भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 943

इन्द्रने वर्षा बंद कर दी थी, बृहस्पति प्रतिलोम (वक्री) हो गया था, चन्द्रमा विकृत हो गया था और वह दक्षिण मार्गपर चला गया था ॥ १५ ॥
नावश्यायोऽपि तत्राभूत् कुत एवाभ्रजातयः ।
नद्यः संक्षिप्ततोयौघाः किंचिदन्तर्गतास्ततः ॥ १६ ॥
उन दिनों कुहासा भी नहीं होता था, फिर बादल कहाँसे उत्पन्न होते। नदियोंका जलप्रवाह अत्यन्त क्षीण हो गया और कितनी ही नदियाँ अदृश्य हो गयीं ॥ १६ ॥
सरांसि सरितश्चैव कूपाः प्रस्रवणानि च ।
हतत्विषो न लक्ष्यन्ते निसर्गाद् दैवकारितात् ॥ १७ ॥
बड़े-बड़े सरोवर, सरिताएँ, कूप और झरने भी उस दैवविहित अथवा स्वाभाविक अनावृष्टिसे श्रीहीन होकर दिखायी ही नहीं देते थे ॥ १७ ॥
उपशुष्कजलस्थाया विनिवृत्तसभाप्रपा ।
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया निर्वषट्कारमङ्गला ॥ १८ ॥
उच्छिन्नकृषिगोरक्षा निवृत्तविपणापणा ।
निवृत्तयूपसम्भारा विप्रणष्टमहोत्सवा ॥ १९ ॥
छोटे-छोटे जलाशय सर्वथा सूख गये। जलाभावके कारण पौंसले बंद हो गये। भूतलपर यज्ञ और स्वाध्यायका लोप हो गया। वषट्कार और मांगलिक उत्सवोंका कहीं नाम भी नहीं रह गया। खेती और गोरक्षा चौपट हो गयी, बाजार-हाट बंद हो गये। यूप और यज्ञोंका आयोजन समाप्त हो गया तथा बड़े-बड़े उत्सव नष्ट हो गये ॥ १८-१९ ॥
अस्थिसंचयसंकीर्णा महाभूतरवाकुला ।
शून्यभूयिष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशना ॥ २० ॥
सब ओर हड्डियोंके ढेर लग गये। प्राणियोंके महान् आर्तनाद सब ओर व्याप्त हो रहे थे। नगरके अधिकांश भाग उजाड़ हो गये थे तथा गाँव और घर जल गये थे ॥ २० ॥
क्वचिच्चोरैः क्वचिच्छस्त्रैः क्वचिद् राजभिर्रातुरैः ।
परस्परभयाच्चैव शून्यभूयिष्ठनिर्जना ॥ २१ ॥
कहीं चोरोंसे, कहीं अस्त्र-शस्त्रोंसे, कहीं राजाओंसे और कहीं क्षुधातुर मनुष्योंद्वारा उपद्रव खड़ा होनेके कारण तथा पारस्परिक भयसे भी वसुधाका बहुत बड़ा भाग उजाड़ होकर निर्जन बन गया था ॥ २१ ॥
गतदैवतसंस्थाना वृद्धबालविनाकृता ।
गोजाविमहिषीहीना परस्परपराहता ॥ २२ ॥
देवालय तथा मठ-मन्दिर आदि संस्थाएँ उठ गयी थीं, बालक और बूढ़े मर गये थे, गाय, भेड़, बकरी और भैंसें प्रायः समाप्त हो गयी थीं, क्षुधातुर प्राणी एक-दूसरेपर आघात करते थे ॥ २२ ॥
हतविप्रा हतारक्षा प्रणष्टौषधिसंचया ।