महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 928, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस सुखं प्रेक्षते राजा इह लोके परत्र च ॥ १०८ ॥ जो स्वयं नगर और गाँवोंके लोगोंका सम्मान करना जानता है, वह राजा इहलोक और परलोकमें सर्वत्र सुख-ही-सुख देखता है ॥ १०८ ॥
नित्योद्विग्नाः प्रजा यस्य करभारप्रपीडिताः । अनर्थैर्विप्रलुप्यन्ते स गच्छति पराभवम् ॥ १०९ ॥ जिसकी प्रजा सर्वदा करके भारसे पीड़ित हो नित्य उद्विग्न रहती है और नाना प्रकारके अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभवको प्राप्त होता है ॥ १०९ ॥
प्रजा यस्य विवर्धन्ते सरसीव महोत्पलम् । स सर्वफलभाग् राजा स्वर्गलोके महीयते ॥ ११० ॥ इसके विपरीत जिसकी प्रजा सरोवरमें कमलोंके समान विकास एवं वृद्धिको प्राप्त होती रहती है, वह सब प्रकारके पुण्यफलोंका भागी होता है और स्वर्गलोकमें भी सम्मान पाता है ॥ ११० ॥
बलिना विग्रहो राजन् न कदाचित् प्रशस्यते । बलिना विग्रहो यस्य कुतो राज्यं कुतः सुखम् ॥ १११ ॥ राजन्! बलवान्के साथ युद्ध छेड़ना कभी अच्छा नहीं माना जाता। जिसने बलवान्के साथ झगड़ा मोल ले लिया, उसके लिये कहाँ राज्य है और कहाँ सुख? ॥ १११ ॥
भीष्म उवाच
सैवमुक्त्वा शकुनिका ब्रह्मदत्तं नराधिप । राजानं समनुज्ञाप्य जगामाभीप्सितां दिशम् ॥ ११२ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! राजा ब्रह्मदत्तसे ऐसा कहकर वह पूजनी चिड़िया उनसे विदा ले अभीष्ट दिशाको चली गयी ॥ ११२ ॥
एतत् ते ब्रह्मदत्तस्य पूजन्या सह भाषितम् । मयोक्तं नृपतिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ११३ ॥ नृपश्रेष्ठ! राजा ब्रह्मदत्तका पूजनी चिड़ियाके साथ जो संवाद हुआ था, यह मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ११३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि ब्रह्मदत्तपूजन्योः संवाद एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें ब्रह्मदत्त और पूजनीका संवादविषयक एकसौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