महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उसके कुल, वीर्य और तेज नष्ट हो जाते हैं तथा वह धर्म-कर्मसे हीन होकर कुत्तेकी भाँति तिर्यक्-योनिमें पड़ जाता है ॥ १३ ॥
भुङ्क्ते चिकित्सकस्यान्नं तदन्नं च पुरीषवत् ।
पुंश्चल्यन्नं च मूत्रं स्यात् कारुकान्नं च शोणितम् ॥ १४ ॥
जो चिकित्सा करनेवाले वैद्यका अन्न खाता है, उसका वह अन्न विष्ठाके समान है। व्यभिचारिणी स्त्री या वेश्याका अन्न मूत्रके समान है। कारीगरका अन्न रक्तके तुल्य है ॥ १४ ॥
विद्योपजीविनोऽन्नं च यो भुङ्क्ते साधुसम्मतः ।
तदप्यन्नं यथा शौद्रं तत् साधुः परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित पुरुष विद्या बेचकर जीविका चलानेवाले ब्राह्मणका अन्न खाता है, उसका वह अन्न भी शूद्रान्नके ही समान है। अतः साधु पुरुषको उसका परित्याग कर देना चाहिये ॥ १५ ॥
वचनीयस्य यो भुङ्क्ते तमाहुः शोणितं ह्रदम् ।
पिशुनं भोजनं भुङ्क्ते ब्रह्महत्यासमं विदुः ॥ १६ ॥
असत्कृतमवज्ञातं न भोक्तव्यं कदाचन ॥ १७ ॥
जो कलंकित मनुष्यका अन्न ग्रहण करता है, उसे रक्तका कुण्ड कहते हैं। जो चुगलखोरके यहाँ भोजन करता है, उसका वह भोजन करना ब्रह्महत्याके समान माना गया है। असत्कार और अवहेलनापूर्वक मिले हुए भोजनको कभी नहीं ग्रहण करना चाहिये ॥ १६-१७ ॥
व्याधिं कुलक्षयं चैव क्षिप्रं प्राप्नोति ब्राह्मणः ।
नगरीरक्षिणो भुङ्क्ते श्वपचप्रवणो भवेत् ॥ १८ ॥
जो ब्राह्मण ऐसे अन्नको भोजन करता है, वह रोगी होता है और शीघ्र ही उसके कुलका संहार हो जाता है। जो नगररक्षकका अन्न खाता है, वह चण्डालके समान होता है ॥ १८ ॥
गोघ्ने च ब्राह्मणघ्ने च सुरापे गुरुतल्पगे ।
भुक्त्वाऽन्नं जायते विप्रो रक्षसां कुलवर्धनः ॥ १९ ॥
गोवध, ब्राह्मणवध, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करनेवाले मनुष्यके यहाँ भोजन कर लेनेपर ब्राह्मण राक्षसोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है ॥ १९ ॥
न्यासापहारिणो भुक्त्वा कृतघ्ने क्लीबवर्तिनि ।
जायते शबरावासे मध्यदेशबहिष्कृते ॥ २० ॥
धरोहर हड़पनेवाले, कृतघ्न तथा नपुंसकका अन्न खा लेनेसे मनुष्य मध्यदेशबहिष्कृत भीलोंके घरमें जन्म लेता है ॥ २० ॥
अभोज्याश्चैव भोज्याश्च मया प्रोक्ता यथाविधि ।
किमन्यदद्य कौन्तेय मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि ॥ २१ ॥
कुन्तीनन्दन! जिनके यहाँ खाना चाहिये और जिनके यहाँ नहीं खाना चाहिये, ऐसे लोगोंका मैंने विधिवत् परिचय दे दिया। अब मुझसे और क्या सुनना चाहते हो ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भोज्याभोज्यान्नकथनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भोज्याभोज्यान्नकथन नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका
षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त
युधिष्ठिर उवाच
उक्तास्तु भवता भोज्यास्तथाभोज्याश्च सर्वशः ।
अत्र मे प्रश्नसंदेहस्तन्मे वद पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने भोज्यान्न और अभोज्यान्न सभी तरहके मनुष्योंका वर्णन किया; किंतु इस विषयमें मुझे पूछनेयोग्य एक संदेह उत्पन्न हो गया। उसका मेरे लिये समाधान कीजिये ॥ १ ॥
ब्राह्मणानां विशेषेण हव्यकव्यप्रतिग्रहे ।
नानाविधेषु भोज्येषु प्रायश्चित्तानि शंस मे ॥ २ ॥
प्रायः ब्राह्मणोंको ही हव्य और कव्यका प्रतिग्रह लेना पड़ता है और उन्हें ही नाना प्रकारके अन्न ग्रहण करनेका अवसर आता है। ऐसी दशामें उन्हें पाप लगते हैं, उनका क्या प्रायश्चित्त है? यह मुझे बतावें ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
हन्त वक्ष्यामि ते राजन् ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।
प्रतिग्रहेषु भोज्ये च मुच्यते येन पाप्मनः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! महात्मा ब्राह्मणोंको प्रतिग्रह लेने और भोजन करनेके पापसे जिस प्रकार छुटकारा मिलता है, वह प्रायश्चित्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
घृतप्रतिग्रहे चैव सावित्री समिदाहुतिः ।
तिलप्रतिग्रहे चैव सममेतद् युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! ब्राह्मण यदि घीका दान ले तो गायत्री-मन्त्र पढ़कर अग्निमें समिधाकी आहुति दे। तिलका दान लेनेपर भी यही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ये दोनों कार्य समान हैं ॥ ४ ॥
मांसप्रतिग्रहे चैव मधुनो लवणस्य च ।
आदित्योदयनं स्थित्वा पूतो भवति ब्राह्मणः ॥ ५ ॥
फलका गूदा, मधु और नमकका दान लेनेपर उस समयसे लेकर सूर्योदयतक खड़े रहनेसे ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है ॥ ५ ॥
काञ्चनं प्रतिगृह्याथ जपमानो गुरुश्रुतिम् ।
कृष्णायासं च विवृतं धारयन् मुच्यते द्विजः ॥ ६ ॥
