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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2393)

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व्यासजीके द्वारा कौरव-पाण्डव-पक्षके मरे हुए सम्बन्धियोंका सेनासहित परलोकसे आवाहन

विराटद्रुपदौ चैव सहपुत्रौ ससैनिकौ। द्रौपदेयाश्च सौभद्रो राक्षसश्च घटोत्कचः॥ ८॥ पुत्रों और सैनिकोंसहित विराट और द्रुपद पानीसे बाहर आये। द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु तथा राक्षस घटोत्कच—ये सभी जलसे प्रकट हो गये॥ ८॥ कर्णदुर्योधनौ चैव शकुनिश्च महारथः। दुःशासनादयश्चैव धार्तराष्ट्रा महाबलाः॥ ९॥ जारासंधिर्भगदत्तो जलसंधश्च वीर्यवान्। भूरिश्रवाः शलः शल्यो वृषसेनश्च सानुजः॥ १०॥ लक्ष्मणो राजपुत्रश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः। शिखण्डिपुत्राः सर्वे च धृष्टकेतुश्च सानुजः॥ ११॥ अचलो वृषकश्चैव राक्षसश्चाप्यलायुधः। बाह्लिकः सोमदत्तश्च चेकितानश्च पार्थिवः॥ १२॥ एते चान्ये च बहवो बहुत्वाद् ये न कीर्तिताः। सर्वे भासुरदेहास्ते समुत्तस्थुर्जलात्ततः॥ १३॥ कर्ण, दुर्योधन, महारथी शकुनि, धृतराष्ट्रके पुत्र महाबली दुःशासन आदि, जरासन्धकुमार सहदेव, भगदत्त, पराक्रमी जलसन्ध, भूरिश्रवा, शल, शल्य, भाइयोंसहित वृषसेन, राजकुमार लक्ष्मण, धृष्टद्युम्नके पुत्र, शिखण्डीके सभी पुत्र, भाइयोंसहित धृष्टकेतु, अचल, वृषक, राक्षस अलायुध, राजा बाह्लिक, सोमदत्त और चेकितान—ये तथा दूसरे बहुत-से क्षत्रियवीर, जो संख्यामें अधिक होनेके कारण नाम लेकर नहीं बताये गये हैं, सभी देदीप्यमान शरीर धारण करके उस जलसे प्रकट हुए॥ ९—१३॥ यस्य वीरस्य यो वेषो यो ध्वजो यच्च वाहनम्। तेन तेन व्यदृश्यन्त समुपेता नराधिपाः॥ १४॥ दिव्याम्बरधराः सर्वे सर्वे भ्राजिष्णुकुण्डलाः। निर्वैरा निरहंकारा विगतक्रोधमत्सराः॥ १५॥ जिस वीरका जैसा वेष, जैसी ध्वजा और जैसा वाहन था, वह उसीसे युक्त दिखायी दिया। वहाँ प्रकट हुए सभी नरेश दिव्य वस्त्र धारण किये हुए थे। सबके कानोंमें चमकीले कुण्डल शोभा पाते थे। उस समय वे वैर, अहंकार, क्रोध और मात्सर्य छोड़ चुके थे॥ १४-१५॥ गन्धर्वैरुपगीयन्तः स्तूयमानाश्च वन्दिभिः। दिव्यमाल्याम्बरधरा वृताश्चाप्सरसां गणैः॥ १६॥ गन्धर्व उनके गुण गाते और बन्दीजन स्तुति करते थे। उन सबने दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और सभी अप्सराओंसे घिरे हुए थे॥ १६॥ धृतराष्ट्रस्य च तदा दिव्यं चक्षुर्नराधिप।

मुनिः सत्यवतीपुत्रः प्रीतः प्रादात् तपोबलात् ॥ १७ ॥ नरेश्वर! उस समय सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यासने प्रसन्न होकर अपने तपोबलसे धृतराष्ट्रको दिव्य नेत्र प्रदान किये ॥ १७ ॥

दिव्यज्ञानबलोपेता गान्धारी च यशस्विनी ।
ददर्श पुत्रांस्तान् सर्वान् ये चान्येऽपि मृधे हताः ॥ १८ ॥
यशस्विनी गान्धारी भी दिव्य ज्ञानबलसे सम्पन्न हो गयी थीं। उन दोनोंने युद्धमें मारे गये अपने पुत्रों तथा अन्य सब सम्बन्धियोंको देखा ॥ १८ ॥

तदद्भुतमचिन्त्यं च सुमहल्लोमहर्षणम् ।
विस्मितः स जनः सर्वो ददर्शानिमिषेक्षणः ॥ १९ ॥
वहाँ आये हुए सब लोग आश्चर्यचकित हो एकटक दृष्टिसे उस अद्भुत, अचिन्त्य एवं अत्यन्त रोमांचकारी दृश्यको देख रहे थे ॥ १९ ॥

तदुत्सवमहोदग्रं हृष्टनारीनराकुलम् ।
आश्चर्यभूतं ददृशे चित्रं पटगतं यथा ॥ २० ॥
वह हर्षोत्फुल्ल नर-नारियोंसे भरा हुआ महान् आश्चर्यजनक उत्सव कपड़ेपर अंकित किये गये चित्रकी भाँति दिखायी देता था ॥ २० ॥

धृतराष्ट्रस्तु तान् सर्वान् पश्यन् दिव्येन चक्षुषा ।
मुमुदे भरतश्रेष्ठ प्रसादात् तस्य वै मुनेः ॥ २१ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्र मुनिवर व्यासकी कृपासे मिले हुए दिव्य नेत्रोंद्वारा अपने समस्त पुत्रों और सम्बन्धियोंको देखते हुए आनन्दमग्न हो गये ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि भीष्मादिदर्शने
द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें भीष्म आदिका दर्शनविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥

परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गङ्गाजीमें गोता लगाकर अपने-अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते पुरुषश्रेष्ठाः समाजग्मुः परस्परम्।
विगतक्रोधमात्सर्याः सर्वे विगतकल्मषाः॥ १॥
विधिं परममास्थाय ब्रह्मर्षिविहितं शुभम्।
संहृष्टमनसः सर्वे देवलोक इवामराः॥ २॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**क्रोध और मात्सर्यसे रहित तथा पापशून्य हुए वे सभी श्रेष्ठ पुरुष ब्रह्मर्षियोंकी बनायी हुई उत्तम प्रणालीका आश्रय ले एक-दूसरेसे प्रेमपूर्वक मिले। उस समय देवलोकमें रहनेवाले देवताओंकी भाँति उन सबके मनमें हर्षोल्लास छा रहा था॥ १-२॥

