भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 939, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 939

कोमल ही अत्यन्त तीक्ष्ण है॥ ६६ ॥ काले मृदुर्ग्रो भवति काले भवति दारुणः। प्रसाधयति कृत्यानि शत्रुं चाप्यधितिष्ठति ॥ ६७ ॥ 'जो समयपर कोमल होता है और समयपर कठोर बन जाता है, वह अपने सारे कार्य सिद्ध कर लेता है और शत्रु पर भी उसका अधिकार हो जाता है ॥ ६७ ॥ पण्डितेन विरुद्धः सन् दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत्। दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः ॥ ६८ ॥ 'विद्वान् पुरुषसे विरोध करके 'मैं दूर हूँ' ऐसा समझकर निश्चिन्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि बुद्धिमान्‌की बाँहे बहुत बड़ी होती हैं (उसके द्वारा किये गये प्रतीकारके उपाय दूरतक प्रभाव डालते हैं), अतः यदि बुद्धिमान् पुरुषपर चोट की गयी तो वह अपनी उन विशाल भुजाओं द्वारा दूरसे भी शत्रु का विनाश कर सकता है॥ ६८ ॥ न तत् तरेद् यस्य न पारमुत्तरे- न्न तद्धरेद् यत् पुनराहरेत् परः। न तत् खनेद् यस्य न मूलमुद्धरे- न्न तं हन्याद् यस्य शिरो न पातयेत् ॥ ६९ ॥ 'जिसके पार न उतर सके, उस नदीको तैरनेका साहस न करे। जिसको शत्रु पुनः बलपूर्वक वापस ले सके ऐसे धनका अपहरण ही न करे। ऐसे वृक्ष या शत्रुको खोदने या नष्ट करनेकी चेष्टा न करे जिसकी जड़को उखाड़ फेंकना सम्भव न हो सके तथा उस वीरपर आघात न करे, जिसका मस्तक काटकर धरतीपर गिरा न सके ॥ इतीदमुक्तं वृजिनाभिसंहितं न चैतदेवं पुरुषः समाचरेत्। परप्रयुक्ते न कथं विभावये- दतो मयोक्तं भवतो हितार्थिना ॥ ७० ॥ 'यह जो मैंने शत्रुके प्रति पापपूर्ण बर्तावका उपदेश किया है, इसे समर्थ पुरुष सम्पत्तिके समय कदापि आचरणमें न लावे। परंतु जब शत्रु ऐसे ही बर्तावोंद्वारा अपने ऊपर संकट उपस्थित कर दे, तब उसके प्रतीकारके लिये वह इन्हीं उपायोंको काममें लानेका विचार क्यों न करे, इसीलिये तुम्हारे हितकी इच्छासे मैंने यह सब कुछ बताया है' ॥ ७० ॥ यथावदुक्तं वचनं हितार्थिना निशम्य विप्रेण सुवीरराष्ट्रपः। तथाकरोद् वाक्यमदीनचेतनः श्रियं च दीप्तां बुभुजे सबान्धवः ॥ ७१ ॥ हितार्थी ब्राह्मण भारद्वाज कणिककी कही हुई उन यथार्थ बातोंको सुनकर सौवीरदेशके राजाने उनका यथोचितरूपसे पालन किया, जिससे वे बन्धु-बान्धवों-सहित