सुवर्णका दान लेकर गायत्री-मन्त्रका जप करने और खुले तौरपर काले लोहेका दंड धारण करनेसे ब्राह्मण उसके दोषसे छुटकारा पाता है ।। ६ ।। एवं प्रतिगृहीतेऽथ धने वस्त्रे तथा स्त्रियाम् । एवमेव नरश्रेष्ठ सुवर्णस्य प्रतिग्रहे ।। ७ ।। अन्नप्रतिग्रहे चैव पायसेक्षुरसे तथा । नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार धन, वस्त्र, कन्या, अन्न, खीर और ईखके रसका दान ग्रहण करनेपर भी सुवर्ण-दानके समान ही प्रायश्चित्त करे ।। ७ १/२ ।। इक्षुतैलपवित्राणां त्रिसंध्येऽप्सु निमज्जनम् ।। ८ ।। व्रीहौ पुष्पे फले चैव जले पिष्टमये तथा । यावके दधिदुग्धे च सावित्रीं शतशोऽन्विताम् ।। ९ ।। गन्ना, तेल और कुशोंका प्रतिग्रह स्वीकार करनेपर त्रिकाल स्नान करना चाहिये। धान, फूल, फल, जल, पूआ, जौकी लपसी और दही-दूधका दान लेनेपर सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये ।। ८-९ ।। उपानहौ च च्छत्रं च प्रतिगृह्यौर्ध्वदेहिके । जपेच्छतं समायुक्तस्तेन मुच्येत पाप्मना ।। १० ।। श्राद्धमें जूता और छाता ग्रहण करनेपर एकाग्रचित्त हो यदि सौ बार गायत्री-मन्त्रका जप करे तो उस प्रतिग्रहके दोषसे छुटकारा मिल जाता है ।। १० ।। क्षेत्रप्रतिग्रहे चैव ग्रहसूतकयोस्तथा । त्रीणि रात्राण्युपोषित्वा तेन पापाद् विमुच्यते ।। ११ ।। *ग्रहणके समय अथवा अशौचमें किसीके दिये हुए खेतका दान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे उसके दोषसे छुटकारा मिलता है ।। ११ ।। कृष्णपक्षे तु यः श्राद्धं पितॄणामश्नुते द्विजः । अन्नमेतदहोरात्रात् पूतो भवति ब्राह्मणः ।। १२ ।। जो द्विज कृष्णपक्षमें किये हुए पितृश्राद्धका अन्न भोजन करता है, वह एक दिन और एक रात बीत जानेपर शुद्ध होता है ।। १२ ।। न च संध्यामुपासीत न च जाप्यं प्रवर्तयेत् । न संकिरेत् तदन्नं च ततः पूयेत ब्राह्मणः ।। १३ ।। ब्राह्मण जिस दिन श्राद्धका अन्न भोजन करे, उस दिन संध्या, गायत्री-जप और दुबारा भोजन त्याग दे। इससे उसकी शुद्धि होती है ।। १३ ।। इत्यर्थमपराह्ने तु पितॄणां श्राद्धमुच्यते । यथोक्तानां यदश्नीयुर्ब्राह्मणाः पूर्वकीर्तिताः ।। १४ ।।
इसीलिये अपराह्नकालमें पितरोंके श्राद्धका विधान किया गया है। (जिससे सबेरेकी संध्योपासना हो जाय और शामको पुनर्भोजनकी आवश्यकता ही न पड़े) ब्राह्मणोंको एक दिन पहले श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहिये। जिससे वे पूर्वोक्त प्रकारसे विशुद्ध पुरुषोंके यहाँ यथावत् रूपसे भोजन कर सकें ।। १४ ।।
मृतकस्य तृतीयाहे ब्राह्मणो योऽन्नमश्नुते ।
स त्रिवेलं समुन्मज्ज्य द्वादशाहेन शुध्यति ।। १५ ।।
जिसके घर किसीकी मृत्यु हुई हो, उसके यहाँ मरणाशौचके तीसरे दिन अन्न ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण बारह दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है ।।
द्वादशाहे व्यतीते तु कृतशौचो विशेषतः ।
ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्त्वा मुच्यते तेन पाप्मना ।। १६ ।।
बारह दिनोंतक स्नानका नियम पूर्ण हो जानेपर तेरहवें दिन वह विशेषरूपसे स्नान आदिके द्वारा पवित्र हो ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन करावे। तब उस पापसे मुक्त हो सकता है ।। १६ ।।
मृतस्य दशरात्रेण प्रायश्चित्तानि दापयेत् ।
सावित्रीं रैवतीमिष्टिं कूष्माण्डमघमर्षणम् ।। १७ ।।
जो मनुष्य किसीके यहाँ मरणाशौचमें दस दिनतक अन्न खाता है, उसे गायत्री-मन्त्र, रैवत शाम, पवित्रेष्टि कूष्माण्ड अनुवाक् और अघमर्षणका जप करके उस दोषका प्रायश्चित्त करना चाहिये ।। १७ ।।
मृतकस्य त्रिरात्रे यः समुद्दिष्टे समश्नुते ।
सप्त त्रिषवणं स्नात्वा पूतो भवति ब्राह्मणः ।। १८ ।।
इसी प्रकार जो मरणाशौचवाले घरमें लगातार तीन रात भोजन करता है, वह ब्राह्मण सात दिनोंतक त्रिकाल स्नान करनेसे शुद्ध होता है ।। १८ ।।
सिद्धिमाप्नोति विपुलामापदं चैव नाप्नुयात् ।। १९ ।।
यह प्रायश्चित्त करनेके बाद उसे सिद्धि प्राप्त होती है और वह भारी आपत्तिमें कभी नहीं पड़ता है ।।
यस्तु शूद्रैः समश्नीयाद् ब्राह्मणोऽप्येकभोजने ।
अशौचं विधिवत् तस्य शौचमत्र विधीयते ।। २० ।।
जो ब्राह्मण शूद्रोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन कर लेता है, वह अशुद्ध हो जाता है। अतः उनकी शुद्धिके लिये शास्त्रीय विधिके अनुसार यहाँ शौचका विधान है ।।
यस्तु वैश्यैः सहाश्नीयाद् ब्राह्मणोऽप्येकभोजने ।
स वै त्रिरात्रं दीक्षित्वा मुच्यते तेन कर्मणा ।। २१ ।।
जो ब्राह्मण वैश्योंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह तीन राततक व्रत करनेपर उस कर्मदोषसे मुक्त होता है ।। २१ ।।
क्षत्रियैः सह योऽश्रीयाद् ब्राह्मणोऽप्येकभोजने । आप्लुतः सह वासोभिस्तेन मुच्येत पाप्मना ॥ २२ ॥ जो ब्राह्मण क्षत्रियोंके साथ एक पंक्तिमें भोजन करता है, वह वस्त्रोंसहित स्नान करनेसे पापमुक्त होता है ॥ २२ ॥
