भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 883

'आपत्तिमें पड़कर विनाशके समीप पहुँचे हुए प्राणियोंको भी अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न तो करना ही चाहिये। आज सब ओरसे प्राणोंका संशय उपस्थित है; अतः यह मुझपर बड़ी भारी आपत्ति आ गयी है।। ३६ १/२ ।। गतं मां सहसा भूमिं नकुलो भक्षयिष्यति ।। ३७ ।। उलूकश्चेह तिष्ठन्तं मार्जारः पाशसंक्षयात् । 'यदि मैं पृथ्वीपर उतरकर भागता हूँ तो सहसा नेवला मुझे पकड़कर खा जायगा। यदि यहीं ठहर जाता हूँ तो उल्लू मुझे चोंचसे मार डालेगा और यदि जाल काटकर भीतर घुसता हूँ तो बिलाव जीवित नहीं छोड़ेगा ।। ३७ १/२ ।। न त्वेवास्मद्विधः प्राज्ञः सम्मोहं गन्तुमर्हति ।। ३८ ।। करिष्ये जीविते यत्नं यावद् युक्त्या प्रतिग्रहात् । 'तथापि मुझ-जैसे बुद्धिमान्‌को घबराना नहीं चाहिये। अतः जहाँतक युक्ति काम देगी, परस्पर सहयोगका आदान-प्रदान करके मैं जीवन-रक्षाके लिये प्रयत्न करूँगा ।। ३८ १/२ ।। न हि बुद्ध्यान्वितः प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ।। ३९ ।। निमज्जत्यापदं प्राप्य महतीं दारुणामपि ।। ४० ।। 'बुद्धिमान्, विद्वान् और नीतिशास्त्रमें निपुण पुरुष भारी और भयंकर विपत्तिमें पड़नेपर भी उसमें डूब नहीं जाता है—उससे छूटनेकी चेष्टा करता है ।। ३९-४० ।। न त्वन्यामिह मार्जाराद् गतिं पश्यामि साम्प्रतम् । विषमस्थो ह्ययं शत्रुः कृत्यं चास्य महन्मया ।। ४१ ।। 'मैं इस समय इस बिलावका सहारा लेनेके सिवा, अपने लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं देखता। यद्यपि यह मेरा कट्टर शत्रु है, तथापि इस समय स्वयं ही भारी संकटमें पड़ा हुआ है। मेरे द्वारा इसका भी बड़ा भारी काम निकल सकता है ।। ४१ ।। जीवितार्थी कथं त्वद्य शत्रुभिः प्रार्थितस्त्रिभिः । तस्मादेनमहं शत्रुं मार्जारं संश्रयामि वै ।। ४२ ।। 'इधर, मैं भी जीवनकी रक्षा चाहता हूँ, तीन-तीन शत्रु मुझपर घात लगाये बैठे हैं; अतः क्यों न आज मैं अपने शत्रु इस बिलावका ही आश्रय लूँ? ।। ४२ ।। नीतिशास्त्रं समाश्रित्य हितमस्योपवर्णये । येनेमं शत्रुसंघातं मतिपूर्वेण वञ्चये ।। ४३ ।। 'आज नीतिशास्त्रका सहारा लेकर इसके हितका वर्णन करूँगा जिससे बुद्धिके द्वारा इस शत्रुसमुदायको धोखा देकर बच जाऊँगा ।। ४३ ।। अयमत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गतः । मूढो ग्राहयितुं स्वार्थं सङ्गत्या यदि शक्यते ।। ४४ ।। 'इसमें संदेह नहीं कि बिलाव मेरा महान् दुश्मन है, तथापि इस समय महान् संकटमें है। यदि सम्भव हो तो इस मूर्खको संगतिके द्वारा स्वार्थ सिद्ध करनेकी बातपर राजी