महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 937, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'प्रहार करनेके लिये उद्यत होकर भी प्रिय वचन बोले, प्रहार करनेके पश्चात् भी प्रिय वाणी ही बोले, तलवारसे शत्रुको मस्तक काटकर भी उसके लिये शोक करे और रोये ।। ५४ ।।
निमन्त्रयीत सान्त्वेन सम्मानेन तितिक्षया ।
लोकाराधनमित्येतत् कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।। ५५ ।।
'ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको मधुर वचन बोलकर दूसरोंका सम्मान करके और सहनशील होकर लोगोंको अपने पास आनेके लिये निमन्त्रित करना चाहिये, यही लोककी आराधना अथवा साधारण जनताका सम्मान है। इसे अवश्य करना चाहिये ।। ५५ ।।
न शुष्कवैरं कुर्वीत बाहुभ्यां न नदीं तरेत् ।
अनर्थकमनायुष्यं गोविषाणस्य भक्षणम् ।
दन्ताश्च परिमृज्यन्ते रसश्चापि न लभ्यते ।। ५६ ।।
'सूखा वैर न करे तथा दोनों बाँहोंसे तैरकर नदीके पार न जाय। यह निरर्थक और आयुनाशक कर्म है। यह कुत्तेके द्वारा गायका सींग चबाने-जैसा कार्य है, जिससे उसके दाँत भी रगड़ उठते हैं और रस भी नहीं मिलता है ।। ५६ ।।
त्रिवर्गे त्रिविधा पीडानुबन्धास्त्रय एव च ।
अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडाश्च परिवर्जयेत् ।। ५७ ।।
धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें लोभ, मूर्खता और दुर्बलता-यह तीन प्रकारकी बाधा-अड़चन उपस्थित होती है। उसी प्रकार उनके शान्ति, सर्वहितकारी कर्म और उपभोग—ये तीन ही प्रकारके फल होते हैं। इन (तीनों प्रकारके) फलोंको शुभ जानना चाहिये; परंतु (उक्त तीनों प्रकारकी) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये ।। ५७ ।।
ऋणशेषमग्निशेषं शत्रुशेषं तथैव च ।
पुनः पुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न धारयेत् ।। ५८ ।।
'ऋण, अग्नि और शत्रुमेंसे कुछ बाकी रह जाय तो वह बारंबार बढ़ता रहता है; इसलिये इनमेंसे किसीको शेष नहीं छोड़ना चाहिये ।। ५८ ।।
वर्धमानमृणं तिष्ठेत् परिभूताश्च शत्रवः ।
जनयन्ति भयं तीव्रं व्याधयश्चाप्युपेक्षिताः ।। ५९ ।।
'यदि बढ़ता हुआ ऋण रह जाय, तिरस्कृत शत्रु जीवित रहें और उपेक्षित रोग शेष रह जायँ तो ये सब तीव्र भय उत्पन्न करते हैं ।। ५९ ।।
नासम्यक् कृतकारी स्यादप्रमत्तः सदा भवेत् ।
कण्टकोऽपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम् ।। ६० ।।
'किसी कार्यको अच्छी तरह सम्पन्न किये बिना न छोड़े और सदा सावधान रहे। शरीरमें गड़ा हुआ काँटा भी यदि पूर्णरूपसे निकाल न दिया जाय—उसका कुछ भाग शरीरमें ही टूटकर रह जाय तो वह चिरकालतक विकार उत्पन्न करता है ।। ६० ।।