शूद्रस्य तु कुलं हन्ति वैश्यस्य पशुबान्धवान् । क्षत्रियस्य श्रियं हन्ति ब्राह्मणस्य सुवर्चसम् ॥ २३ ॥ ब्राह्मणका तेज उसके साथ भोजन करनेवाले शूद्रके कुलका, वैश्यके पशु और बान्धवोंका तथा क्षत्रियकी सम्पत्तिका नाश कर डालता है ॥ २३ ॥
प्रायश्चित्तं च शान्तिं च जुहुयात् तेन मुच्यते । सावित्रीं रैवतीमिष्टिं कूष्माण्डमघमर्षणम् ॥ २४ ॥ इसके लिये प्रायश्चित्त और शान्तिहोम करना चाहिये। गायत्री-मन्त्र, रैवत साम, पवित्रेष्टि, कूष्माण्ड अनुवाक् और अघमर्षण मन्त्रका जप भी आवश्यक है ॥
तथोच्छिष्टमथान्योन्यं सम्प्राश्नेन्नात्र संशयः । रोचना विरजा रात्रिर्मङ्गलालम्भनानि च ॥ २५ ॥ किसीका जूठा अथवा उसके साथ एक पंक्तिमें भोजन नहीं करना चाहिये। उपर्युक्त प्रायश्चित्तके विषयमें संशय नहीं करना चाहिये। प्रायश्चित्त करनेके अनन्तर गोरोचन, दूर्वा और हल्दी आदि मांगलिक वस्तुओंका स्पर्श करना चाहिये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रायश्चित्तविधिर्नाम षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रायश्चित्तविधि नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥
* कुछ लोग 'ग्रहसूतकयोः' का अर्थ करते हैं 'कारागारस्थाशौचवतो' इसके अनुसार जो जेलमें रह आया हो तथा जो जनन-मरण-सम्बन्धी अशौचसे युक्त हो ऐसे लोगोंका दिया हुआ क्षेत्रदान स्वीकार करनेपर तीन रात उपवास करनेसे प्रतिग्रह-दोषसे छुटकारा मिलता है।
दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
दानेन वर्ततेत्याह तपसा चैव भारत ।
तदेतन्मे मनोदुःखं व्यपोह त्वं पितामह ।
किंस्वित् पृथिव्यां ह्येतन्मे भवान् शंसितुमर्हति ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! पितामह! आप कहते हैं कि दान और तप दोनोंसे ही मनुष्य स्वर्गमें जाता है, परंतु मेरे मनमें संशयजनित दुःख हो रहा है। आप इसका निवारण कीजिये। इस पृथिवीपर दान और तपमेंसे कौन-सा साधन श्रेष्ठ है, यह बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
शृणु यैर्धर्मनिरतैस्तपसा भावितात्मभिः ।
लोका ह्यसंशयं प्राप्ता दानपुण्यरतैर्नृपैः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले जिन धर्मात्मा राजाओंने दान-पुण्यमें तत्पर रहकर निःसन्देह बहुत-से उत्तम लोक प्राप्त किये हैं, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो ॥ २ ॥
सत्कृतश्च तथाऽऽत्रेयः शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम् ।
उपदिश्य तदा राजन् गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ३ ॥
राजन्! लोकसम्मानित महर्षि आत्रेय अपने शिष्योंको निर्गुण ब्रह्मका उपदेश देकर उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ३ ॥
शिबिरौशीनरः प्राणान् प्रियस्य तनयस्य च ।
ब्राह्मणार्थमुपाकृत्य नाकपृष्ठमितो गतः ॥ ४ ॥
उशीनरकुमार शिवि अपने प्यारे पुत्रके प्राणोंको ब्राह्मणके लिये निछावर करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥
प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय तनयं स्वकम् ।
ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ ५ ॥
काशीके राजा प्रतर्दनने अपने प्यारे पुत्रको ब्राह्मणकी सेवामें अर्पित कर दिया, जिसके कारण उन्हें इस लोकमें अनुपम कीर्ति मिली और परलोकमें भी वे अक्षय आनन्दका उपभोग कर रहे हैं ॥ ५ ॥
रन्तिदेवश्च सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने ।
अर्घ्यं प्रदाय विधिवल्लेभे लोकाननुत्तमान् ॥ ६ ॥ संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठ मुनिको विधिवत् अर्घ्यदान किया, जिससे उन्हें श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ ६ ॥
दिव्यं शतशलाकं च यज्ञार्थं काञ्चनं शुभम् । छत्रं देवावृधो दत्त्वा ब्राह्मणायास्थितो दिवम् ॥ ७ ॥ देवावृध नामक राजा यज्ञमें सोनेकी सौ तीलियोंवाले सुन्दर दिव्य छत्रका ब्राह्मणको दान करके स्वर्ग-लोकको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥
भगवानम्बरीषश्च ब्राह्मणायामितौजसे । प्रदाय सकलं राष्ट्रं सुरलोकमवाप्तवान् ॥ ८ ॥ ऐश्वर्यशाली राजा अम्बरीष अमित तेजस्वी ब्राह्मणको अपना सारा राज्य सौंपकर देवलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥
सावित्रः कुण्डलं दिव्यं यानं च जनमेजयः । ब्राह्मणाय च गा दत्त्वा गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ९ ॥ सूर्यपुत्र कर्ण अपना दिव्य कुण्डल देकर तथा महाराजा जनमेजय ब्राह्मणको सवारी और गौ दान करके उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ९ ॥
वृषादर्भिश्च राजर्षी रत्नानि विविधानि च । रम्यांश्चावसथान् दत्त्वा द्विजेभ्यो दिवमागतः ॥ १० ॥ राजर्षि वृषादर्भिने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न तथा रमणीय गृह प्रदान करके स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त किया है ॥ १० ॥