पुत्रः पित्रा च मात्रा च
भार्याश्च पतिभिः सह।
भ्रात्रा भ्राता सखा चैव
सख्या राजन् समागताः॥ ३॥
राजन्! पुत्र पिता-माताके साथ, स्त्री पतिके साथ, भाई भाईके साथ और मित्र मित्रके साथ मिले॥ ३॥

पाण्डवास्तु महेष्वासं कर्णं सौभद्रमेव च।
सम्प्रहर्षात् समाजग्मुर्द्रौपदेयांश्च सर्वशः॥ ४॥
पाण्डव महाधनुर्धर कर्ण, सुभद्राकुमार अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र—इन सबके साथ अत्यन्त हर्षपूर्वक मिले॥ ४॥

ततस्ते प्रीयमाणा वै कर्णेन सह पाण्डवाः।
समेत्य पृथिवीपाल सौहृद्ये च स्थिता भवन्॥ ५॥
भूपाल! तत्पश्चात् सब पाण्डवोंने कर्णसे प्रसन्नता-पूर्वक मिलकर उनके साथ सौहार्दपूर्ण बर्ताव किया॥ ५॥

परस्परं समागम्य योधास्ते भरतर्षभ।

मुनेः प्रसादात् ते ह्येवं क्षत्रिया नष्टमन्यवः ।। ६ ।।
असौहृदं परित्यज्य सौहृदे पर्यवस्थिताः ।
भरतभूषण! वे समस्त योद्धा एक-दूसरेसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। इस प्रकार मुनिकी कृपासे वे सभी क्षत्रिय अपने क्रोधको भुलाकर शत्रुभाव छोड़कर परस्पर सौहार्द स्थापित करके मिले ।। ६ १/२ ।।

एवं समागताः सर्वे गुरुभिर्बान्धवैः सह ।। ७ ।।
पुत्रैश्च पुरुषव्याघ्राः कुरवोऽन्ये च पार्थिवाः ।
इस तरह वे सब पुरुषसिंह कौरव तथा अन्य नरेश गुरुजनों, बान्धवों और पुत्रोंके साथ मिले ।। ७ १/२ ।।

तां रात्रिमखिलामेवं विहृत्य प्रीतमानसाः ।। ८ ।।
मेनिरे परितोषेण नृपाः स्वर्गसदो यथा ।
सारी रात एक-दूसरेके साथ घूमने-फिरनेके कारण उन सबके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। स्वर्गवासियोंके समान ही उन्हें वहाँ परम संतोषका अनुभव हुआ ।। ८ १/२ ।।

नात्र शोको भयं त्रासो नार्तिर्नायशोऽभवत् ।। ९ ।।
परस्परं समागम्य योधानां भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! एक-दूसरेसे मिलकर उन योद्धाओंके मनमें शोक, भय, त्रास, उद्वेग और अपयशको स्थान नहीं मिला ।।

समागतास्ताः पितृभिर्भ्रातृभिः पतिभिः सुतैः ।। १० ।।
मुदं परमिकां प्राप्य नार्यो दुःखमथात्यजन् ।
वहाँ आयी हुई स्त्रियाँ अपने पिताओं, भाइयों, पतियों और पुत्रोंसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनका सारा दुःख दूर हो गया ।। १० १/२ ।।

एकां रात्रिं विहृत्यैव ते वीरास्ताश्च योषितः ।। ११ ।।
आमन्त्र्यान्योन्यमाश्लिष्य ततो जग्मुर्यथागतम् ।
वे वीर और उनकी वे तरुणी स्त्रियाँ एक रात साथ-साथ विहार करके अन्तमें एक-दूसरेकी अनुमति ले परस्पर गले मिलकर जैसे आये थे, उसी प्रकार चले जानेको उद्यत हुए ।। ११ १/२ ।।

ततो विसर्जयामास लोकांस्तान् मुनिपुङ्गवः ।। १२ ।।
क्षणेनान्तर्हिताश्चैव प्रेक्षतामेव तेऽभवन् ।
अवगाह्य महात्मानः पुण्यां भागीरथीं नदीम् ।। १३ ।।
सरथाः सध्वजाश्चैव स्वानि वेश्मानि भेजिरे ।

तब मुनिवर व्यासजीने उन सब लोगोंका विसर्जन कर दिया और वे महामना नरेश एक ही क्षणमें सबके देखते-देखते पुण्यसलिला भागीरथीमें गोता लगाकर अदृश्य हो गये। रथों और ध्वजाओंसहित अपने-अपने लोकोंमें चले गये ।। १२-१३१/२ ।।

देवलोकं ययुः केचित् केचित् ब्रह्मसदस्तथा ।। १४ ।।
केचिच्च वारुणं लोकं केचित् कौबेरमाप्नुवन् ।
ततो वैवस्वतं लोकं केचिच्चैवाप्नुवन्नृपाः ।। १५ ।।
कोई देवलोकमें गये, कोई ब्रह्मलोकमें, कुछ वरुणलोकमें पधारे और कुछ कुबेरके लोकमें। कितने ही नरेश भगवान् सूर्यके लोकमें चले गये ।। १४-१५ ।।

राक्षसानां पिशाचानां केचिच्चाप्युत्तरान् कुरून् ।
विचित्रगतयः सर्वे यानवाप्याम रैः सह ।। १६ ।।
आजग्मुस्ते महात्मानः सवाहाः सपदानुगाः ।
कितने ही राक्षसों और पिशाचोंके लोकोंमें चले गये और कितने ही उत्तरकुरुमें जा पहुँचे। इस प्रकार सबको विचित्र-विचित्र गतियोंकी प्राप्ति हुई थी और वे महामना वहींसे देवताओंके साथ अपने-अपने वाहनों और अनुचरोंसहित आये थे ।। १६१/२ ।।

