भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 890

लीनः स तस्य गात्रेषु पलितो देशकालवित् । चिच्छेद पाशान् नृपते कालापेक्षी शनैः शनैः ॥ ८९ ॥ नरेश्वर! चूहा देश-कालकी गतिको अच्छी तरह जानता था; इसलिये वह बिलावके अंगोंमें ही छिपा रहकर चाण्डालके आनेके समयकी प्रतीक्षा करता हुआ धीरे-धीरे जालको काटने लगा ॥ ८९ ॥

अथ बन्धपरिक्लिष्टो मार्जारो वीक्ष्य मूषिकम् । छिन्दन्तं वै तदा पाशानत्वरन्तं त्वरान्वितः ॥ ९० ॥ तमत्वरन्तं पलितं पाशानां छेदने तथा । संचोदयितुमारेभे मार्जारो मूषिकं तदा ॥ ९१ ॥ बिलाव उस बन्धनसे तंग आ गया था। उसने देखा, चूहा जाल तो काट रहा है; किंतु इस कार्यमें फुर्ती नहीं दिखा रहा है, तब वह उतावला होकर बन्धन काटनेमें जल्दी न करनेवाले पलित नामक चूहेको उकसाता हुआ बोला— ॥ ९०-९१ ॥

किं सौम्य नातित्वरसे किं कृतार्थोऽवमन्यसे । छिन्धि पाशानमित्रघ्न पुरा श्वपच एति च ॥ ९२ ॥ ‘सौम्य! तुम जल्दी क्यों नहीं करते हो? क्या तुम्हारा काम बन गया, इसलिये मेरी अवहेलना करते हो? शत्रुसूदन! देखो, अब चाण्डाल आ रहा होगा। उसके आनेसे पहले ही मेरे बन्धनोंको काट दो’ ॥ ९२ ॥

इत्युक्तस्त्वरता तेन मतिमान् पलितोऽब्रवीत् । मार्जारमकृतप्रज्ञं पथ्यमात्महितं वचः ॥ ९३ ॥ उतावले हुए बिलावके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् पलितने अपवित्र विचार रखनेवाले उस मार्जारसे अपने लिये हितकर और लाभदायक बात कही— ॥ ९३ ॥

तूष्णीं भव न ते सौम्य त्वरा कार्या न सम्भ्रमः । वयमेवात्र कालज्ञा न कालः परिहास्यते ॥ ९४ ॥ ‘सौम्य चुप रहो, तुम्हें जल्दी नहीं करनी चाहिये, घबरानेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मैं समयको खूब पहचानता हूँ, ठीक अवसर आनेपर मैं कभी नहीं चूकूँगा ॥

अकाले कृत्यमारब्धं कर्तुर्नार्थाय कल्पते । तदेव काल आरब्धं महतेऽर्थाय कल्पते ॥ ९५ ॥ ‘बेमौके शुरू किया हुआ काम करनेवालेके लिये लाभदायक नहीं होता है और वही उपयुक्त समयपर आरम्भ किया जाय तो महान् अर्थका साधक हो जाता है ॥ ९५ ॥

अकाले विप्रमुक्तान्मे त्वत्त एव भयं भवेत् । तस्मात् कालं प्रतीक्षस्व किमिति त्वरसे सखे ॥ ९६ ॥ ‘यदि असमयमें ही तुम छूट गये तो मुझे तुम्हींसे भय प्राप्त हो सकता है, इसलिये मेरे मित्र! थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो; क्यों इतनी जल्दी मचा रहे हो? ॥ ९६ ॥