निमी राष्ट्रं च वैदर्भिः कन्यां दत्त्वा महात्मने । अगस्त्याय गतः स्वर्गं सपुत्रपशुबान्धवः ॥ ११ ॥ विदर्भके पुत्र राजा निमि अगस्त्य मुनिको अपनी कन्या और राज्यका दान करके पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ११ ॥
जामदग्न्यश्च विप्राय भूमिं दत्त्वा महायशाः । रामोऽक्षयांस्तथा लोकान् जगाम मनसोऽधिकान् ॥ १२ ॥ महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजीने ब्राह्मणको भूमिदान करके उन अक्षय लोकोंको प्राप्त किया है, जिन्हें पानेकी मनमें कल्पना भी नहीं हो सकती ॥ १२ ॥
अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि देवराट् । वसिष्ठो जीवयामास येन यातोऽक्षयां गतिम् ॥ १३ ॥ एक बार संसारमें वर्षा न होनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने समस्त प्राणियोंको जीवन दान दिया था, जिससे उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १३ ॥
रामो दाशरथिश्चैव हुत्वा यज्ञेषु वै वसु । स गतो ह्यक्षयाँल्लोकान् यस्य लोके महद् यशः ॥ १४ ॥
दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी यज्ञोंमें प्रचुर धनकी आहुति देकर संसारमें अपने महान् यशकी स्थापना करके अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ १४ ॥
कक्षसेनश्च राजर्षिर्वसिष्ठाय महात्मने ।
न्यासं यथावत् संन्यस्य जगाम सुमहायशाः ॥ १५ ॥
महायशस्वी राजर्षि कक्षसेन महात्मा वसिष्ठको अपना सर्वस्व समर्पण करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ १५ ॥
करन्धमस्य पौत्रस्तु मरुत्तोऽविक्षितः सुतः ।
कन्यामांगिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम सः ॥ १६ ॥
करन्धमके पौत्र, अविक्षित्के पुत्र महाराज मरुत्तने अंगिराके पुत्र संवर्तको कन्यादान करके शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ॥ १६ ॥
ब्रह्मदत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा धर्मभृतां वरः ।
निधिं शङ्खमनुज्ञाप्य जगाम परमां गतिम् ॥ १७ ॥
पाञ्चालदेशके राजा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मदत्तने ब्राह्मणको शंखनामक निधि प्रदान करके परम गति प्राप्त कर ली थी ॥ १७ ॥
राजा मित्रसहश्चैव वसिष्ठाय महात्मने ।
मदयन्तीं प्रियां भार्यां दत्त्वा च त्रिदिवं गतः ॥ १८ ॥
राजा मित्रसह महात्मा वसिष्ठ मुनिको अपनी प्यारी पत्नी मदयन्ती सेवाके लिये देकर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १८ ॥
मनोः पुत्रश्च सुद्युम्नो लिखिताय महात्मने ।
दण्डमुद्धृत्य धर्मेण गतो लोकाननुत्तमान् ॥ १९ ॥
मनुपुत्र राजा सुद्युम्न महात्मा लिखितको धर्मतः दण्ड देकर परम उत्तम लोकोंमें गये ॥ १९ ॥
सहस्रचित्योः राजर्षिः प्राणानिष्टान् महायशाः ।
ब्राह्मणार्थे परित्यज्य गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २० ॥
महान् यशस्वी राजर्षि सहस्रचित्य ब्राह्मणके लिये अपने प्यारे प्राणोंकी बलि देकर श्रेष्ठ लोकोंमें गये हैं ॥
सर्वकामैश्च सम्पूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम् ।
मौद्गल्याय गतः स्वर्गं शतद्युम्नो महीपतिः ॥ २१ ॥
महाराजा शतद्युम्नने मौद्गल्य नामक ब्राह्मणको समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण सुवर्णमय गृह दान देकर स्वर्ग प्राप्त किया है ॥ २१ ॥
भक्ष्यभोज्यस्य च कृतान् राशयः पर्वतोपमान् ।
शाण्डिल्याय पुरा दत्त्वा सुमन्युर्दिवमास्थितः ॥ २२ ॥
राजा सुमन्युने भक्ष्य, भोज्य पदार्थोंके पर्वत-जैसे कितने ही ढेर लगाकर उन्हें शाण्डिल्यको दान दिया था। जिससे उन्होंने स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ।। नाम्ना च द्युतिमान् नाम शाल्वराजो महाद्युतिः । दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २३ ॥ महातेजस्वी शाल्वराज द्युतिमान् महर्षि ऋचीकको राज्य देकर सर्वोत्तम लोकोंमें चले गये ।। २३ ।। मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् । हिरण्यहस्ताय गतो लोकान् देवैरधिष्ठितान् ॥ २४ ॥ राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दरी कन्या विप्रवर हिरण्यहस्तको देकर देवताओंके लोकमें चले गये ।। लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः । ऋष्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वैः कामैरयुज्यत ॥ २५ ॥ प्रभावशाली राजर्षि लोमपादने मुनिवर ऋष्यशृंगको अपनी शान्ता नामवाली कन्या दान की थी, इससे उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्णरूपसे सफल हुईं ।। २५ ।। कौत्साय दत्त्वा कन्यां तु हंसीं नाम यशस्विनीम् । गतोऽक्षयानतो लोकान् राजर्षिश्च भगीरथः ॥ २६ ॥ राजर्षि भगीरथ अपनी यशस्विनी कन्या हंसीका कौत्स ऋषिको दान करके अक्षय लोकोंमें गये हैं ।। २६ ।। दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा भगीरथः । सवत्सानां कोहलाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २७ ॥ राजा भगीरथने कोहल नामक ब्राह्मणको एक लाख सवत्सा गौएँ दान कीं, जिससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ।। २७ ।। एते चान्ये च बहवो दानेन तपसा च ह । युधिष्ठिर गताः स्वर्गं विवर्तन्ते पुनः पुनः ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुत-से राजा दान और तपस्याके प्रभावसे बारंबार स्वर्गलोकको जाते और पुनः वहाँसे इस लोकमें लौट आते हैं ।। २८ ।। तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत् स्थास्यति मेदिनी । गृहस्थैर्दानतपसा यैर्लोका वै विनिर्जिताः ॥ २९ ॥ जिन गृहस्थोंने दान और तपस्याके बलसे उत्तम लोकोंपर विजय पायी है, उनकी कीर्ति इस लोकमें तबतक प्रतिष्ठित रहेगी, जबतक कि यह पृथ्वी स्थिर रहेगी ।। २९ ।। शिष्टानां चरितं ह्येतत् कीर्तितं मे युधिष्ठिर । दानयज्ञप्रजासङ्गैरैते हि दिवमास्थिताः ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! यह शिष्ट पुरुषोंका चरित्र बताया गया है। ये सब नरेश दान, यज्ञ और संतानोत्पादन करके स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ३० ॥
दत्त्वा तु सततं तेऽस्तु कौरवाणां धुरन्धर ।
दानयज्ञक्रियायुक्ता बुद्धिर्धर्मोपचायिनी ॥ ३१ ॥
कौरवधुरंधर! तुम भी सदा दान करते रहो। तुम्हारी बुद्धि दान और यज्ञकी क्रियामें संलग्न हो धर्मकी उन्नति करती रहे ॥ ३१ ॥
यत्र ते नृपशार्दूल संदेहो वै भविष्यति ।
श्वः प्रभाते हि वक्ष्यामि संध्या हि समुपस्थिता ॥ ३२ ॥
नृपश्रेष्ठ! अब तुम्हें जिस विषयमें संदेह होगा, उसे मैं कल सबेरे बताऊँगा; क्योंकि इस समय संध्याकाल उपस्थित है ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥
पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन
अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं ते भवतस्तात सत्यव्रतपराक्रम ।
दानधर्मेण महता ये प्राप्तास्त्रिदिवं नृपाः ॥ १ ॥
(दूसरे दिन प्रातःकाल) युधिष्ठिरने पूछा—सत्यव्रती और पराक्रमसम्पन्न तात! दानजनित महान् धर्मके प्रभावसे जो-जो नरेश स्वर्गलोकमें गये हैं, उन सबका परिचय मैंने आपके मुखसे सुना है ॥ १ ॥
इमांस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मान् धर्मभृतां वर ।
दानं कतिविधं देयं किं तस्य च फलं लभेत् ॥ २ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! अब मैं दानके सम्बन्धमें इन धर्मोंको सुनना चाहता हूँ कि दानके कितने भेद हैं? और जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल मिलता है? ॥ २ ॥
कथं केभ्यश्च धर्म्यं च दानं दातव्यमिष्यते ।
कैः कारणैः कतिविधं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
कैसे और किन लोगोंको धर्मके अनुसार दान देना अभीष्ट है? किन कारणोंसे देना चाहिये? और दानके कितने भेद हो जाते हैं? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु तत्त्वेन कौन्तेय दानं प्रति ममानघ ।
यथा दानं प्रदातव्यं सर्ववर्णेषु भारत ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा—निष्पाप कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! दानके सम्बन्धमें मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, सुनो। सभी वर्णोंके लोगोंको दान किस प्रकार करना चाहिये—यह बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
धर्मादर्थाद् भयात् कामात् कारुण्यादिति भारत ।
दानं पञ्चविधं ज्ञेयं कारणैर्येर्निबोध तत् ॥ ५ ॥
भारत! धर्म, अर्थ, भय, कामना और दया—इन पाँच हेतुओंसे दानको पाँच प्रकारका जानना चाहिये। अब जिन कारणोंसे दान देना उचित है, उनको सुनो ॥
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ।
इति दानं प्रदातव्यं ब्राह्मणेभ्योऽनसूयता ॥ ६ ॥
दान करनेवाला मनुष्य इहलोकमें कीर्ति और परलोकमें सर्वोत्तम सुख पाता है। इसलिये ईर्ष्यारहित होकर मनुष्य ब्राह्मणोंको अवश्य दान दे (यह धर्ममूलक दान है) ॥ ६ ॥
ददाति वा दास्यति वा मह्यं दत्तमनेन वा ।
इत्यर्थिभ्यो निशम्यैव सर्वं दातव्यमर्थिने ॥ ७ ॥
‘ये दान देते हैं, ये दान देंगे अथवा इन्होंने मुझे दान दिया है' याचकोंके मुखसे ये बातें सुनकर अपनी कीर्तिकी इच्छासे प्रत्येक याचकको उसकी इच्छाके अनुसार सब कुछ देना चाहिये (यह अर्थमूलक दान है) ॥ ७ ॥
नास्याहं न मदीयोऽयं पापं कुर्याद् विमानितः ।
इति दद्याद् भयादेव दृढं मूढाय पण्डितः ॥ ८ ॥
‘न मैं इसका हूँ न यह मेरा है तो भी यदि इसको कुछ न दूँ तो अपमानित होकर मेरा अनिष्ट कर डालेगा।' इस भयसे ही विद्वान् पुरुष जब किसी मूर्खको दान दे तो यह भयमूलक दान है ॥ ८ ॥
प्रियो मेऽयं प्रियोऽस्याहमिति सम्प्रेक्ष्य बुद्धिमान् ।
वयस्यायैवमक्लिष्टं दानं दद्यादतन्द्रितः ॥ ९ ॥
‘यह मेरा प्रिय है और मैं इसका प्रिय हूँ' यह विचारकर बुद्धिमान् मनुष्य आलस्य छोड़कर अपने मित्रको प्रसन्नतापूर्वक दान दे (यह कामनामूलक दान है) ॥ ९ ॥
