महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1114, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो शूद्रोंका अन्न खाता है, वह पृथ्वीका मल खाता है। शूद्रान्न भोजन करनेवाले सभी द्विज पृथ्वीका मल ही खाते हैं ॥ ६ ॥ शूद्रस्य कर्मनिष्ठायां विकर्मस्थोऽपि पच्यते । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यो विकर्मस्थश्च पच्यते ॥ ७ ॥ जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य शूद्रके कर्मोंमें संलग्न रहनेवाला हो, वह यदि विशिष्ट कर्म—संध्या-वन्दन आदिमें संलग्न रहनेवाला हो, तो भी नरकमें पकाया जाता है। यदि शूद्रके कर्म न करके भी वह शास्त्रविरुद्ध कर्ममें संलग्न रहता हो तो भी उसे नरककी यातना भोगनी पड़ती है ॥ ७ ॥ स्वाध्यायनिरता विप्रास्तथा स्वस्त्ययने नृणाम् । रक्षणे क्षत्रियं प्राहुर्वैश्यं पुष्ट्यर्थमेव च ॥ ८ ॥ ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और मनुष्योंके लिये मंगलकारी कार्यमें लगे रहनेवाले होते हैं। क्षत्रियको सबकी रक्षामें तत्पर बताया गया है और वैश्यको प्रजाकी पुष्टिके लिये कृषि, गोरक्षा आदि कार्य करने चाहिये ॥ ८ ॥ करोति कर्म यद् वैश्यस्तद् गत्वा ह्युपजीवति । कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमकुत्सा वैश्यकर्मणि ॥ ९ ॥ वैश्य जो कर्म करता है, उसका आश्रय लेकर सब लोग जीविका चलाते हैं। कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य—ये वैश्यके अपने कर्म हैं। इससे उसको घृणा नहीं होनी चाहिये ॥ ९ ॥ शूद्रकर्म तु यः कुर्यादवहाय स्वकर्म च । स विज्ञेयो यथा शूद्रो न च भोज्यः कदाचन ॥ १० ॥ जो वैश्य अपना कर्म छोड़कर शूद्रका कर्म करता है, उसे शूद्रके समान ही जानना चाहिये और उसके यहाँ कभी भोजन नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥ चिकित्सकः काण्डपृष्ठः पुराध्यक्षः पुरोहितः । सांवत्सरो वृथाध्यायी सर्वे ते शूद्रसम्मिताः ॥ ११ ॥ जो चिकित्सा करनेवाला, शास्त्र बेचकर जीविका चलानेवाला, ग्रामाध्यक्ष, पुरोहित, वर्षफल बतानेवाला ज्योतिषी और वेद-शास्त्रसे भिन्न व्यर्थकी पुस्तकें पढ़नेवाला है, वे सबके सब ब्राह्मण शूद्रके समान हैं ॥ ११ ॥ शूद्रकर्मस्थथैतेषु यो भुङ्क्ते निरपत्रपः । अभोज्यभोजनं भुक्त्वा भयं प्राप्नोति दारुणम् ॥ १२ ॥ जो निर्लज्ज मनुष्य शूद्रोचित कर्म करनेवाले इन द्विजोंके घर भोजन करता है, वह अभक्ष्य-भक्षणका पाप करके दारुण भयको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥ कुलं वीर्यं च तेजश्च तिर्यग्योनित्वमेव च । स प्रयाति यथा श्वा वै निष्क्रियो धर्मवर्जितः ॥ १३ ॥