महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1867)
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना
वैशम्पायन उवाच
स मित्रसहमासाद्य अभिज्ञानमयाचत ।
तस्मै ददावभिज्ञानं स चेक्ष्वाकुवरस्तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! रानी मदयन्तीकी बात सुनकर उत्तंकने महाराज मित्रसह (सौदास)-के पास जाकर उनसे कोई पहचान माँगी। तब इक्ष्वाकुवंशियोंमें श्रेष्ठ उन नरेशने पहचानके रूपमें रानीको सुनानेके लिये निम्नांकित सन्देश दिया ॥ १ ॥
सौदास उवाच
न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः ।
एतन्मे मतमाज्ञाय प्रयच्छ मणिकुण्डले ॥ २ ॥
सौदास बोले— प्रिये! मैं जिस दुर्गतिमें पड़ा हूँ, यह मेरे लिये कल्याण करनेवाली नहीं है तथा इसके सिवा अब दूसरी कोई भी गति नहीं है। मेरे इस विचारको जानकर तुम अपने दोनों मणिमय कुण्डल इन ब्राह्मणदेवताको दे डालो ॥ २ ॥
इत्युक्तस्तामुत्तङ्कस्तु भर्तुर्वाक्यमथाब्रवीत् ।
श्रुत्वा च सा तदा प्रादात् ततस्ते मणिकुण्डले ॥ ३ ॥
राजाके ऐसा कहनेपर उत्तंकने रानीके पास जाकर पतिकी कही हुई बात ज्यों-की-त्यों दोहरा दी। महारानी मदयन्तीने स्वामीका वचन सुनकर उसी समय अपने मणिमय कुण्डल उत्तंक मुनिको दे दिये ॥ ३ ॥
अवाप्य कुण्डले ते तु राजानं पुनरब्रवीत् ।
किमेतद् गुह्यवचनं श्रोतुमिच्छामि पार्थिव ॥ ४ ॥
उन कुण्डलोंको पाकर उत्तंक मुनि पुनः राजाके पास आये और इस प्रकार बोले—‘पृथ्वीनाथ! आपके गूढ़ वचनका क्या अभिप्राय था, यह मैं सुनना चाहता हूँ’ ॥ ४ ॥
सौदास उवाच
प्रजानिसर्गाद् विप्रान् वै क्षत्रियाः पूजयन्ति ह ।
विप्रेभ्यश्चापि बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति वै ॥ ५ ॥
सौदास बोले—ब्रह्मन्! क्षत्रियलोग सृष्टिके प्रारम्भकालसे ब्राह्मणोंकी पूजा करते आ रहे हैं तथापि ब्राह्मणोंकी ओरसे भी क्षत्रियोंके लिये बहुत-से दोष प्रकट हो जाते हैं ॥ ५ ॥
सोऽहं द्विजेभ्यः प्रणतो विप्राद् दोषमवाप्तवान् ।
गतिमन्यां न पश्यामि मदयन्तीसहायवान् ॥ ६ ॥
मैं सदा ही ब्राह्मणोंको प्रणाम किया करता था, किंतु एक ब्राह्मणके ही शापसे मुझे यह दोष—यह दुर्गति प्राप्त हुई है। मैं मदयन्तीके साथ यहाँ रहता हूँ, मुझे इस दुर्गतिसे छुटकारा पानेका कोई उपाय नहीं दिखायी देता ॥ ६ ॥
न चान्यामपि पश्यामि गतिं गतिमतां वर ।
स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम ॥ ७ ॥
जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर! अब इस लोकमें रहकर सुख पाना और परलोकमें स्वर्गीय सुख भोगनेके लिये मुझे दूसरी कोई गति नहीं दीख पड़ती ॥ ७ ॥
न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः ।
शक्यं हि लोके स्थातुं वै प्रेत्य वा सुखमेधितुम् ॥ ८ ॥
कोई भी राजा विशेषरूपसे ब्राह्मणोंके साथ विरोध करके न तो इसी लोकमें चैनसे रह सकता है और न परलोकमें ही सुख पा सकता है। यही मेरे गूढ़ संदेशका तात्पर्य है ॥ ८ ॥
तदिष्टे ते मया दत्ते एते स्वे मणिकुण्डले ।
यः कृतस्तेऽद्य समयः सफलं तं कुरुष्व मे ॥ ९ ॥
अच्छा अब आपकी इच्छाके अनुसार ये अपने मणिमय कुण्डल मैंने आपको दे दिये। अब आपने जो प्रतिज्ञा की है, वह सफल कीजिये ॥ ९ ॥
उत्तङ्क उवाच
राजंस्तथैह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम् ।
प्रश्नं च कंचित् प्रष्टुं त्वां निवृत्तोऽस्मि परंतप ॥ १० ॥
उत्तंकने कहा—राजन्! शत्रुसंतापी नरेश! मैं अपनी प्रतिज्ञाका पालन करूँगा, पुनः आपके अधीन हो जाऊँगा; किंतु इस समय एक प्रश्न पूछनेके लिये आपके पास लौटकर आया हूँ ॥ १० ॥
