महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही मैं तुम्हारी रक्षा करनेमें समर्थ हूँ ।।
उलूकाच्चैव मां रक्ष क्षुद्रः प्रार्थयते हि माम् ।
अहं छेत्स्यामि ते पाशान् सखे सत्येन ते शपे ।। ७५ ।।
'इधर यह नीच उल्लू भी मेरे प्राणका ग्राहक बना हुआ है। इससे भी तुम मुझे बचा लो। सखे! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, मैं तुम्हारे बन्धन काट दूँगा' ।। ७५ ।।
तद्वचः संगतं श्रुत्वा लोमशो युक्तमर्थवत् ।
हर्षादुद्वीक्ष्य पलितं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ।। ७६ ।।
चूहेकी यह युक्तियुक्त, सुसंगत और अभिप्रायपूर्ण बात सुनकर लोमशने उसकी ओर हर्षभरी दृष्टिसे देखा तथा स्वागतपूर्वक उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ७६ ।।
तं सम्पूज्याथ पलितं मार्जारः सौहृदे स्थितः ।
स विचिन्त्याब्रवीद् धीरः प्रीतस्त्वरित एव च ।। ७७ ।।
इस प्रकार पलितकी प्रशंसा एवं पूजा करके सौहार्दमें प्रतिष्ठित हुए धीरबुद्धि मार्जारने भलीभाँति सोच-विचारकर तुरंत ही प्रसन्नतापूर्वक कहा— ।। ७७ ।।
शीघ्रमागच्छ भद्रं ते त्वं मे प्राणसमः सखा ।
तव प्राज्ञ प्रसादाद्धि प्रायः प्राप्स्यामि जीवितम् ।। ७८ ।।
'भैया! शीघ्र आओ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम तो हमारे प्राणोंके समान प्रिय सखा हो। विद्वन्! इस समय मुझे प्रायः तुम्हारी ही कृपासे जीवन प्राप्त होगा ।। ७८ ।।
यद् यदेवंगतेनाद्य शक्यं कर्तुं मया तव ।
तदाज्ञापय कर्तास्मि संधिरेवास्तु नौ सखे ।। ७९ ।।
'सखे! इस दशामें पड़े हुए मुझ सेवकके द्वारा तुम्हारा जो-जो कार्य किया जा सकता हो, उसके लिये मुझे आज्ञा दो, मैं अवश्य करूँगा। हम दोनोंमें संधि रहनी चाहिये ।। ७९ ।।
अस्मात् तु संकटान्मुक्तः समित्रगणबान्धवः ।
सर्वकार्याणि कर्ताहं प्रियाणि च हितानि च ।। ८० ।।
'इस संकटसे मुक्त होनेपर मैं अपने सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ तुम्हारे सभी प्रिय एवं हितकर कार्य करता रहूँगा ।। ८० ।।
मुक्तश्च व्यसनादस्मात् सौम्याहमपि नाम ते ।
प्रीतिमुत्पादयेयं च प्रीतिकर्तुश्च सत्क्रियाम् ।। ८१ ।।
'सौम्य! इस विपत्तिसे छुटकारा पानेपर मैं भी तुम्हारे हृदयमें प्रीति उत्पन्न करूँगा। तुम मेरा प्रिय करनेवाले हो, अतः तुम्हारा भलीभाँति आदर-सत्कार करूँगा ।। ८१ ।।
प्रत्युपकुर्वन् बह्वपि न भाति
पूर्वोपकारिणा तुल्यः ।
एकः करोति हि कृते
निष्कारणमेव कुरुतेऽन्यः ।। ८२ ।।