गतेषु तेषु सर्वेषु सलिलस्थो महामुनिः ।। १७ ।।
धर्मशीलो महातेजाः कुरूणां हितकृत् तथा ।
ततः प्रोवाच ताः सर्वाः क्षत्रिया निहतेश्वराः ।। १८ ।।
या याः पतिकृतान् लोका-
निच्छन्ति परमस्त्रियः ।
ता जाह्नवीजलं क्षिप्र-
मवगाहन्त्वतन्द्रिताः ।। १९ ।।
ततस्तस्य वचः श्रुत्वा श्रद्दधाना वराङ्गनाः ।
श्वशुरं समनुज्ञाप्य विविशुर्जाह्नवीजलम् ।। २० ।।
उन सबके अदृश्य हो जानेपर कौरवोंके हितकारी महातेजस्वी धर्मशील महामुनि व्यासजीने जलमें खड़े-खड़े उन सब विधवा क्षत्राणियोंसे कहा—'देवियो! तुम लोगोंमेंसे जो-जो सती-साध्वी स्त्रियाँ अपने-अपने पतिके लोकको जाना चाहती हों, वे आलस्य त्यागकर तुरंत गङ्गाजीके जलमें गोता लगावें।' उनकी बात सुनकर उनमें श्रद्धा रखनेवाली वे सती स्त्रियाँ अपने श्वशुर धृतराष्ट्रकी आज्ञा ले गङ्गाजीके जलमें समा गयीं ।। १७—२० ।।

विमुक्ता मानुषैर्देहंस्ततस्ता भर्तृभिः सह ।
समाजग्मुस्तदा साध्व्यः सर्वा एव विशाम्पते ।। २१ ।।
प्रजानाथ! वहाँ वे सभी साध्वी स्त्रियाँ मनुष्य-शरीरसे छुटकारा पाकर अपने-अपने पतिके साथ जा मिलीं ।। २१ ।।

एवं क्रमेण सर्वास्ताः शीलवत्यः पतिव्रताः ।

प्रविश्य क्षत्रिया मुक्ता जग्मुर्भर्तृसलोकताम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार क्रमशः वे सभी शीलवती पतिव्रता क्षत्राणियाँ इस शरीरसे मुक्त हो पतिलोकको चली गयीं ॥ २२ ॥ दिव्यरूपसमायुक्ता दिव्याभरणभूषिताः । दिव्यमाल्याम्बरधरा यथाऽऽसां पतयस्तथा ॥ २३ ॥ जैसे उनके पति थे, उसी प्रकार वे भी दिव्यरूपसे सम्पन्न हो गयीं। दिव्य आभूषण उनके अंगोंकी शोभा बढ़ाने लगे तथा उन्होंने दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण कर लिये ॥ २३ ॥ ताः शीलगुणसम्पन्ना विमानस्था गतक्लमाः । सर्वाः सर्वगुणोपेताः स्वस्थानं प्रतिपेदिरे ॥ २४ ॥ शील और सद्गुणसे सम्पन्न हुई वे सभी क्षत्रिय-बालाएँ समस्त सद्गुणोंसे अलंकृत हो विमानपर बैठकर अपने-अपने योग्य स्थानको चली गयीं। उनका सारा कष्ट दूर हो गया ॥ २४ ॥ यस्य यस्य तु यः कामस्तस्मिन् काले बभूव ह । तं तं विसृष्टवान् व्यासो वरदो धर्मवत्सलः ॥ २५ ॥ उस समय जिसके-जिसके मनमें जो-जो कामना उत्पन्न हुई, धर्मवत्सल वरदायक भगवान् व्यासने वह सब पूर्ण की ॥ २५ ॥ तच्छ्रुत्वा नरदेवानां पुनरागमनं नराः । जहृषुर्मुदिताश्चासन् नानादेशगता अपि ॥ २६ ॥ संग्राममें मरे हुए राजाओंके पुनरागमनका वृत्तान्त सुनकर भिन्न-भिन्न देशके मनुष्योंको बड़ा आश्चर्य और आनन्द हुआ ॥ २६ ॥ प्रियैः समागमं तेषां यः सम्यक् शृणुयान्नरः । प्रियाणि लभते नित्यमिह च प्रेत्य चैव सः ॥ २७ ॥ जो मनुष्य कौरव-पाण्डवोंके प्रियजन समागमका यह वृत्तान्त भलीभाँति सुनेगा, उसे इहलोक और परलोकमें भी प्रिय वस्तुकी प्राप्ति होगी ॥ २७ ॥ इष्टबान्धवसंयोगमनायासमनामयम् । यश्चैतच्छ्रावयेद् विद्वान् विदुषो धर्मवित्तमः ॥ २८ ॥ स यशः प्राप्नुयाल्लोके परत्र च शुभां गतिम् । इतना ही नहीं, उसे अनायास ही इष्ट बन्धुओंसे मिलन होगा तथा कोई दुःख-शोक नहीं सतावेगा। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ जो विद्वान् विद्वानोंको यह प्रसंग सुनायेगा, वह इस लोकमें यश और परलोकमें शुभ गति प्राप्त करेगा ॥ २८ ½ ॥ स्वाध्याययुक्ता मनुजास्तपोयुक्ताश्च भारत ॥ २९ ॥ साध्वाचारा दमोपेता दाननिर्धूतकल्मषाः ।

ऋजवः शुचयः शान्ता हिंसानृतविवर्जिताः ।। ३० ।।
आस्तिकाः श्रद्दधानाश्च धृतिमन्तश्च मानवाः ।
श्रुत्वाऽऽश्चर्यमिदं पर्व ह्यवाप्स्यन्ति परां गतिम् ।। ३१ ।।
भारत! जो मनुष्य स्वाध्यायपरायण, तपस्वी, सदाचारी, जितेन्द्रिय, दानके द्वारा पापरहित, सरल, शुद्ध, शान्त, हिंसा और असत्यसे दूर, आस्तिक, श्रद्धालु और धैर्यवान् हैं, वे इस आश्चर्यजनक पर्वको सुनकर उत्तम गति प्राप्त करेंगे ।। २९—३१ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि स्त्रीणां
स्वस्वपतिलोकगमने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें स्त्रियोंका अपने-अपने पतिके लोकमें गमनविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३३ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2401)

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

मरे हुए पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुनः दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा नृपो विद्वान् हृष्टोऽभूज्जनमेजयः ।
पितामहानां सर्वेषां गमनागमनं तदा ॥ १ ॥
सौति कहते हैं— अपने समस्त पितामहोंके इस प्रकार परलोकसे आने और जानेका वृत्तान्त सुनकर विद्वान् राजा जनमेजय बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

अब्रवीच्च मुदा युक्तः पुनरागमनं प्रति ।
कथं नु त्यक्तदेहानां पुनस्तद्रूपदर्शनम् ॥ २ ॥
प्रसन्न होकर वे पुनरागमनके विषयमें संदेह करते हुए बोले—'भला, जिन्होंने अपने शरीरका परित्याग कर दिया है, उन पुरुषोंका उसी रूपमें दर्शन कैसे हो सकता है?' ॥ २ ॥

