भय दिखायी देने लगे, किसीका किसीपर विश्वास न रह जाय, सभी सदा डरते रहें, लोग धोखेसे एक-दूसरेको मारने लगें, सभी आपसमें ठगी करने लगें, देशमें सब ओर आग लगायी जाने लगे, ब्राह्मण अत्यन्त पीड़ित हो जायँ, वृष्टि न हो, परस्पर वैर-विरोध और फूट बढ़ जाय और पृथ्वीपर जीविकाके सारे साधन लुटेरोंके अधीन हो जायँ, तब ऐसा अधम समय उपस्थित होनेपर ब्राह्मण किस उपायसे जीवन-निर्वाह करे? ॥ १—६ ॥

अतितिक्षुः पुत्रपौत्राननुक्रोशान् नराधिप ।
कथमापत्सु वर्तेत तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ७ ॥

नरेश्वर! पितामह! यदि ब्राह्मण ऐसी आपत्तिके समय दयावश अपने पुत्र-पौत्रोंका परित्याग करना न चाहे तो वह कैसे जीविका चलावे, यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥

कथं च राजा वर्तेत लोके कलुषतां गते । कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीयेत परंतप ॥ ८ ॥ परंतप! जब लोग पापपरायण हो जायँ, उस अवस्थामें राजा कैसा बर्ताव करे, जिससे वह धर्म और अर्थसे भी भ्रष्ट न हो? ॥ ८ ॥

भीष्म उवाच

राजमूला महाबाहो योगक्षेमसुवृष्टयः । प्रजासु व्याधयश्चैव मरणं च भयानि च ॥ ९ ॥ भीष्मजीने कहा—महाबाहो! प्रजाके योग, क्षेम, उत्तम वृष्टि, व्याधि, मृत्यु और भय—इन सबका मूल कारण राजा ही है ॥ ९ ॥

कृतं त्रेतां द्वापरं च कलिश्च भरतर्षभ । राजमूला इति मतिर्मम नास्त्यत्र संशयः ॥ १० ॥ भरतश्रेष्ठ! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन सबका मूल कारण राजा ही है, ऐसा मेरा विचार है। इसकी सत्यतामें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है ॥ १० ॥

तस्मिंस्त्वभ्यागते काले प्रजानां दोषकारके । विज्ञानबलमास्थाय जीवितव्यं भवेत् तदा ॥ ११ ॥ प्रजाओंके लिये दोष उत्पन्न करनेवाले ऐसे भयानक समयके आनेपर ब्राह्मणको विज्ञानबलका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करना चाहिये ॥ ११ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विश्वामित्रस्य संवादं चाण्डालस्य च पक्कणे ॥ १२ ॥ इस विषयमें चाण्डालके घरमें चाण्डाल और विश्वामित्रका जो संवाद हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण लोग दिया करते हैं ॥ १२ ॥

त्रेताद्वापरयोः संधौ तदा दैवविधिक्रमात् । अनावृष्टिरभूद् घोरा लोके द्वादशवार्षिकी ॥ १३ ॥ त्रेता और द्वापरके संधिकी बात है, दैववश संसारमें बारह वर्षोंतक भयंकर अनावृष्टि हो गयी (वर्षा हुई ही नहीं) ॥ १३ ॥

प्रजानामतिवृद्धानां युगान्ते समुपस्थिते । त्रेताविमोक्षसमये द्वापरप्रतिपादने ॥ १४ ॥ त्रेतायुग प्रायः बीत गया था, द्वापरका आरम्भ हो रहा था, प्रजाएँ बहुत बढ़ गयी थीं, जिनके लिये वर्षा बंद हो जानेसे प्रलयकाल-सा उपस्थित हो गया ॥ १४ ॥

न ववर्ष सहस्राक्षः प्रतिलोमोऽभवद् गुरुः । जगाम दक्षिणं मार्गं सोमो व्यावृत्तलक्षणः ॥ १५ ॥

