भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 999

त्रीणि वर्षाण्युपास्याग्निं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥ लगातार एक वर्षतक अग्निहोत्र करनेसे कलंकित पुरुष अपने ऊपर लगे हुए कलंकसे छूट जाता है। तीन वर्षोंतक अग्निकी उपासना करनेसे भ्रूणहत्यारा भी पापमुक्त हो जाता है ॥ २७ ॥

महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे । अभ्येत्य योजनशतं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ २८ ॥ महासरोवर पुष्कर, प्रभास तीर्थ तथा उत्तर मानसरोवर आदि तीर्थोंमें सौ योजनतककी पैदल यात्रा करनेसे भी भ्रूणहत्याके पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ २८ ॥

यावतः प्राणिनो हन्यात् तज्जातीयांस्तु तावतः । प्रमीयमानानुन्मोच्य प्राणिहा विप्रमुच्यते ॥ २९ ॥ प्राणियोंकी हत्या करनेवाला मनुष्य जितने प्राणियोंका वध करता है, उसी जातिके उतने ही प्राणियोंको मृत्युसे छुटकारा दिला दे अर्थात् उनको मरनेके संकटसे छुड़ा दे तो वह उनकी हत्याके पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २९ ॥

अपि चाप्सु निमज्जेत जपेस्त्रिरघमर्षणम् । यथाश्वमेधावभृथस्तथा तन्मनुरब्रवीत् ॥ ३० ॥ यदि मनुष्य तीन बार अघमर्षणका जप करते हुए जलमें गोता लगावे तो उसे अश्वमेधयज्ञमें अवभृथस्नान करनेका फल मिलता है, ऐसा मनुजीने कहा है ॥ ३० ॥

तत् क्षिप्रं नुदते पापं सत्कारं लभते तथा । अपि चैनं प्रसीदन्ति भूतानि जडमूकवत् ॥ ३१ ॥ वह अघमर्षण मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य शीघ्र ही अपने सारे पापोंको दूर कर देता है और उसे सर्वत्र सम्मान प्राप्त होता है। सब प्राणी जड एवं मूकके समान उसपर प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ३१ ॥

बृहस्पतिं देवगुरुं सुरासुराः सर्वे समेत्याभ्यनुयुज्य राजन् । धर्म्म फलं वेत्थ फलं महर्षे तथैव तस्मिन्नरके पारलोक्ये ॥ ३२ ॥

उभे तु यस्य सदृशे भवेतां किंस्वित् तयोस्तत्र जयोऽथ न स्यात् । आचक्ष्व नः पुण्यफलं महर्षे कथं पापं नुदते धर्मशीलः ॥ ३३ ॥

राजन्! एक समय सब देवताओं और असुरोंने बड़े आदरके साथ देवगुरु बृहस्पतिके निकट जाकर पूछा—'महर्षे! आप धर्मका फल जानते हैं। इसी प्रकार परलोकमें जो पापोंके फलस्वरूप नरकका कष्ट भोगना पड़ता है, वह भी आपसे अज्ञात नहीं है, परंतु