इत्युक्तः स द्विजश्रेष्ठो व्यासशिष्यः प्रतापवान् ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठस्तं नृपं जनमेजयम् ॥ ३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्यासशिष्य विप्रवर वैशम्पायनने उन राजा जनमेजयसे कहा ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

अविप्रणाशः सर्वेषां कर्मणामिति निश्चयः ।
कर्मजानि शरीराणि तथैवाकृतयो नृप ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**नरेश्वर! यह सिद्धान्त है कि समस्त कर्मोंका फल भोग किये बिना उनका नाश नहीं होता। जीवात्माको जो शरीर और नाना प्रकारकी आकृतियाँ प्राप्त होती हैं, वे सब कर्मजनित ही हैं ॥ ४ ॥

महाभूतानि नित्यानि भूताधिपतिसंश्रयात् ।
तेषां च नित्यसंवासो न विनाशो वियुज्यताम् ॥ ५ ॥
भूतनाथ भगवान्‌के आश्रयसे पाँचों महाभूत हमारे शरीरोंकी अपेक्षा नित्य हैं। उन नित्य महाभूतोंका अनित्य शरीरोंके साथ संसार-दशामें नित्य संयोग है। अनित्य शरीरोंका नाश होनेपर इन नित्य महाभूतोंका उनसे वियोगमात्र होता है, विनाश नहीं ॥ ५ ॥

अनायासकृतं कर्म सत्यः श्रेष्ठः फलागमः ।

आत्मा चैभिः समायुक्तः सुखदुःखमुपाश्नुते ॥ ६ ॥
कर्तृत्व-अभिमानके बिना अनायास किये जानेवाले कर्मका जो फल प्राप्त होता है, वह सत्य और श्रेष्ठ है अर्थात् मुक्तिदायक है। कर्तृत्व-अभिमान और परिश्रमपूर्वक किये हुए कर्मोंसे बँधा हुआ जीवात्मा सुख-दुःखका उपभोग करता है ॥ ६ ॥
अविनाश्यस्तथायुक्तः क्षेत्रज्ञ इति निश्चयः ।
भूतानामात्मको भावो यथासौ न वियुज्यते ॥ ७ ॥
क्षेत्रज्ञ इस प्रकार कर्मोंसे संयुक्त होकर भी वास्तवमें अविनाशी ही है, यह निश्चित है। किंतु भूतोंके साथ तादात्म्यभाव स्वीकार कर लेनेके कारण वह ज्ञानके बिना उनसे अलग नहीं हो पाता ॥ ७ ॥
यावन्न क्षीयते कर्म तावत् तस्य स्वरूपता ।
क्षीणकर्मा नरो लोके रूपान्यत्वं नियच्छति ॥ ८ ॥
जबतक शरीरके प्रारब्ध-कर्मोंका क्षय नहीं होता तबतक उस जीवकी उस शरीरसे एकरूपता रहती है। जब कर्मोंका क्षय हो जाता है, तब वह दूसरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥
नानाभावास्तथैकत्वं शरीरं प्राप्य संहताः ।
भवन्ति ते तथा नित्याः पृथग्भावं विजानताम् ॥ ९ ॥
भूत-इन्द्रिय आदि नाना प्रकारके पदार्थ शरीरको पाकर एकत्वको प्राप्त हो गये हैं। जो देह आदिको आत्मासे पृथक् जानते हैं, उन योगियोंके लिये वे सारे पदार्थ नित्य आत्मस्वरूप हो जाते हैं ॥ ९ ॥
अश्वमेधे श्रुतिश्चेयमश्वसंज्ञपनं प्रति ।
लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्यं शरीरिणाम् ॥ १० ॥
अश्वमेध यज्ञमें जब अश्वका वध किया जाता है, उस समय जो ‘सूर्य ते चक्षुः वातं प्राणः’ (तुम्हारे नेत्र सूर्यको और प्राण वायुको प्राप्त हों) इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं, उनसे यह सूचित होता है कि देहधारियोंके प्राण—इन्द्रियाँ निश्चितरूपसे सर्वदा लोकान्तरमें स्थित होती हैं। (अतः परलोकमें गये हुए जीवोंका वैसे ही रूपसे इस लोकमें पुनः प्रकट हो जाना असम्भव नहीं है) ॥ १० ॥
अहं हितं वदाम्येतत् प्रियं चेत् तव पार्थिव ।
देवयाना हि पन्थानः श्रुतास्ते यज्ञसंस्तरे ॥ ११ ॥
पृथ्वीनाथ! तुम्हें प्रिय लगे तो मैं तुम्हारे हितकी बात बताता हूँ। यज्ञ आरम्भ करते समय तुमने देवयान-मार्गोंकी बात सुनी होगी। वे ही तुम्हारे योग्य हैं ॥ ११ ॥
आहूतो यत्र यज्ञस्ते तत्र देवा हितास्तव ।
यदा समन्विता देवाः पशूनां गमनेश्वराः ॥ १२ ॥

जब तुमने यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया, तभीसे देवतालोग तुम्हारे हितैषी सुहृद् हो

गये। जब इस प्रकार देवता मित्रभावसे युक्त होते हैं, तब वे जीवोंको लोकान्तरकी प्राप्ति

करानेमें समर्थ होनेके कारण उनपर अनुग्रह करके उन्हें अभीष्ट लोकोंकी प्राप्ति करा देते

हैं ।। १२ ।।

गतिमन्तश्च तेनेष्ट्वा नान्ये नित्या भवन्त्युत ।

नित्येऽस्मिन् पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि पूरुषः ।। १३ ।।

अस्य नानासमायोगं यः पश्यति वृथामतिः ।

वियोगे शोचतेऽत्यर्थं स बाल इति मे मतिः ।। १४ ।।

इसलिये नित्य जीव यज्ञोंद्वारा देवताओंकी आराधना करके लोकान्तरमें जानेकी शक्ति

पाते हैं। जो यज्ञ नहीं करते, वे वैसे नहीं हो पाते। यह पाञ्चभौतिक वर्ग नित्य है और

