भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 945, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 945

मुर्दोंके ऊपरसे उतारे गये कपड़े चारों ओर फैलाये गये थे और वहींसे उतारे हुए फूलकी मालाओंसे उन चाण्डालोंके घर सजे हुए थे। चाण्डालोंकी कुटियों और मठोंको सर्पकी केंचुलोंकी मालाओंसे विभूषित एवं चिह्नित किया गया था ॥ ३० ॥ कुक्कुटारावबहुलं गर्दभध्वनिनादितम्। उद्घोषद्भिः खरैर्वाक्यैः कलहद्भिः परस्परम् ॥ ३१ ॥ उस पल्लीमें सब ओर मुर्गोंकी ‘कुकुहूकू’ की आवाज गूँज रही थी। गदहोंके रेंकनेकी ध्वनि भी प्रतिध्वनित हो रही थी। वे चाण्डाल आपसमें झगड़ा-फसाद करके कठोर वचनोंद्वारा एक-दूसरेको कोसते हुए कोलाहल मचा रहे थे ॥ ३१ ॥ उलूकपक्षिध्वनिभिर्देवतायतनैर्वृतम्। लोहघण्टापरिष्कारं श्वयूथपरिवारितम् ॥ ३२ ॥ वहाँ कई देवालय थे, जिनके भीतर उल्लू पक्षीकी आवाज गूँजती रहती थी। वहाँके घरोंको लोहेकी घंटियोंसे सजाया गया था और झुंड-के-झुंड कुत्ते उन घरोंको घेरे हुए थे ॥ ३२ ॥ तत् प्रविश्य क्षुधाविष्टो विश्वामित्रो महार्षिः। आहारान्वेषणे युक्तः परं यत्नं समास्थितः ॥ ३३ ॥ उस बस्तीमें घुसकर भूखसे पीड़ित हुए महर्षि विश्वामित्र आहारकी खोजमें लगकर उसके लिये महान् प्रयत्न करने लगे ॥ ३३ ॥ न च क्वचिदविन्दत् स भिक्षमाणोऽपि कौशिकः। मांसमन्नं फलं मूलमन्यद् वा तत्र किञ्चन ॥ ३४ ॥ विश्वामित्र वहाँ घर-घर घूम-घूमकर भीख माँगते फिरे, परंतु कहीं भी उन्हें मांस, अन्न, फल, मूल या दूसरी कोई वस्तु प्राप्त न हो सकी ॥ ३४ ॥ अहो कृच्छ्रं मया प्राप्तमिति निश्चित्य कौशिकः। पपात भूमौ दौर्बल्यात् तस्मिंश्चाण्डालपक्कणे ॥ ३५ ॥ ‘अहो! यह तो मुझपर बड़ा भारी संकट आ गया।’ ऐसा सोचते-सोचते विश्वामित्र अत्यन्त दुर्बलताके कारण वहीं एक चाण्डालके घरमें पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५ ॥ स चिन्तयामास मुनिः किं नु मे सुकृतं भवेत्। कथं वृथा न मृत्युः स्यादिति पार्थिवसत्तम ॥ ३६ ॥ नृपश्रेष्ठ! अब वे मुनि यह विचार करने लगे कि किस तरह मेरा भला होगा? क्या उपाय किया जाय, जिससे अन्नके बिना मेरी व्यर्थ मृत्यु न हो सके? ॥ ३६ ॥ स ददर्श श्वमांसस्य कुतन्त्रीं विततां मुनिः। चाण्डालस्य गृहे राजन् सद्यः शस्त्रहतस्य वै ॥ ३७ ॥ राजन्! इतने हीमें उन्होंने देखा कि चाण्डालके घरमें तुरंतके शस्त्रद्वारा मारे हुए कुत्तेकी जाँघके मांसका एक बड़ा-सा टुकड़ा पड़ा है ॥ ३७ ॥