महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 946, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस चिन्तयामास तदा स्तैन्यं कार्यमितो मया । न हीदानीमुपायो मे विद्यते प्राणधारणे ॥ ३८ ॥ तब मुनिने सोचा कि ‘मुझे यहाँसे इस मांसकी चोरी करनी चाहिये; क्योंकि इस समय मेरे लिये अपने प्राणोंकी रक्षाका दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ ३८ ॥
आपत्सु विहितं स्तैन्यं विशिष्टसमहीनतः । विप्रेण प्राणरक्षार्थं कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ ३९ ॥ ‘आपत्तिकालमें प्राणरक्षाके लिये ब्राह्मणको श्रेष्ठ, समान तथा हीन मनुष्यके घरसे चोरी कर लेना उचित है, यह शास्त्रका निश्चित विधान है ॥ ३९ ॥
हीनादादेयमादौ स्यात् समानात् तदनन्तरम् । असम्भवे वाऽऽददीत विशिष्टादपि धार्मिकात् ॥ ४० ॥ ‘पहले हीन पुरुषके घरसे उसे भक्ष्य पदार्थकी चोरी करनी चाहिये। वहाँ काम न चले तो अपने समान व्यक्तिके घरसे खानेकी वस्तु लेनी चाहिये, यदि वहाँ भी अभीष्टसिद्धि न हो सके तो अपनेसे विशिष्ट धर्मात्मा पुरुषके यहाँसे वह खाद्य वस्तुका अपहरण कर ले ॥ ४० ॥
सोऽहमान्त्यावसायानां हराम्येनां प्रतिग्रहात् । न स्तैन्यदोषं पश्यामि हरिष्यामि श्वजाघनीम् ॥ ४१ ॥ ‘अतः इन चाण्डालोंके घरसे मैं यह कुत्तेकी जाँघ चुराये लेता हूँ। किसीके यहाँ दान लेनेसे अधिक दोष मुझे इस चोरीमें नहीं दिखायी देता है; अतः अवश्य ही इसका अपहरण करूँगा’ ॥ ४१ ॥
एतां बुद्धिं समास्थाय विश्वामित्रो महामुनिः । तस्मिन् देशे स सुष्याप श्वपचो यत्र भारत ॥ ४२ ॥ भरतनन्दन! ऐसा निश्चय करके महामुनि विश्वामित्र उसी स्थानपर सो गये, जहाँ चाण्डाल रहा करते थे ॥ ४२ ॥
स विगाढां निशां दृष्ट्वा सुप्ते चाण्डालपक्कणे । शनैरुत्थाय भगवान् प्रविवेश कुटीमथम् ॥ ४३ ॥ जब प्रगाढ अन्धकारसे युक्त आधी रात हो गयी और चाण्डालके घरके सभी लोग सो गये, तब भगवान् विश्वामित्र धीरेसे उठकर उस चाण्डालकी कुटियामें घुस गये ॥ ४३ ॥
स सुप्त इव चाण्डालः श्लेष्मापिहितलोचनः । परिभिन्नस्वरो रूक्षः प्रोवाचाप्रियदर्शनः ॥ ४४ ॥ वह चाण्डाल सोया हुआ जान पड़ता था। उसकी आँखें कीचड़से बंद-सी हो गयी थीं; परंतु वह जागता था। वह देखनेमें बड़ा भयानक था। स्वभावका रूखा भी प्रतीत होता था। मुनिको आया देख वह फटे हुए स्वरमें बोल उठा ॥ ४४ ॥
श्वपच उवाच