सौदास उवाच
ब्रूहि विप्र यथाकामं प्रतिवक्तास्मि ते वचः ।
छेत्तास्मि संशयं तेऽद्य न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ११ ॥
सौदासने कहा—विप्रवर! आप इच्छानुसार प्रश्न कीजिये। मैं आपकी बातका उत्तर दूँगा। आपके मनमें जो भी संदेह होगा अभी उसका निवारण करूँगा। इसमें मुझे कुछ भी विचार करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी ॥ ११ ॥
उत्तङ्क उवाच
प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः ।
मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥ १२ ॥
उत्तंकने कहा— राजन्! धर्मनिपुण विद्वानोंने उसीको ब्राह्मण कहा है, जो अपनी वाणीका संयम करता हो—सत्यवादी हो। जो मित्रोंके साथ विषमताका व्यवहार करता है, उसे चोर माना गया है ॥ १२ ॥
स भवान् मित्रतामद्य सम्प्राप्तो मम पार्थिव ।
स मे बुद्धिं प्रयच्छस्व सम्मतां पुरुषर्षभ ॥ १३ ॥
पृथ्वीनाथ! पुरुषप्रवर! आज आपके साथ मेरी मित्रता हो गयी है, इसलिये आप मुझे अच्छी सलाह दीजिये ॥ १३ ॥
अवाप्तार्थोऽहमद्येह भवांश्च पुरुषादकः ।
भवत्सकाशमागन्तुं क्षमं मम न वेति वै ॥ १४ ॥
आज यहाँ मेरा मनोरथ सफल हो गया है और आप नरभक्षी राक्षस हो गये हैं। ऐसी दशामें आपके पास मेरा फिर लौटकर आना उचित है या नहीं ॥ १४ ॥
सौदास उवाच
क्षमं चेदिह वक्तव्यं तव द्विजवरोत्तम ।
मत्समीपं द्विजश्रेष्ठ नागन्तव्यं कथंचन ॥ १५ ॥
सौदासने कहा— द्विजश्रेष्ठ! यदि यहाँ मुझे उचित बात कहनी है, तब तो मैं यही कहूँगा कि ब्राह्मणोत्तम! आपको मेरे पास किसी तरह नहीं आना चाहिये ॥ १५ ॥
एवं तव प्रपश्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वह ।
आगच्छतो हि ते विप्र भवेन्मृत्युर्न संशयः ॥ १६ ॥
भृगुकुलभूषण विप्र! ऐसा करनेमें ही मैं आपकी भलाई देखता हूँ। यदि आयेंगे तो आपकी मृत्यु हो जायगी। इसमें संशय नहीं है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तदा राज्ञा क्षमं बुद्धिमता हितम् ।
अनुज्ञाप्य स राजानमहल्यां प्रतिजग्मिवान् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान् राजा सौदासके मुखसे उचित और हितकी बात सुनकर उनकी आज्ञा ले उत्तंक मुनि अहल्याके पास चल दिये ॥ १७ ॥
गृहीत्वा कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्याः प्रियंकरः ।
जवेन महता प्रायाद् गौतमस्याश्रमं प्रति ॥ १८ ॥
गुरुपत्नीका प्रिय करनेवाले उत्तंक दोनों दिव्य कुण्डल लेकर बड़े वेगसे गौतमके आश्रमकी ओर बढ़े ॥ १८ ॥
यथा तयो रक्षणं च मदयन्त्याभिभाषितम् ।
तथा ते कुण्डले बद्ध्वा तदा कृष्णाजिनेऽनयत् ॥ १९ ॥
रानी मदयन्तीने उन कुण्डलोंकी रक्षाके लिये जैसी विधि बतायी थी, उसी प्रकार उन्हें काले मृगचर्ममें बाँधकर वे ले जा रहे थे ॥ १९ ॥
स कस्मिंश्चित् क्षुधाविष्टः फलभारसमन्वितम् ।
बिल्वं ददर्श विप्रर्षिरारुरोह च तं ततः ॥ २० ॥
शाखामासज्य तस्यैव कृष्णाजिनमरिंदम ।
पातयामास बिल्वानि तदा स द्विजपुङ्गवः ॥ २१ ॥
शत्रुदमन! रास्तेमें एक स्थानमें उन्हें बड़े जोरकी भूख लगी। वहाँ पास ही फलोंके भारसे झुका हुआ एक बेलका वृक्ष दिखायी दिया। ब्रह्मर्षि उत्तंक उस वृक्षपर चढ़ गये और उस काले मृगचर्मको उन्होंने उसकी एक शाखामें बाँध दिया। फिर वे ब्राह्मणपुंगव उस समय वहाँ बेल तोड़-तोड़कर गिराने लगे ॥ २०-२१ ॥
अथ पातयमानस्य बिल्वापहृतचक्षुषः ।
न्यपतंस्तानि बिल्वानि तस्मिन्नेवाजिने विभो ॥ २२ ॥
