महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 944, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वभूतरुतप्राया बभूव वसुधा तदा ॥ २३ ॥ ब्राह्मण नष्ट हो गये थे। रक्षकवृन्दका भी विनाश हो गया था, ओषधियोंके समूह (अनाज और फल आदि) भी नष्ट हो गये थे, वसुधापर सब ओर समस्त प्राणियोंका हाहाकार व्याप्त हो रहा था ॥ २३ ॥ तस्मिन् प्रतिभये काले क्षते धर्मे युधिष्ठिर । बभूवुः क्षुधिता मर्त्याः खादमानाः परस्परम् ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर! ऐसे भयंकर समयमें धर्मका नाश हो जानेके कारण भूखसे पीड़ित हुए मनुष्य एक-दूसरेको खाने लगे ॥ २४ ॥ ऋषयो नियमांस्त्यक्त्वा परित्यज्याग्निदेवताः । आश्रमान् सम्परित्यज्य पर्यधावन्नितस्ततः ॥ २५ ॥ अग्निके उपासक ऋषिगण नियम और अग्निहोत्र त्यागकर अपने आश्रमोंको भी छोड़कर भोजनके लिये इधर-उधर दौड़ रहे थे ॥ २५ ॥ विश्वामित्रोऽथ भगवान् महर्षिरनिकेतनः । क्षुधापरिगतो धीमान् समन्तात् पर्यधावत ॥ २६ ॥ इन्हीं दिनों बुद्धिमान् महर्षि भगवान् विश्वामित्र भूखसे पीड़ित हो घर छोड़कर चारों ओर दौड़ लगा रहे थे ॥ २६ ॥ त्यक्त्वा दारांश्च पुत्रांश्च कस्मिंश्च जनसंसदि । भक्ष्याभक्ष्यसमो भूत्वा निरग्निरनिकेतनः ॥ २७ ॥ उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्रोंको किसी जन-समुदायमें छोड़ दिया और स्वयं अग्निहोत्र तथा आश्रम त्यागकर भक्ष्य और अभक्ष्यमें समान भाव रखते हुए विचरने लगे ॥ २७ ॥ स कदाचित् परिपतन् श्वपचानां निवेशनम् । हिंस्राणां प्राणिघातानामाससाद वने क्वचित् ॥ २८ ॥ एक दिन वे किसी वनके भीतर प्राणियोंका वध करनेवाले हिंसक चाण्डालोंकी बस्तीमें गिरते-पड़ते जा पहुँचे ॥ २८ ॥ विभिन्नकलशाकीर्णं श्वचर्मच्छेदनायुतम् । वराहखरभग्नास्थिकपालघटसंकुलम् ॥ २९ ॥ वहाँ चारों ओर टूटे-फूटे घरोंके खपरे और ठीकरे बिखरे पड़े थे, कुत्तोंके चमड़े छेदनेवाले हथियार रखे हुए थे, सूअरों और गदहोंकी टूटी हड्डियाँ, खपड़े और घड़े वहाँ सब ओर भरे दिखायी दे रहे थे ॥ २९ ॥ मृतचैलपरिस्तीर्णं निर्माल्यकृतभूषणम् । सर्पनिर्मोकमालाभिः कृतचिह्नकुटीमठम् ॥ ३० ॥