दीनश्च याचते चायमल्पेनापि हि तुष्यति ।
इति दद्याद् दरिद्राय कारुण्यादिति सर्वथा ॥ १० ॥
‘यह बेचारा बड़ा गरीब है और मुझसे याचना कर रहा है। थोड़ा देनेसे भी संतुष्ट हो जायगा।' यह सोचकर दरिद्र मनुष्यके लिये सर्वथा दयावश दान देना चाहिये ॥ १० ॥
इति पञ्चविधं दानं पुण्यकीर्तिविवर्धनम् ।
यथाशक्त्या प्रदातव्यमेवमाह प्रजापतिः ॥ ११ ॥
यह पाँच प्रकारका दान पुण्य और कीर्तिको बढ़ानेवाला है। यथाशक्ति सबको दान देना चाहिये। ऐसा प्रजापतिका कथन है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥
१३९-
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
आगमैर्बहुभिः स्फीतो भवान् नः प्रवरे कुले ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाप्राज्ञ पितामह! आप हमारे श्रेष्ठ कुलमें सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् और अनेक आगमोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ १ ॥
त्वत्तो धर्मार्थसंयुक्तमायत्यां च सुखोदयम् ।
आश्चर्यभूतं लोकस्य श्रोतुमिच्छाम्यरंदम ॥ २ ॥
शत्रुदमन! मैं आपके मुखसे अब ऐसे विषयका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जो धर्म और अर्थसे युक्त, भविष्यमें सुख देनेवाला और संसारके लिये अद्भुत हो ॥ २ ॥
अयं च कालः सम्प्राप्तो दुर्लभो ज्ञातिबान्धवैः ।
शास्ता च न हि नः कश्चित् त्वामृते पुरुषर्षभ ॥ ३ ॥
पुरुषप्रवर! हमारे बन्धु-बान्धवोंको यह दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है। हमारे लिये आपके सिवा दूसरा कोई समस्त धर्मोंका उपदेश करनेवाला नहीं है ॥ ३ ॥
यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ।
वक्तुमर्हसि नः प्रश्नं यत् त्वां पृच्छामि पार्थिव ॥ ४ ॥
अनघ! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह हो तो पृथ्वीनाथ! मैं आपसे जो प्रश्न पूछता हूँ, उसका हम सब लोगोंके लिये उत्तर दीजिये ॥ ४ ॥
अयं नारायणः श्रीमान् सर्वपार्थिवसम्मतः ।
भवन्तं बहुमानेन प्रश्रयेण च सेवते ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण नरेशोंद्वारा सम्मानित ये श्रीमान् भगवान् नारायण श्रीकृष्ण बड़े आदर और विनयके साथ आपकी सेवा करते हैं ॥ ५ ॥
अस्य चैव समक्षं त्वं पार्थिवानां च सर्वशः ।
भ्रातॄणां च प्रियार्थं मे स्नेहाद् भाषितुमर्हसि ॥ ६ ॥
इनके तथा इन भूपतियोंके सामने मेरा और मेरे भाइयोंका सब प्रकारसे प्रिय करनेके लिये इस पूछे हुए विषयका सस्नेह वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1129)
भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा स्नेहादागतसम्भ्रमः ।
भीष्मो भागीरथीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर स्नेहके आवेशसे युक्त हो गंगापुत्र भीष्मने यह बात कही ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
अहं ते कथयिष्यामि कथामतिमनोहराम् ।
अस्य विष्णोः पुरा राजन् प्रभावो यो मया श्रुतः ॥ ८ ॥
यश्च गोवृषभाङ्कस्य प्रभावस्तं च मे शृणु ।
रुद्राण्याः संशयो यश्च दम्पत्योस्तं च मे शृणु ॥ ९ ॥
**भीष्मजी बोले—**बेटा! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त मनोहर कथा सुना रहा हूँ। राजन्! पूर्वकालमें इन भगवान् नारायण और महादेवजीका जो प्रभाव मैंने सुन रखा है, उसको
तथा पार्वतीजीके संदेह करनेपर शिव और पार्वतीमें जो संवाद हुआ था, उसको भी बता रहा हूँ, सुनो ॥ ८-९ ॥
व्रतं चचार धर्मात्मा कृष्णो द्वादशवार्षिकम् ।
दीक्षितं चागतौ द्रष्टुमुभौ नारदपर्वतौ ॥ १० ॥
पहलेकी बात है, धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले व्रतकी दीक्षा लेकर (एक पर्वतके ऊपर) कठोर तपस्या कर रहे थे। उस समय उनका दर्शन करनेके लिये नारद और पर्वत—ये दोनों ऋषि वहाँ पधारे ॥ १० ॥
कृष्णद्वैपायनश्चैव धौम्यश्च जपतां वरः ।
देवलः काश्यपश्चैव हस्तिकाश्यप एव च ॥ ११ ॥
अपरे चर्षयः सन्तो दीक्षादमसमन्विताः ।
शिष्यैरनुगताः सिद्धैर्देवकल्पैस्तपोधनैः ॥ १२ ॥
इनके सिवा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्य, देवल, काश्यप, हस्तिकाश्यप तथा अन्य साधु-महर्षि जो दीक्षा और इन्द्रियसंयमसे सम्पन्न थे, अपने देवोपम, तपस्वी एवं सिद्ध शिष्योंके साथ वहाँ आये ॥ ११-१२ ॥
तेषामतिथिसत्कारमर्चनीयं कुलोचितम् ।
देवकीतनयः प्रीतो देवकल्पमकल्पयत् ॥ १३ ॥
देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ देवोचित उपचारोंसे उन महर्षियोंका अपने कुलके अनुरूप आतिथ्य-सत्कार किया ॥ १३ ॥
हरितेषु सुवर्णेषु बर्हिष्केषु नवेषु च ।
उपोपविविशुः प्रीता विष्टरेषु महर्षयः ॥ १४ ॥
भगवान्के दिये हुए हरे और सुनहरे रंगवाले कुशोंके नवीन आसनोंपर वे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक विराजमान हुए ॥
कथाश्चक्रुस्ततस्ते तु मधुरा धर्मसंहिताः ।
