महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 938, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवधेन च मनुष्याणां मार्गाणां दूषणेन च । अगाराणां विनाशैश्च परराष्ट्रं विनाशयेत् ॥ ६१ ॥ 'मनुष्योंका वध करके, सड़कें तोड़-फोड़कर और घरोंको नष्ट-भ्रष्ट करके शत्रुके राष्ट्रका विध्वंस करना चाहिये ॥ ६१ ॥ गृध्रदृष्टिर्बकलीनः श्वचेष्टः सिंहविक्रमः । अनुद्विग्नः काकशङ्की भुजङ्गरितं चरेत् ॥ ६२ ॥ 'राजा गीधके समान दूरतक दृष्टि डाले, बगुलेके समान लक्ष्यपर दृष्टि जमाये, कुत्तेके समान चौकन्ना रहे और सिंह के समान पराक्रम प्रकट करे, मनमें उद्वेग को स्थान न दे, कौएकी भाँति सशंक रहकर दूसरोंकी चेष्टा पर ध्यान रक्खे और दूसरेके बिलमें प्रवेश करनेवाले सर्पके समान शत्रु का छिद्र देखकर उसपर आक्रमण करे ॥ ६२ ॥ शूरमञ्जलिपातेन भीरुं भेदेन भेदयेत् । लुब्धमर्थप्रदानेन समं तुल्येन विग्रहः ॥ ६३ ॥ 'जो अपनेसे शूरवीर हो, उसे हाथ जोड़कर वशमें करे, जो डरपोक हो, उसे भय दिखाकर फोड़ ले लोभीको धन देकर काबूमें कर ले तथा जो बराबर हो उसके साथ युद्ध छेड़ दे ॥ ६३ ॥ श्रेणीमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च । अमात्यान् परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि ॥ ६४ ॥ अनेक जातिके लोग जो एक कार्यके लिये संगठित होकर अपना दल बना लेते हैं, उस दलको श्रेणी कहते हैं। ऐसी श्रेणियोंके जो प्रधान हैं, उनमें जब भेद डाला जा रहा हो और अपने मित्रोंको अनुनय-विनयके द्वारा जब दूसरे लोग अपनी ओर खींच रहे हों तथा जब सब ओर भेदनीति और दलबंदीके जाल बिछाये जा रहे हों, ऐसे अवसरोंपर अपने मन्त्रियोंकी पूर्णरूपसे रक्षा करनी चाहिये। (न तो वे फूटने पावें और और न स्वयं ही कोई दल बनाकर अपने विरुद्ध कार्य करने पावें। इसके लिये सतत सावधान रहना चाहिये) ॥ ६४ ॥ मृदुरित्यवजानन्ति तीक्ष्ण इत्युद्विजन्ति च । तीक्ष्णकाले भवेत् तीक्ष्णो मृदुकाले मृदुर्भवेत् ॥ ६५ ॥ 'राजा सदा कोमल रहे तो लोग उसकी अवहेलना करते हैं और सदा कठोर बना रहे तो उससे उद्विग्न हो उठते हैं, अतः जब कठोरता दिखाने का समय हो तो वह कठोर बने और जब कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेका अवसर हो तो कोमल बन जाय ॥ ६५ ॥ मृदुनैव मृदुं हन्ति मृदुना हन्ति दारुणम् । नासाध्यं मृदुना किंचित् तस्मात् तीक्ष्णतरो मृदुः ॥ ६६ ॥ 'बुद्धिमान् राजा कोमल उपायसे कोमल शत्रु का नाश करता है और कोमल उपायसे ही दारुण शत्रु का भी संहार कर डालता है। कोमल उपायसे कुछ भी असाध्य नहीं है; अतः