आत्मा भी नित्य है। ऐसी दशामें जो मनुष्य उस आत्माका अनेक प्रकारके देहोंसे सम्बन्ध

तथा उनके जन्म और नाशसे आत्माका भी जन्म और नाश समझता है, उसकी बुद्धि व्यर्थ

है। इसी प्रकार किसीसे किसीका वियोग हो जानेपर जो अत्यन्त शोक करता है, वह भी मेरे

मतमें बालक ही है ।। १३-१४ ।।

वियोगे दोषदर्शी यः संयोगं स विसर्जयेत् ।

असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भुवि वियोगजम् ।। १५ ।।

जो वियोगमें दोष देखता है, वह संयोगका त्याग कर दे; क्योंकि असंग आत्मामें संगम

या संयोग नहीं है। जो उसमें संयोगका आरोप करता है, उसीको इस भूतलपर वियोगका

दुःख सहना पड़ता है ।। १५ ।।

परापरज्ञस्त्वपरो नाभिमानादुदीरितः ।

अपरज्ञः परां बुद्धिं ज्ञात्वा मोहाद् विमुच्यते ।। १६ ।।

दूसरा जो अपने-परायेके ज्ञानमें ही उलझा रहता है, वह अभिमानसे ऊपर नहीं उठ

पाता। जो किसीके लिये पराया नहीं है, उस परमात्माको जाननेवाला पुरुष उत्तम बुद्धिको

पाकर मोहसे मुक्त हो जाता है ।। १६ ।।

अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः ।

नाहं तं वेद्मि नासौ मां न च मेऽस्ति विरागता ।। १७ ।।

वह मुक्त पुरुष अव्यक्तसे ही प्रकट हुआ था और पुनः अव्यक्तमें ही लीन हो गया। न मैं

उसे जानता हूँ३ न वह मुझे३। (फिर तुम भी वैसे ही बन्धनमुक्त क्यों न हो गये? ऐसा प्रश्न

होनेपर कहते हैं।) मुझमें वैराग्य नहीं है (पर वैराग्य ही मोक्षका मुख्य साधन है।) ।। १७ ।।

येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः ।

तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते ।

मानसं मनसाऽऽप्नोति शरीरं च शरीरवान् ।। १८ ।।

यह पराधीन जीव जिस-जिस शरीरसे कर्म करता है, उस-उस शरीरसे उसका फल अवश्य भोगता है। मानस कर्मका फल मनसे और शारीरिक कर्मका फल शरीर धारण करके भोगता है ।। १८ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि जनमेजयं प्रति वैशम्पायनवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें जनमेजयके प्रति वैशम्पायनका वाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।


१- क्योंकि वह इन्द्रियोंका विषय नहीं रहा।
२- क्योंकि उसके लिये मुझे जाननेका कोई कारण नहीं रहा।

अध्याय (पृष्ठ 2405)

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना

वैशम्पायन उवाच

अदृष्ट्वा तु नृपः पुत्रान् दर्शनं प्रतिलब्धवान् ।
ऋषेः प्रसादात् पुत्राणां स्वरूपाणां कुरुद्वह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने पहले कभी अपने पुत्रोंको नहीं देखा था, परंतु महर्षि व्यासके प्रसादसे उन्होंने उनके स्वरूपका दर्शन प्राप्त कर लिया ॥ १ ॥

स राजा राजधर्मांश्च ब्रह्मोपनिषदं तथा ।
अवाप्तवान्नरश्रेष्ठो बुद्धिनिश्चयमेव च ॥ २ ॥
विदुरश्च महाप्राज्ञो ययौ सिद्धिं तपोबलात् ।
धृतराष्ट्रः समासाद्य व्यासं चैव तपस्विनम् ॥ ३ ॥
उन नरश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने राजधर्म, ब्रह्मविद्या तथा बुद्धिका यथार्थ निश्चय भी पा लिया था। महाज्ञानी विदुरने तो अपने तपोबलसे सिद्धि प्राप्त की थी; परंतु धृतराष्ट्रने तपस्वी व्यासका आश्रय लेकर सिद्धिलाभ किया था ॥ २-३ ॥

जनमेजय उवाच

ममापि वरदो व्यासो दर्शयेत् पितरं यदि ।
तद्रूपवेषवयसं श्रद्दध्यां सर्वमेव ते ॥ ४ ॥
प्रियं मे स्यात् कृतार्थश्च स्यामहं कृतनिश्चयः ।
प्रसादादृषिमुख्यस्य मम कामः समृध्यताम् ॥ ५ ॥
**जनमेजयने कहा—**ब्रह्मन्! यदि वरदायक भगवान् व्यास मुझे भी मेरे पिताका उसी रूप, वेश और अवस्थामें दर्शन करा दें तो मैं आपकी बतायी हुई सारी बातोंपर विश्वास कर सकता हूँ। उस अवस्थामें मैं कृतार्थ होकर दृढ़ निश्चयको प्राप्त हो जाऊँगा। इससे मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सिद्ध होगा। आज मुनिश्रेष्ठ व्यासजीके प्रसादसे मेरी इच्छा भी पूर्ण होनी चाहिये ॥

सौतिरुवाच

इत्युक्तवचने तस्मिन् नृपे व्यासः प्रतापवान् ।
प्रसादमकरोद् धीमानानयच्च परीक्षितम् ॥ ६ ॥

सौति कहते हैं— राजा जनमेजयके इस प्रकार कहनेपर परम प्रतापी बुद्धिमान् महर्षि व्यासने उनपर भी कृपा की। उन्होंने राजा परीक्षित्‌को उस यज्ञभूमिमें बुला दिया ॥ ६ ॥ ततस्तद्रूपवयसमागतं नृपतिं दिवः । श्रीमन्तं पितरं राजा ददर्श जनमेजयः ॥ ७ ॥ स्वर्गसे उसी रूप और अवस्थामें आये हुए अपने तेजस्वी पिता राजा परीक्षित्‌का भूपाल जनमेजयने दर्शन किया ॥ ७ ॥ शमीकं च महात्मानं पुत्रं तं चास्य शृङ्गिणम् । अमात्या ये बभूवुश्च राज्ञस्तांश्च ददर्श ह ॥ ८ ॥ उनके साथ ही महात्मा शमीक और उनके पुत्र शृंगी ऋषि भी थे। राजा परीक्षित्‌के जो मन्त्री थे, उनका भी जनमेजयने दर्शन किया ॥ ८ ॥ ततः सोऽवभृथे राजा मुदितो जनमेजयः । पितरं स्नापयामास स्वयं सस्नौ च पार्थिवः ॥ ९ ॥ (परीक्षिदपि तत्रैव बभूव स तिरोहितः ।) तदनन्तर राजा जनमेजयने प्रसन्न होकर यज्ञान्तस्नानके समय पहले अपने पिताको नहलाया; फिर स्वयं स्नान किया। फिर राजा परीक्षित् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ॥ स्नात्वा स नृपतिर्विप्रमास्तीकमिदमब्रवीत् । यायावरकुलोत्पन्नं जरत्कारुसुतं तदा ॥ १० ॥ स्नान करके उन नरेशने यायावरकुलमें उत्पन्न जरत्कारुकुमार आस्तीक मुनिसे इस प्रकार कहा— ॥ आस्तीक विविधाश्चर्यो यज्ञोऽयमिति मे मतिः । यदद्यायं पिता प्राप्तो मम शोकप्रणाशनः ॥ ११ ॥ ‘आस्तीकजी! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, मेरा यह यज्ञ नाना प्रकारके आश्चर्योंका केन्द्र हो रहा है; क्योंकि आज मेरे शोकोंका नाश करनेवाले ये पिताजी भी यहाँ उपस्थित हो गये थे’ ॥ ११ ॥