राजर्षीणां सुराणां च ये वसन्ति तपोधनाः ॥ १५ ॥
तदनन्तर वे राजर्षियों, देवताओं और जो तपस्वी मुनि वहाँ रहते थे, उनके सम्बन्धमें धर्मयुक्त मधुर कथाएँ कहने लगे ॥ १५ ॥
ततो नारायणं तेजो व्रतचर्येन्धनोत्थितम् ।
वक्त्रान्निःसृत्य कृष्णस्य वह्निरद्भुतकर्मणः ॥ १६ ॥
सोऽग्निर्ददाह तं शैलं सद्रुमं सलताक्षुपम् ।
सपक्षमृगसंघातं सश्वापदसरीसृपम् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् व्रतचर्चारूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ भगवान् नारायणका तेज अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णके मुखारविन्दसे निकलकर अग्निरूपमें प्रकट हो वृक्ष, लता, झाड़ी, पक्षी, मृगसमुदाय, हिंसक जन्तु तथा सर्पोंसहित उस पर्वतको जलाने लगा ॥ १६-१७ ॥
मृगैश्च विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम् ।
शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीनदर्शनम् ॥ १८ ॥
उस समय नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंका आर्तनाद चारों ओर फैल रहा था, मानो पर्वतका वह अचेतन शिखर स्वयं ही हाहाकार कर रहा हो। उस तेजसे दग्ध हो जानेके कारण वह पर्वतशिखर बड़ा दयनीय दिखायी देता था ॥ १८ ॥
स तु वह्निर्महाज्वालो दग्ध्वा सर्वमशेषतः ।
विष्णोः समीप आगम्य पादौ शिष्यवदस्पृशत् ॥ १९ ॥
बड़ी-बड़ी लपटोंवाली उस आगने समस्त पर्वत-शिखरको दग्ध करके भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) के समीप आकर जैसे शिष्य गुरुके चरण छूता है, उसी प्रकार उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया और उन्हींमें वह विलीन हो गयी ॥ १९ ॥
ततो विष्णुर्गिरिं दृष्ट्वा निर्दग्धमरिकर्शनः ।
सौम्यैर्दृष्टिनिपातैस्तं पुनः प्रकृतिमानयत् ॥ २० ॥
तदनन्तर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने उस पर्वतको दग्ध हुआ देखकर अपनी सौम्य दृष्टि डाली और उसे पुनः प्रकृतावस्थामें पहुँचा दिया—पहलेकी भाँति हरा-भरा कर दिया ॥ २० ॥
तथैव स गिरिर्भूयः प्रपुष्पितलताद्रुमः ।
सपक्षिगणसंघुष्टः सश्वापदसरीसृपः ॥ २१ ॥
वह पर्वत फिर पहलेकी ही भाँति खिली हुई लताओं और वृक्षोंसे सुशोभित होने लगा। वहाँ पक्षी चहचहाने लगे। वहाँ हिंसक पशु और सर्प आदि जीव-जन्तु जी उठे ॥ २१ ॥
(सिद्धचारणसंघैश्च प्रसन्नैरुपशोभितः ।
मत्तवारणसंयुक्तो नानापक्षिगणैर्युतः ॥)
सिद्धों और चारणोंके समुदाय प्रसन्न होकर उस पर्वतकी शोभा बढ़ाने लगे। वह स्थान पुनः मतवाले हाथियों और नाना प्रकारके पक्षियोंसे सम्पन्न हो गया ॥
तमद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा मुनिगणस्तदा ।
विस्मितो हृष्टरोमा च बभूवास्त्राविलेक्षणः ॥ २२ ॥
इस अद्भुत और अचिन्त्य घटनाको देखकर ऋषियोंका समुदाय विस्मित और रोमांचित हो उठा। उन सबके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये ॥ २२ ॥
ततो नारायणो दृष्ट्वा तानृषीन् विस्मयान्वितान् ।
प्रश्रितं मधुरं स्निग्धं पप्रच्छ वदतां वरः ॥ २३ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने उन ऋषियोंको विस्मयविमुग्ध हुआ देख विनय और स्नेहसे युक्त मधुर वाणीमें पूछा— ॥ २३ ॥
किमर्थमृषिपुगस्य त्यक्तसङ्गस्य नित्यशः ।
निर्ममस्यागमवतो विस्मयः समुपागतः ॥ २४ ॥
‘महर्षियो! ऋषिसमुदाय तो आसक्ति और ममतासे रहित है! सबको शास्त्रोंका ज्ञान है, फिर भी आपलोगोंको आश्चर्य क्यों हो रहा है? ॥ २४ ॥ एतन्मे संशयं सर्वे याथातथ्यमनिन्दिताः । ऋषयो वक्तुमर्हन्ति निश्चितार्थं तपोधनाः ॥ २५ ॥ ‘तपोधन ऋषियो! आप सब लोग सबके द्वारा प्रशंसित हैं, अतः मेरे इस संशयको निश्चित एवं यथार्थ-रूपसे बतानेकी कृपा करें’ ॥ २५ ॥
ऋषय ऊचुः भवान् विसृजते लोकान् भवान् संहरते पुनः । भवान् शीतं भवानुष्णं भवानेव च वर्षति ॥ २६ ॥ **ऋषियोंने कहा—**भगवान्! आप ही संसारको बनाते और आप ही पुनः उसका संहार करते हैं। आप ही सर्दी, आप ही गर्मी और आप ही वर्षा करते हैं ॥ २६ ॥ पृथिव्यां यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । तेषां पिता त्वं माता त्वं प्रभुः प्रभव एव च ॥ २७ ॥ इस पृथ्वीपर जो भी चराचर प्राणी हैं, उनके पिता-माता, प्रभु और उत्पत्तिस्थान भी आप ही हैं ॥ एवं नो विस्मयकरं संशयं मधुसूदन । त्वमेवार्हसि कल्याण वक्तुं वह्नेर्विनिर्गमम् ॥ २८ ॥ मधुसूदन! आपके मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हमारे लिये इस प्रकार विस्मयजनक हुआ है। हम संशयमें पड़ गये हैं। कल्याणमय श्रीकृष्ण! आप ही इसका कारण बताकर हमारे संदेह और विस्मयका निवारण कर सकते हैं ॥ २८ ॥ ततो विगतसंत्रासा वयमप्यरिकर्शन । यच्छ्रुतं यच्च दृष्टं नस्तत् प्रवक्ष्यामहे हरे ॥ २९ ॥ शत्रुसूदन हरे! उसे सुनकर हम भी निर्भय हो जायँगे और हमने जो आश्चर्यकी बात देखी या सुनी है, उसका हम आपके सामने वर्णन करेंगे ॥ २९ ॥
