महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 929, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
भारद्वाज कणिकका सौराष्ट्रदेशके राजाको कूटनीतिका उपदेश
युधिष्ठिर उवाच
युगक्षयात् परिक्षीणे धर्मे लोके च भारत ।
दस्युभिः पीड्यमाने च कथं स्थेयं पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन! पितामह! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर-ये तीनों युग प्रायः समाप्त हो रहे हैं, इसलिये जगत्में धर्मका क्षय हो चला है। डाकू और लुटेरे इस धर्ममें और भी बाधा डाल रहे हैं; ऐसे समयमें किस तरह रहना चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि नीतिमापत्सु भारत ।
उत्सृज्यापि घृणां काले यथा वर्तेत भूमिपः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन! ऐसे समयमें मैं तुम्हें आपत्तिकालकी वह नीति बता रहा हूँ, जिसके अनुसार भूमिपालको दयाका परित्याग करके भी समयोचित बर्ताव करना चाहिये ॥ २ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भारद्वाजस्य संवादं राज्ञः शत्रुंजयस्य च ॥ ३ ॥
इस विषयमें भारद्वाज कणिक तथा राजा शत्रुंजयके संवादरूप एक प्रचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ ३ ॥
राजा शत्रुंजयो नाम सौवीरेषु महारथः ।
भारद्वाजमुपागम्य पप्रच्छार्थविनिश्चयम् ॥ ४ ॥
सौवीरदेशमें शत्रुंजय नामसे प्रसिद्ध एक महारथी राजा थे। उन्होंने भारद्वाज कणिकके पास जाकर अपने कर्तव्यका निश्चय करनेके लिये उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ४ ॥
अलब्धस्य कथं लिप्सा लब्धं केन विवर्धते ।
वर्धितं पाल्यते केन पालितं प्रणयेत् कथम् ॥ ५ ॥
‘अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति कैसे होती है? प्राप्त द्रव्यकी वृद्धि किस प्रकार हो सकती है? बढ़े हुए द्रव्यकी रक्षा किससे की जाती है? और उस सुरक्षित द्रव्यका सदुपयोग कैसे किया जाना चाहिये?’ ॥ ५ ॥
तस्मै विनिश्चिताथार्य परिपृष्टोऽर्थनिश्चयम् ।