आस्तीक उवाच

ऋषिर्द्वैपायनो यत्र पुराणस्तपसो निधिः । यज्ञे कुरुकुलश्रेष्ठ तस्य लोकावुभौ जितौ ॥ १२ ॥ आस्तीक बोले— कुरुकुलश्रेष्ठ! राजन्! जिसके यज्ञमें तपस्याकी निधि पुरातन ऋषि महर्षि द्वैपायन व्यास विराजमान हों, उसकी तो दोनों लोकोंमें विजय है ॥ श्रुतं विचित्रमाख्यानं त्वया पाण्डवनन्दन । सर्पाश्च भस्मसान्नीता गताश्च पदवीं पितुः ॥ १३ ॥

पाण्डवनन्दन! तुमने यह विचित्र उपाख्यान सुना। तुम्हारे शत्रु सर्पगण भस्म होकर तुम्हारे पिताकी ही पदवीको पहुँच गये ॥ १३ ॥

कथंचित् तक्षको मुक्तः सत्यत्वात् तव पार्थिव ।
ऋषयः पूजिताः सर्वे गतिर्दृष्टा महात्मनः ॥ १४ ॥
पृथ्वीनाथ! तुम्हारी सत्यपरायणताके कारण किसी तरह तक्षकके प्राण बच गये हैं। तुमने समस्त ऋषियोंकी पूजा की और महात्मा व्यासकी कहाँतक पहुँच है, इसे प्रत्यक्ष देख लिया ॥ १४ ॥

प्राप्तः सुविपुलो धर्मः श्रुत्वा पापविनाशनम् ।
विमुक्तो हृदयग्रन्थिरुदारजनदर्शनात् ॥ १५ ॥
इस पापनाशक कथाको सुनकर तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति हुई है। उदार हृदयवाले संतोंके दर्शनसे तुम्हारे हृदयकी गाँठ खुल गयी—तुम्हारा सारा संशय दूर हो गया ॥ १५ ॥

ये च पक्षधरा धर्मे सद्वृत्तरुचयश्च ये ।
यान् दृष्ट्वा हीयते पापं तेभ्यः कार्या नमस्क्रिया ॥ १६ ॥
जो लोग धर्मके पक्षपाती हैं, जो सदाचारके पालनमें रुचि रखते हैं तथा जिनके दर्शनसे पापका नाश होता है, उन महात्माओंको अब तुम्हें नमस्कार करना चाहिये ॥ १६ ॥

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठात् स राजा जनमेजयः ।
पूजयामास तमृषिमनुमान्य पुनः पुनः ॥ १७ ॥
सौति कहते हैं— शौनक! विप्रवर आस्तीकके मुखसे यह बात सुनकर राजा जनमेजयने उन महर्षि व्यासका बार-बार पूजन और सत्कार किया ॥ १७ ॥

पप्रच्छ तमृषिं चापि वैशम्पायनमच्युतम् ।
कथावशेषं धर्मज्ञो वनवासस्य सत्तम ॥ १८ ॥
साधुशिरोमणे! तत्पश्चात् उन धर्मज्ञ नरेशने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महर्षि वैशम्पायनसे पुनः धृतराष्ट्रके वनवासकी अवशिष्ट कथा पूछी ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि जनमेजयस्य स्वपितृदर्शने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें जनमेजयके द्वारा अपने पिताका दर्शनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2408)

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना

जनमेजय उवाच

दृष्ट्वा पुत्रांस्तथा पौत्रान् सानुबन्धान् जनाधिपः ।
धृतराष्ट्रः किमकरोद् राजा चैव युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! राजा धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरने परलोकसे आये हुए पुत्रों, पौत्रों तथा सगे-सम्बन्धियोंके दर्शन करके क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पुत्राणां दर्शनं नृप ।
वीतशोकः स राजर्षिः पुनराश्रममागमत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— नरेश्वर! मरे हुए पुत्रोंका दर्शन एक महान् आश्चर्यकी घटना थी। उसे देखकर राजर्षि धृतराष्ट्रका दुःख-शोक दूर हो गया। वे फिर अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २ ॥

इतरस्तु जनः सर्वस्ते चैव परमर्षयः ।
प्रतिजग्मुर्यथाकामं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञया ॥ ३ ॥
दूसरे सब लोग तथा महर्षिगण धृतराष्ट्रकी अनुमति ले अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको चले गये ॥ ३ ॥

पाण्डवास्तु महात्मानो लघुभूयिष्ठसैनिकाः ।
पुनर्जग्मुर्महात्मानं सदारास्तं महीपतिम् ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डव छोटे-बड़े सैनिकों और अपनी स्त्रियोंके साथ पुनः महामना राजा धृतराष्ट्रके पीछे-पीछे गये ॥ ४ ॥

तत्राश्रमपदं धीमान् ब्रह्मर्षिर्लोकपूजितः ।
मुनिः सत्यवतीपुत्रो धृतराष्ट्रमभाषत ॥ ५ ॥
उस समय लोकपूजित बुद्धिमान् सत्यवतीनन्दन ब्रह्मर्षि व्यास भी उस आश्रमपर गये तथा इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्र महाबाहो शृणु कौरवनन्दन ।
श्रुतं ते ज्ञानवृद्धानामृषीणां पुण्यकर्मणाम् ॥ ६ ॥
श्रद्धाभिजनवृद्धानां वेदवेदाङ्गवेदिनाम् ।
धर्मज्ञानां पुराणानां वदतां विविधाः कथाः ॥ ७ ॥

