भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1113, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1113

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

के भोज्या ब्राह्मणस्येह के भोज्याः क्षत्रियस्य ह ।
तथा वैश्यस्य के भोज्याः के शूद्रस्य च भारत ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! इस जगत्में ब्राह्मणको किनके यहाँ भोजन करना चाहिये, क्षत्रियको किनके घरका अन्न ग्रहण करना चाहिये तथा वैश्य और शूद्रको किन-किन लोगोंके घर भोजन करना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणा ब्राह्मणस्येह भोज्या ये चैव क्षत्रियाः ।
वैश्याश्चापि तथा भोज्याः शूद्राश्च परिवर्जिताः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— बेटा! इस लोकमें ब्राह्मणको ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यके घर भोजन करना चाहिये। शूद्रके घर भोजन करना उसके लिये निषिद्ध है ॥ २ ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या भोज्या वै क्षत्रियस्य ह ।
वर्जनीयास्तु वै शूद्राः सर्वभक्षा विकर्मिणः ॥ ३ ॥

इसी प्रकार क्षत्रियको ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यके घर ही भोजन ग्रहण करना चाहिये। भक्ष्य-अभक्ष्यका विचार न करके सब कुछ खानेवाले और शास्त्रके विरुद्ध आचरण करनेवाले शूद्रोंका अन्न उसके लिये भी त्याज्य है ॥ ३ ॥

वैश्यास्तु भोज्या विप्राणां क्षत्रियाणां तथैव च ।
नित्याग्नयो विविक्ताश्च चातुर्मास्यरताश्च ये ॥ ४ ॥

वैश्योंमें भी जो नित्य अग्निहोत्र करनेवाले, पवित्रतासे रहनेवाले और चातुर्मास्य-व्रतका पालन करनेवाले हैं, उन्हींका अन्न ब्राह्मण और क्षत्रियोंके लिये ग्राह्य है ॥ ४ ॥

शूद्राणामथ यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते पृथिवीमलम् ।
मलं नृणां स पिबति मलं भुङ्क्ते जनस्य च ॥ ५ ॥

जो द्विज शूद्रोंके घरका अन्न खाता है, वह समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण मनुष्योंके मलका ही पान और भक्षण करता है ॥ ५ ॥

शूद्राणां यस्तथा भुङ्क्ते स भुङ्क्ते पृथिवीमलम् ।
पृथिवीमलमश्नन्ति ये द्विजाः शूद्रभोजिनः ॥ ६ ॥