महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसके कुल, वीर्य और तेज नष्ट हो जाते हैं तथा वह धर्म-कर्मसे हीन होकर कुत्तेकी भाँति तिर्यक्-योनिमें पड़ जाता है ॥ १३ ॥
भुङ्क्ते चिकित्सकस्यान्नं तदन्नं च पुरीषवत् ।
पुंश्चल्यन्नं च मूत्रं स्यात् कारुकान्नं च शोणितम् ॥ १४ ॥
जो चिकित्सा करनेवाले वैद्यका अन्न खाता है, उसका वह अन्न विष्ठाके समान है। व्यभिचारिणी स्त्री या वेश्याका अन्न मूत्रके समान है। कारीगरका अन्न रक्तके तुल्य है ॥ १४ ॥
विद्योपजीविनोऽन्नं च यो भुङ्क्ते साधुसम्मतः ।
तदप्यन्नं यथा शौद्रं तत् साधुः परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित पुरुष विद्या बेचकर जीविका चलानेवाले ब्राह्मणका अन्न खाता है, उसका वह अन्न भी शूद्रान्नके ही समान है। अतः साधु पुरुषको उसका परित्याग कर देना चाहिये ॥ १५ ॥
वचनीयस्य यो भुङ्क्ते तमाहुः शोणितं ह्रदम् ।
पिशुनं भोजनं भुङ्क्ते ब्रह्महत्यासमं विदुः ॥ १६ ॥
असत्कृतमवज्ञातं न भोक्तव्यं कदाचन ॥ १७ ॥
जो कलंकित मनुष्यका अन्न ग्रहण करता है, उसे रक्तका कुण्ड कहते हैं। जो चुगलखोरके यहाँ भोजन करता है, उसका वह भोजन करना ब्रह्महत्याके समान माना गया है। असत्कार और अवहेलनापूर्वक मिले हुए भोजनको कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये ॥ १६-१७ ॥
व्याधिं कुलक्षयं चैव क्षिप्रं प्राप्नोति ब्राह्मणः ।
नगरीरक्षिणो भुङ्क्ते श्वपचप्रवणो भवेत् ॥ १८ ॥
जो ब्राह्मण ऐसे अन्नको भोजन करता है, वह रोगी होता है और शीघ्र ही उसके कुलका संहार हो जाता है। जो नगररक्षकका अन्न खाता है, वह चण्डालके समान होता है ॥ १८ ॥
गोघ्ने च ब्राह्मणघ्ने च सुरापे गुरुतल्पगे ।
भुक्त्वाऽन्नं जायते विप्रो रक्षसां कुलवर्धनः ॥ १९ ॥
गोवध, ब्राह्मणवध, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करनेवाले मनुष्यके यहाँ भोजन कर लेनेपर ब्राह्मण राक्षसोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है ॥ १९ ॥
न्यासापहारिणो भुक्त्वा कृतघ्ने क्लीबवर्तिनि ।
जायते शबरावासे मध्यदेशबहिष्कृते ॥ २० ॥
धरोहर हड़पनेवाले, कृतघ्न तथा नपुंसकका अन्न खा लेनेसे मनुष्य मध्यदेशबहिष्कृत भीलोंके घरमें जन्म लेता है ॥ २० ॥
अभोज्याश्चैव भोज्याश्च मया प्रोक्ता यथाविधि ।
किमन्यदद्य कौन्तेय मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥ २१ ॥