मा स्म शोके मनः कार्षीर्दिष्टे न व्यथते बुधः ।
‘कौरवनन्दन महाबाहु धृतराष्ट्र! तुमने श्रद्धा और कुलमें बढ़े-चढ़े, वेद-वेदांगवेत्ता, ज्ञानवृद्ध, पुण्यकर्मा एवं धर्मज्ञ प्राचीन महर्षियोंके मुखसे नाना प्रकारकी कथाएँ सुनी हैं; अतः अपने मनसे शोकको निकाल दो; क्योंकि विद्वान् पुरुष प्रारब्धके विधानमें दुःख नहीं मानते हैं ।। ६-७ १/२ ।।

श्रुतं देवरहस्यं ते नारदाद् देवदर्शनात् ।। ८ ।।
गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूतां गतिं शुभाम् ।
यथा दृष्टास्त्वया पुत्रास्तथा कामविहारिणः ।। ९ ।।
‘तुमने देवदर्शी नारद मुनिसे देवताओंका गुप्त रहस्य भी सुन लिया है। वे सब वीर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार शस्त्रोंसे पवित्र हुई शुभ गतिको प्राप्त हुए हैं। जैसा कि तुमने देखा है, तुम्हारे सभी पुत्र इच्छानुसार विहार करनेवाले स्वर्गवासी हुए हैं ।। ८-९ ।।

युधिष्ठिरः स्वयं धीमान् भवन्तमनुरुध्यते ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः सदारः ससुहृज्जनः ।। १० ।।
‘ये बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर अपने समस्त भाइयों, घरकी स्त्रियों और सुहृदोंके साथ स्वयं तुम्हारी सेवामें लगे हुए हैं ।। १० ।।

विसर्जयैनं यात्वेष स्वराज्यमनुशासताम् ।
मासः समधिकस्तेषामतीतो वसतां वने ।। ११ ।।
‘अब इन्हें विदा कर दो। ये जायँ और अपने राज्यका काम सँभालें। इन लोगोंको वनमें रहते एक महीनेसे अधिक हो गया ।। ११ ।।

एतद्धि नित्यं यत्नेन पदं रक्ष्यं नराधिप ।
बहुप्रत्यर्थिकं ह्येतद् राज्यं नाम कुरूद्वह ।। १२ ।।
‘कुरुश्रेष्ठ! नरेश्वर! राज्यके बहुत-से शत्रु होते हैं; अतः इसकी सदा ही यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये’ ।। १२ ।।

इत्युक्तः कौरवो राजा व्यासेनासुलतेजसा ।
युधिष्ठिरमथाहूय वाग्मी वचनमब्रवीत् ।। १३ ।।
अनुपम तेजस्वी व्यासजीके ऐसा कहनेपर प्रवचनकुशल कुरुराज धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको बुलाकर इस प्रकार कहा— ।। १३ ।।

अजातशत्रो भद्रं ते शृणु मे भ्रातृभिः सह ।
त्वत्प्रसादान्महीपाल शोको नास्मान् प्रबाधते ।। १४ ।।
‘अजातशत्रो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपने भाइयोंसहित मेरी बात सुनो। भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे अब हमलोगोंको किसी प्रकारका शोक कष्ट नहीं दे रहा है ।। १४ ।।

रमे चाहं त्वया पुत्र पुरेव गजसाह्वये ।
नाथेनानुगतो विद्वन् प्रियेषु परिवर्तिना ।। १५ ।।

प्राप्तं पुत्रफलं त्वत्तः प्रीतिर्मे परमा त्वयि ।
न मे मन्युर्महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ॥ १६ ॥
'बेटा! तुम्हारे साथ रहकर तथा तुम-जैसे रक्षकसे सुरक्षित होकर मैं उसी तरह आनन्दका अनुभव कर रहा हूँ, जैसे पहले हस्तिनापुरमें करता था। विद्वन्! प्रियजनोंकी सेवामें लगे रहनेवाले तुम्हारे द्वारा मुझे पुत्रका फल प्राप्त हो गया। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। महाबाहो! पुत्र! मेरे मनमें तुम्हारे प्रति किंचिन्मात्र भी क्रोध नहीं है; अतः तुम राजधानीको जाओ, अब विलम्ब न करो ॥ १५-१६ ॥
भवन्तं चेह सम्प्रेक्ष्य तपो मे परिहीयते ।
तपोयुक्तं शरीरं च त्वां दृष्ट्वा धारितं पुनः ॥ १७ ॥
'तुमको यहाँ देखकर मेरी तपस्यामें बाधा पड़ रही है। यह शरीर तपस्यामें लगा दिया था, परंतु तुम्हें देखकर फिर इसकी रक्षा करने लगा ॥ १७ ॥
मातरौ ते तथैवेमे शीर्णपर्णकृताशने ।
मम तुल्यव्रते पुत्र न चिरं वर्तयिष्यतः ॥ १८ ॥
बेटा! मेरी ही तरह तुम्हारी ये दोनों माताएँ भी व्रत धारणपूर्वक सूखे पत्ते चबाकर रहा करती हैं। अब ये अधिक दिनोंतक जीवन धारण नहीं कर सकतीं ॥ १८ ॥
दुर्योधनप्रभृतयो दृष्टा लोकान्तरं गताः ।
व्यासस्य तपसो वीर्याद् भवतश्च समागमात् ॥ १९ ॥
प्रयोजनं च निर्वृत्तं जीवितस्य ममानघ ।
उग्रं तपः समास्थास्ये त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ २० ॥
'तुम्हारे समागम और व्यासजीके तपोबलसे मुझे अपने परलोकवासी पुत्र दुर्योधन आदिके दर्शन हो गये; इसलिये मेरे जीवित रहनेका प्रयोजन पूरा हो गया। अनघ! अब मैं कठोर तपस्यामें संलग्न होऊँगा। तुम इसके लिये मुझे अनुमति दे दो ॥ १९-२० ॥
त्वय्यद्य पिण्डः कीर्तिश्च कुलं चेदं प्रतिष्ठितम् ।
श्वो वाद्य वा महाबाहो गम्यतां पुत्र मा चिरम् ॥ २१ ॥
'महाबाहो! आजसे पितरोंके पिण्डका, सुयशका और इस कुलका भार भी तुम्हारे ही ऊपर है। पुत्र! आज या कल अवश्य चले जाओ; विलम्ब न करना ॥
राजनीतिः सुबहुशः श्रुता ते भरतर्षभ ।
संदेश्टव्यं न पश्यामि कृतं मे भवता विभो ॥ २२ ॥
'भरतश्रेष्ठ! प्रभो! तुमने राजनीति बहुत बार सुनी है; अतः तुम्हें संदेश देने लायक कोई बात मुझे नहीं दिखायी देती। तुमने मेरे लिये बहुत कुछ किया है ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तवचनं तं तु नृपो राजानमब्रवीत् ।