यस्मिंस्ते कुण्डले बद्धे तदा द्विजवरेण वै ।
उस समय उनकी दृष्टि बेलोंपर ही लगी हुई थी (वे कहाँ गिरते हैं, इसकी ओर उनका ध्यान नहीं था)। प्रभो! उनके तोड़े हुए प्रायः सभी बेल उस मृगछालापर ही, जिसमें उन विप्रवरने वे दोनों कुण्डल बाँध रखे थे, गिरे ॥ २२ ½ ॥
बिल्वप्रहारैस्तस्याथ व्यशीर्यद् बन्धनं ततः ॥ २३ ॥
सकुण्डलं तदजिनं पपात सहसा तरोः ।
उन बेलोंकी चोटसे बन्धन टूट गया और कुण्डल्सहित वह मृगचर्म सहसा वृक्षसे नीचे जा गिरा ॥ २३ ½ ॥
विशीर्णबन्धने तस्मिन् गते कृष्णाजिने महीम् ॥ २४ ॥
अपश्यद् भुजगः कश्चित् ते तत्र मणिकुण्डले ।
ऐरावतकुलोद्भूतः शीघ्रो भूत्वा तदा हि सः ॥ २५ ॥
विदश्यास्येन वल्मीकं विवेशाथ स कुण्डले ।
बन्धन टूट जानेपर उस काले मृगछालेके पृथ्वीपर गिरते ही किसी सर्पकी दृष्टि उसपर पड़ी। वह ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुआ तक्षक था। उसने मृगछालाके भीतर रखे हुए उस मणिमय कुण्डलोंको देखा। फिर तो बड़ी शीघ्रता करके वह उन कुण्डलोंको दाँतोंमें दबाकर एक बाँबीमें घुस गया ॥ २४-२५ ½ ॥
ह्रियमाणे तु दृष्ट्वा स कुण्डले भुजगेन ह ॥ २६ ॥
पपात वृक्षात् सोद्वेगो दुःखात् परमकोपनः ।
स दण्डकाष्ठमादाय वल्मीकमखनत् तदा ॥ २७ ॥
सर्पके द्वारा कुण्डलोंका अपहरण होता देख उत्तंक मुनि उद्विग्न हो उठे और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वृक्षसे कूद पड़े। आकर एक काठका डंडा हाथमें ले उसीसे उस बाँबीको खोदने लगे ॥ २६-२७ ॥
अहानि त्रिंशदव्यग्रः पञ्च चान्यानि भारत । क्रोधामर्षाभिसंतप्तस्तदा ब्राह्मणसत्तमः ॥ २८ ॥
भरतनन्दन! ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक क्रोध और अमर्षसे संतप्त हो लगातार पैंतीस दिनोंतक बिना किसी घबराहटके बिल खोदनेके कार्यमें जुटे रहे ॥ २८ ॥
तस्य वेगमसह्यं तमसंहन्ती वसुन्धरा । दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमाकुला ॥ २९ ॥
उनके उस असह्य वेगको पृथ्वी भी नहीं सह सकी। वह डंडेकी चोटसे घायल एवं अत्यन्त व्याकुल होकर डगमगाने लगी ॥ २९ ॥
ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम् । नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात् ॥ ३० ॥ रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान् । वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम् ॥ ३१ ॥
उत्तंक नागलोकमें जानेका मार्ग बनानेके लिये निश्चय करके धरती खोदते ही जा रहे थे कि महातेजस्वी वज्रधारी इन्द्र घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर उस स्थानपर आ पहुँचे और विप्रवर उत्तंकसे मिले ॥ ३०-३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः । उत्तङ्कमब्रवीत् वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै ॥ ३२ ॥ इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः । न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव ॥ ३३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इन्द्र उत्तंकके दुःखसे दुःखी थे। अतः ब्राह्मणका वेष बनाकर उनसे बोले—'ब्रह्मन्! यह काम तुम्हारे वशका नहीं है। नागलोक यहाँसे हजारों योजन दूर है। इस काठके डंडेसे वहाँका रास्ता बने, यह कार्य सधनेवाला नहीं जान पड़ता' ॥ ३२-३३ ॥
उत्तङ्क उवाच
नागलोके यदि ब्रह्मन् न शक्ये कुण्डले मया ।
प्राप्तुं प्राणान् विमोक्ष्यामि पश्यतस्तु द्विजोत्तम ॥ ३४ ॥