इन्द्रने वर्षा बंद कर दी थी, बृहस्पति प्रतिलोम (वक्री) हो गया था, चन्द्रमा विकृत हो गया था और वह दक्षिण मार्गपर चला गया था ॥ १५ ॥
नावश्यायोऽपि तत्राभूत् कुत एवाभ्रजातयः ।
नद्यः संक्षिप्ततोयौघाः किंचिदन्तर्गतास्ततः ॥ १६ ॥
उन दिनों कुहासा भी नहीं होता था, फिर बादल कहाँसे उत्पन्न होते। नदियोंका जलप्रवाह अत्यन्त क्षीण हो गया और कितनी ही नदियाँ अदृश्य हो गयीं ॥ १६ ॥
सरांसि सरितश्चैव कूपाः प्रस्रवणानि च ।
हतत्विषो न लक्ष्यन्ते निसर्गाद् दैवकारितात् ॥ १७ ॥
बड़े-बड़े सरोवर, सरिताएँ, कूप और झरने भी उस दैवविहित अथवा स्वाभाविक अनावृष्टिसे श्रीहीन होकर दिखायी ही नहीं देते थे ॥ १७ ॥
उपशुष्कजलस्थाया विनिवृत्तसभाप्रपा ।
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया निर्वषट्कारमङ्गला ॥ १८ ॥
उच्छिन्नकृषिगोरक्षा निवृत्तविपणापणा ।
निवृत्तयूपसम्भारा विप्रणष्टमहोत्सवा ॥ १९ ॥
छोटे-छोटे जलाशय सर्वथा सूख गये। जलाभावके कारण पौंसले बंद हो गये। भूतलपर यज्ञ और स्वाध्यायका लोप हो गया। वषट्कार और मांगलिक उत्सवोंका कहीं नाम भी नहीं रह गया। खेती और गोरक्षा चौपट हो गयी, बाजार-हाट बंद हो गये। यूप और यज्ञोंका आयोजन समाप्त हो गया तथा बड़े-बड़े उत्सव नष्ट हो गये ॥ १८-१९ ॥
अस्थिसंचयसंकीर्णा महाभूतरवाकुला ।
शून्यभूयिष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशना ॥ २० ॥
सब ओर हड्डियोंके ढेर लग गये। प्राणियोंके महान् आर्तनाद सब ओर व्याप्त हो रहे थे। नगरके अधिकांश भाग उजाड़ हो गये थे तथा गाँव और घर जल गये थे ॥ २० ॥
क्वचिच्चोरैः क्वचिच्छस्त्रैः क्वचिद् राजभिर्रातुरैः ।
परस्परभयाच्चैव शून्यभूयिष्ठनिर्जना ॥ २१ ॥
कहीं चोरोंसे, कहीं अस्त्र-शस्त्रोंसे, कहीं राजाओंसे और कहीं क्षुधातुर मनुष्योंद्वारा उपद्रव खड़ा होनेके कारण तथा पारस्परिक भयसे भी वसुधाका बहुत बड़ा भाग उजाड़ होकर निर्जन बन गया था ॥ २१ ॥
गतदैवतसंस्थाना वृद्धबालविनाकृता ।
गोजाविमहिषीहीना परस्परपराहता ॥ २२ ॥
देवालय तथा मठ-मन्दिर आदि संस्थाएँ उठ गयी थीं, बालक और बूढ़े मर गये थे, गाय, भेड़, बकरी और भैंसें प्रायः समाप्त हो गयी थीं, क्षुधातुर प्राणी एक-दूसरेपर आघात करते थे ॥ २२ ॥
हतविप्रा हतारक्षा प्रणष्टौषधिसंचया ।

सर्वभूतरुतप्राया बभूव वसुधा तदा ॥ २३ ॥ ब्राह्मण नष्ट हो गये थे। रक्षकवृन्दका भी विनाश हो गया था, ओषधियोंके समूह (अनाज और फल आदि) भी नष्ट हो गये थे, वसुधापर सब ओर समस्त प्राणियोंका हाहाकार व्याप्त हो रहा था ॥ २३ ॥ तस्मिन् प्रतिभये काले क्षते धर्मे युधिष्ठिर । बभूवुः क्षुधिता मर्त्याः खादमानाः परस्परम् ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर! ऐसे भयंकर समयमें धर्मका नाश हो जानेके कारण भूखसे पीड़ित हुए मनुष्य एक-दूसरेको खाने लगे ॥ २४ ॥ ऋषयो नियमांस्त्यक्त्वा परित्यज्याग्निदेवताः । आश्रमान् सम्परित्यज्य पर्यधावन्नितस्ततः ॥ २५ ॥ अग्निके उपासक ऋषिगण नियम और अग्निहोत्र त्यागकर अपने आश्रमोंको भी छोड़कर भोजनके लिये इधर-उधर दौड़ रहे थे ॥ २५ ॥ विश्वामित्रोऽथ भगवान् महर्षिरनिकेतनः । क्षुधापरिगतो धीमान् समन्तात् पर्यधावत ॥ २६ ॥ इन्हीं दिनों बुद्धिमान् महर्षि भगवान् विश्वामित्र भूखसे पीड़ित हो घर छोड़कर चारों ओर दौड़ लगा रहे थे ॥ २६ ॥ त्यक्त्वा दारांश्च पुत्रांश्च कस्मिंश्च जनसंसदि । भक्ष्याभक्ष्यसमो भूत्वा निरग्निरनिकेतनः ॥ २७ ॥ उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्रोंको किसी जन-समुदायमें छोड़ दिया और स्वयं अग्निहोत्र तथा आश्रम त्यागकर भक्ष्य और अभक्ष्यमें समान भाव रखते हुए विचरने लगे ॥ २७ ॥ स कदाचित् परिपतन् श्वपचानां निवेशनम् । हिंस्राणां प्राणिघातानामाससाद वने क्वचित् ॥ २८ ॥ एक दिन वे किसी वनके भीतर प्राणियोंका वध करनेवाले हिंसक चाण्डालोंकी बस्तीमें गिरते-पड़ते जा पहुँचे ॥ २८ ॥ विभिन्नकलशाकीर्णं श्वचर्मच्छेदनायुतम् । वराहखरभग्नास्थिकपालघटसंकुलम् ॥ २९ ॥ वहाँ चारों ओर टूटे-फूटे घरोंके खपरे और ठीकरे बिखरे पड़े थे, कुत्तोंके चमड़े छेदनेवाले हथियार रखे हुए थे, सूअरों और गदहोंकी टूटी हड्डियाँ, खपड़े और घड़े वहाँ सब ओर भरे दिखायी दे रहे थे ॥ २९ ॥ मृतचैलपरिस्तीर्णं निर्माल्यकृतभूषणम् । सर्पनिर्मोकमालाभिः कृतचिह्नकुटीमठम् ॥ ३० ॥