न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥ २३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्रने वैसी बात कही, तब

युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा—'धर्मके ज्ञाता महाराज! आप मेरा परित्याग न करें,

क्योंकि मैं सर्वथा निरपराध हूँ ॥ २३ ॥

कामं गच्छन्तु मे सर्वे भ्रातरोऽनुचरास्तथा ।

भवन्तमहमन्विष्ये मातरौ च यतव्रतः ॥ २४ ॥

'मेरे ये सब भाई और सेवक इच्छा हो तो चले जायें; किंतु मैं नियम और व्रतका पालन

करता हुआ आपकी तथा इन दोनों माताओंकी सेवा करूँगा ॥ २४ ॥

तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व च ।

त्वय्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ॥ २५ ॥

गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत् पूजिता वयम् ।

राजा यदाह तत् कार्यं त्वया पुत्र पितुर्वचः ॥ २६ ॥

यह सुनकर गान्धारीने कहा—'बेटा! ऐसी बात न कहो। मैं जो कहती हूँ उसे सुनो। यह

सारा कुरुकुल तुम्हारे ही अधीन है। मेरे श्वशुरका पिण्ड भी तुमपर ही अवलम्बित है; अतः

पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिये जितना किया है, वही बहुत है। तुम्हारे द्वारा हमलोगोंका

स्वागत-सत्कार भलीभाँति हो चुका है। इस समय महाराज जो आज्ञा दे रहे हैं, वही करो;

क्योंकि पिताका वचन मानना तुम्हारा कर्तव्य है' ॥ २५-२६ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तु गान्धार्या कुन्तीमिदमभाषत ।

स्नेहबाष्पाकुले नेत्रे प्रमृज्य रुदतीं वचः ॥ २७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! गान्धारीके इस प्रकार आदेश देनेपर राजा

युधिष्ठिरने अपने आँसूभरे नेत्रोंको पोंछकर रोती हुई कुन्तीसे कहा— ॥ २७ ॥

विसर्जयति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी ।

भवत्यां बद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ॥ २८ ॥

'माँ! राजा और यशस्विनी गान्धारीदेवी भी मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दे रही हैं; किंतु

मेरा मन आपमें लगा हुआ है। जानेका नाम सुनकर ही मैं बहुत दुखी हो जाता हूँ। ऐसी

दशामें मैं कैसे जा सकूँगा? ॥ २८ ॥

न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि ।

तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥ २९ ॥

'धर्मचारिणि! मैं आपकी तपस्यामें विघ्न डालना नहीं चाहता; क्योंकि तपसे बढ़कर

कुछ नहीं है। (निष्काम भावपूर्वक) तपस्यासे परब्रह्म परमात्माकी भी प्राप्ति हो जाती

है ॥ २९ ॥

ममापि न तथा राज्ञि राज्ये बुद्धिर्यथा पुरा ।
तपस्येवानुरक्तं मे मनः सर्वात्मना तथा ॥ ३० ॥
'रानी माँ! अब मेरा मन भी पहलेकी तरह राजकाजमें नही लगता है। हर तरहसे तपस्या करनेको ही जी चाहता है ॥ ३० ॥

शून्येयं च मही कृत्स्ना न मे प्रीतिकरी शुभे ।
बान्धवा नः परिक्षीणा बलं नो न यथा पुरा ॥ ३१ ॥
'शुभे! यह सारी पृथ्वी मेरे लिये सूनी हो गयी है; अतः इससे मुझे प्रसन्नता नहीं होती। हमारे सगे-सम्बन्धी नष्ट हो गये; अब हमारे पास पहलेकी तरह सैन्यबल भी नहीं है ॥ ३१ ॥

पञ्चालाः सुभृशं क्षीणाः कथामात्रावशेषिताः ।
न तेषां कुलकर्तारं कंचित् पश्याम्यहं शुभे ॥ ३२ ॥
'पांचालोंका तो सर्वथा नाश ही हो गया। उनकी कथामात्र शेष रह गयी है। शुभे! अब मुझे कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो उनके वंशको चलानेवाला हो ॥ ३२ ॥

सर्वे हि भस्मसान्नीतास्ते द्रोणेन रणाजिरे ।
अवशिष्टाश्च निहता द्रोणपुत्रेण वै निशि ॥ ३३ ॥
'प्रायः द्रोणाचार्यने ही सबको समरांगणमें भस्म कर डाला था। जो थोड़े-से बच गये थे, उन्हें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रातको सोते समय मार डाला ॥ ३३ ॥

चेदयश्चैव मत्स्याश्च दृष्टपूर्वास्तथैव नः ।
केवलं वृष्णिचक्रं च वासुदेवपरिग्रहात् ॥ ३४ ॥
'हमारे सम्बन्धी चेदि और मत्स्यदेशके लोग भी जैसे पहले देखे गये थे, वैसे ही अब नहीं रहे। केवल भगवान् श्रीकृष्णके आश्रयसे वृष्णिवंशी वीरोंका समुदाय अबतक सुरक्षित है ॥ ३४ ॥

यद् दृष्ट्वा स्थातुमिच्छामि धर्मार्थं नार्थहेतुतः ।
शिवेन पश्य नः सर्वान् दुर्लभं तव दर्शनम् ॥ ३५ ॥
अविषह्यं च राजा हि तीव्रं चारप्स्यते तपः ।
'उसे ही देखकर अब मैं केवल धर्मसम्पादनकी इच्छासे यहाँ रहना चाहता हूँ, धनके लिये नहीं। तुम हम सब लोगोंकी ओर कल्याणमयी दृष्टिसे देखो; क्योंकि तुम्हारा दर्शन हमलोगोंके लिये अब दुर्लभ हो जायगा। कारण कि राजा धृतराष्ट्र अब बड़ी कठोर और असह्य तपस्या आरम्भ करेंगे' ॥ ३५ १/२ ॥

एतच्छ्रुत्वा महाबाहुः सहदेवो युधां पतिः ॥ ३६ ॥
युधिष्ठिरमुवाचेदं बाष्पव्याकुललोचनः ।
यह सुनकर योद्धाओंके स्वामी महाबाहु सहदेव अपने दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ ३६ १/२ ॥