भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 891, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 891

यदा पश्यामि चाण्डालमायान्तं शस्त्रपाणिनम् । ततश्छेत्स्यामि ते पाशान् प्राप्ते साधारणे भये ॥ ९७ ॥ ‘जब मैं देख लूँगा कि चाण्डाल हाथमें हथियार लिये आ रहा है, तब तुम्हारे ऊपर साधारण-सा भय उपस्थित होनेपर मैं शीघ्र ही तुम्हारे बन्धन काट डालूँगा ॥ ९७ ॥

तस्मिन् काले प्रमुक्तस्त्वं तरुमेवाधिरोक्ष्यसे । न हि ते जीवितादन्यत् किंचित् कृत्यं भविष्यति ॥ ९८ ॥ ‘उस समय छूटते ही तुम पहले पेड़पर ही चढ़ोगे। अपने जीवनकी रक्षाके सिवा दूसरा कोई कार्य तुम्हें आवश्यक नहीं प्रतीत होगा ॥ ९८ ॥

ततो भवत्यपक्रान्ते त्रस्ते भीते च लोमश । अहं बिलं प्रवेक्ष्यामि भवान् शाखां भजिष्यति ॥ ९९ ॥ ‘लोमशजी! जब आप त्रास और भयसे आक्रान्त हो भाग खड़े होंगे, उस समय मैं बिलमें घुस जाऊँगा और आप वृक्षकी शाखापर जा बैठेंगे' ॥ ९९ ॥

एवमुक्तस्तु मार्जारो मूषिकेणात्मनो हितम् । वचनं वाक्यतत्त्वज्ञो जीवितार्थी महामतिः ॥ १०० ॥ चूहेके ऐसा कहनेपर वाणीके मर्मको समझनेवाला और अपने जीवनकी रक्षा चाहनेवाला परम बुद्धिमान् बिलाव अपने हितकी बात बताता हुआ बोला ॥ १०० ॥

अथात्मकृत्ये त्वरितः सम्यक् प्रश्रितमाचरन् । उवाच लोमशो वाक्यं मूषिकं चिरकारिणम् ॥ १०१ ॥ लोमशको अपना काम बनानेकी जल्दी लगी हुई थी; अतः वह भलीभाँति विनयपूर्ण बर्ताव करता हुआ विलम्ब करनेवाले चूहेसे इस प्रकार कहने लगा— ॥

न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवः । यथा त्वां मोक्षितः कृच्छ्रात् त्वरमाणेन वै मया ॥ १०२ ॥ ‘श्रेष्ठ पुरुष मित्रोंके कार्य बड़े प्रेम और प्रसन्नताके साथ किया करते हैं; तुम्हारी तरह नहीं। जैसे मैंने तुरंत ही तुम्हें संकटसे छुड़ा लिया था ॥ १०२ ॥

तथा हि त्वरमाणेन त्वया कार्यं हितं मम । यत्नं कुरु महाप्राज्ञ यथा रक्षाऽऽवयोर्भवेत् ॥ १०३ ॥ ‘इसी प्रकार तुम्हें भी जल्दी ही मेरे हितका कार्य करना चाहिये। महाप्राज्ञ! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे हम दोनोंकी रक्षा हो सके ॥ १०३ ॥

अथवा पूर्ववैरं त्वं स्मरन् कालं जिहीर्षसि । पश्य दुष्कृतकर्मंस्त्वं व्यक्तमायुःक्षयं तव ॥ १०४ ॥ ‘अथवा यदि पहलेके वैरका स्मरण करके तुम यहाँ व्यर्थ समय काटना चाहते हो तो पापी! देख लेना, इसका क्या फल होगा? निश्चय ही तुम्हारी आयु क्षीण हो चली है ॥ १०४ ॥