वासुदेव उवाच एतद् वै वैष्णवं तेजो मम वक्त्राद् विनिःसृतम् । कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो येनायं मथितो गिरिः ॥ ३० ॥ **श्रीकृष्ण बोले—**मुनिवरो! मेरे मुखसे यह मेरा वैष्णव तेज प्रकट हुआ था; जिसने प्रलयकालकी अग्निके समान रूप धारण करके इस पर्वतको दग्ध कर डाला था ॥ ३० ॥ ऋषयश्चार्तिमापन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । भवन्तो व्यथिताश्चासन् देवकल्पास्तपोधनाः ॥ ३१ ॥
उसी तेजसे आप-जैसे तपस्याके धनी, देवोपम शक्तिशाली, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय ऋषि भी पीड़ित और व्यथित हो गये थे ॥ ३१ ॥
व्रतचर्यापरीतस्य तपस्विव्रतसेवया ।
मम वह्निः समुद्भूतो न वै व्यथितुमर्हथ ॥ ३२ ॥
मैं व्रतचर्यामें लगा हुआ था, तपस्वी जनोंके उस व्रतका सेवन करनेसे मेरा तेज ही अग्निरूपमें प्रकट हुआ था। अतः आपलोग उससे व्यथित न हों ॥ ३२ ॥
व्रतं चर्तुमिहायातस्त्वहं गिरिमिमं शुभम् ।
पुत्रं चात्मसमं वीर्ये तपसा लब्धुमागतः ॥ ३३ ॥
मैं तपस्याद्वारा अपने ही समान वीर्यवान् पुत्र पानेकी इच्छासे व्रत करनेके लिये इस मंगलकारी पर्वतपर आया हूँ ॥ ३३ ॥
ततो ममात्मा यो देहे सोऽग्निर्भूत्वा विनिःसृतः ।
गतश्च वरदं द्रष्टुं सर्वलोकपितामहम् ॥ ३४ ॥
मेरे शरीरमें स्थित प्राण ही अग्निके रूपमें बाहर निकलकर सबको वर देनेवाले सर्वलोक-पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया था ॥ ३४ ॥
तेन चात्मानुशिष्टो मे पुत्रत्वे मुनिसत्तमाः ।
तेजसोऽर्धेन पुत्रस्ते भवितेति वृषध्वजः ॥ ३५ ॥
मुनिवरो! उन ब्रह्माजीने मेरे प्राणको यह संदेश देकर भेजा है कि साक्षात् भगवान् शंकर अपने तेजके आधे भागसे आपके पुत्र होंगे ॥ ३५ ॥
सोऽयं वह्निरुपागम्य पादमूले ममान्तिकम् ।
शिष्यवत् परिचर्यार्थं शान्तः प्रकृतिमागतः ॥ ३६ ॥
वही यह अग्निरूपी प्राण मेरे पास लौटकर आया है और निकट पहुँचनेपर शिष्यकी भाँति परिचर्या करनेके लिये उसने मेरे चरणोंमें प्रणाम किया है । इसके बाद शान्त होकर वह अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त हो गया है ॥ ३६ ॥
एतदेव रहस्यं वः पद्मनाभस्य धीमतः ।
मया प्रोक्तं समासेन न भीः कार्या तपोधनाः ॥ ३७ ॥
तपोधनो! यह मैंने आपलोगोंके निकट बुद्धिमान् भगवान् विष्णुका गुप्त रहस्य संक्षेपसे बताया है। आपलोगोंको भय नहीं मानना चाहिये ॥ ३७ ॥
सर्वत्र गतिरव्यग्रा भवतां दीर्घदर्शनात् ।
तपस्विव्रतसंदीप्ता ज्ञानविज्ञानशोभिताः ॥ ३८ ॥
आपलोगोंकी गति सर्वत्र है, उसका कहीं भी प्रतिरोध नहीं है; क्योंकि आपलोग दूरदर्शी हैं। तपस्वी जनोंके योग्य व्रतका आचरण करनेसे आपलोग देदीप्यमान हो रहे हैं तथा ज्ञान और विज्ञान आपकी शोभा बढ़ा रहे हैं ॥ ३८ ॥
यच्छ्रुतं यच्च वो दृष्टं दिवि वा यदि वा भुवि ।
आश्चर्यं परमं किंचित् तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे ॥ ३९ ॥ इसलिये मेरी प्रार्थना है कि यदि आपलोगोंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई महान् आश्चर्यकी बात देखी या सुनी हो तो उसको मुझे बतलाइये ॥ ३९ ॥ तस्यामृतनिकाशस्य वाङ्मधोरस्ति मे स्पृहा । भवद्भिः कथितस्येह तपोवननिवासिभिः ॥ ४० ॥ आपलोग तपोवनमें निवास करनेवाले हैं, इस जगत्में आपके द्वारा कथित अमृतके समान मधुर वचन सुननेकी इच्छा मुझे सदा बनी रहती है ॥ ४० ॥ यद्यप्यहमदृष्टं वो दिव्यमद्भुतदर्शनम् । दिवि वा भुवि वा किंचित् पश्याम्यमरदर्शनाः ॥ ४१ ॥ प्रकृतिः सा मम परा न क्वचित् प्रतिहन्यते । न चात्मगतमैश्वर्यमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ॥ ४२ ॥ श्रद्धेयः कथितो ह्यर्थः सज्जनश्रवणं गतः । चिरं तिष्ठति मेदिन्यां शैले लेख्यामिवार्पितम् ॥ ४३ ॥ महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है। यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्चर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है ॥ ४१—४३ ॥ तदहं सज्जनमुखान्निःसृतं तत्समागमे । कथयिष्याम्यहमहो बुद्धिदीपकं नृणाम् ॥ ४४ ॥ अतः मैं आप साधु-संतोंके मुखसे निकले हुए वचनको मनुष्योंकी बुद्धिका उद्दीपक (प्रकाशक) मानकर उसे सत्पुरुषोंके समाजमें कहूँगा ॥ ४४ ॥ ततो मुनिगणाः सर्वे विस्मिताः कृष्णसंनिधौ । नेत्रैः पद्मदलप्रख्यैरपश्यंस्त जनार्दनम् ॥ ४५ ॥ यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप बैठे हुए सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे कमलदलके समान खिले हुए नेत्रोंसे उनकी ओर देखने लगे ॥ ४५ ॥ वर्धयन्तस्तथैवान्ये पूजयन्तस्तथापरे । वाग्भिर्ऋग्भूषितार्थाभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम् ॥ ४६ ॥ कोई उन्हें बधाई देने लगा, कोई उनकी पूजा-प्रशंसा करने लगा और कोई ऋग्वेदकी अर्थयुक्त ऋचाओंद्धारा उन मधुसूदनकी स्तुति करने लगा ॥ ४६ ॥ ततो मुनिगणाः सर्वे नारदं देवदर्शनम् । तदा नियोजयामासुर्वचने वाक्यकोविदम् ॥ ४७ ॥