**उत्तंकने कहा—**ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! यदि नागलोकमें जाकर उन कुण्डलोंको प्राप्त करना मेरे लिये असम्भव है तो मैं आपके सामने ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा ॥ ३४ ॥
वैशम्पायन उवाच
यदा स नाशकत् तस्य निश्चयं कर्तुमन्यथा ।
वज्रपाणिस्तदा दण्डं वज्रास्त्रेण युयोज ह ॥ ३५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! वज्रधारी इन्द्र जब किसी तरह उतंकको अपने निश्चयसे न हटा सके, तब उन्होंने उनके डंडेके अग्रभागमें अपने वज्रास्त्रका संयोग कर दिया ॥ ३५ ॥
ततो वज्रप्रहारैस्तैर्दार्यमाणा वसुन्धरा ।
नागलोकस्य पन्थानमकरोज्जनमेजय ॥ ३६ ॥
जनमेजय! उस वज्रके प्रहारसे विदीर्ण होकर पृथ्वीने नागलोकका रास्ता प्रकट कर दिया ।। ३६ ।। स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह । ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रशः ।। ३७ ।। उसी मार्गसे उन्होंने नागलोकमें प्रवेश किया और देखा कि नागोंका लोक सहस्रों योजन विस्तृत है ।। ३७ ।। प्राकारनिचयैर्दिव्यैर्मणिमुक्तास्वंलकृतैः । उपपन्नं महाभाग शातकुम्भमयैस्तथा ।। ३८ ।। महाभाग! उसके चारों ओर दिव्य परकोटे बने हुए हैं; जो सोनेकी ईंटोंसे बने हुए हैं और मणि-मुक्ताओंसे अलंकृत हैं ।। ३८ ।। वापीः स्फटिकसोपाना नदीश्च विमलोदकाः । ददर्श वृक्षांश्च बहून् नानाद्विजगणायुतान् ।। ३९ ।। वहाँ स्फटिक मणिकी बनी हुई सीढ़ियोंसे सुशोभित बहुत-सी बावडियों, निर्मल जलवाली अनेकानेक नदियों और विहगवृन्दसे विभूषित बहुत-से मनोहर वृक्षोंको भी उन्होंने देखा ।। ३९ ।। तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वहः । पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ।। ४० ।। भृगुकुलतिलक उत्तंकने नागलोकका बाहरी दरवाजा देखा, जो सौ योजन लंबा और पाँच योजन चौड़ा था ।। ४० ।। नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत् तदा । निराशश्चाभवत् तत्र कुण्डलाहरणे पुनः ।। ४१ ।। नागलोककी वह विशालता देखकर उत्तंक मुनि उस समय दीन—हतोत्साह हो गये। अब उन्हें फिर कुण्डल पानेकी आशा नहीं रही ।। ४१ ।। तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः । ताम्रास्यनेत्रः कौरव्य प्रज्वलन्निव तेजसा ।। ४२ ।। इसी समय उनके पास एक घोड़ा आया, जिसकी पूँछके बाल काले और सफेद थे। उसके नेत्र और मुँह लाल रंगके थे। कुरुनन्दन! वह अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ।। ४२ ।। धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे । ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले ।। ४३ ।। उसने उत्तंकसे कहा—विप्रवर! तुम मेरे इस अपान मार्गमें फूँक मारो। ऐसा करनेसे ऐरावतके पुत्रने जो तुम्हारे दोनों कुण्डल लाये हैं, वे तुम्हें मिल जायँगे ।। ४३ ।। मा जुगुप्सां कृथाः पुत्र त्वमत्रार्थे कथंचन ।
त्वयैतद्धि समाचीर्णं गौतमस्याश्रमे तदा ॥ ४४ ॥ 'बेटा! इस कार्यमें तुम किसी तरह घृणा न करो; क्योंकि गौतमके आश्रममें रहते समय तुमने अनेक बार ऐसा किया है' ॥ ४४ ॥
उत्तङ्क उवाच
कथं भवन्तं जानीयामुपाध्यायाश्रमं प्रति । यन्मया चीर्णपूर्वं हि श्रोतुमिच्छामि तद्धयहम् ॥ ४५ ॥ **उत्तंकने पूछा—**गुरुदेवके आश्रमपर मैंने कभी आपका दर्शन किया है, इसका ज्ञान मुझे कैसे हो? और आपके कथनानुसार वहाँ रहते समय पहले जो कार्य मैं अनेक बार कर चुका हूँ, वह क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ४५ ॥
अश्व उवाच
गुरोर्गुरुं मां जानीहि ज्वलनं जातवेदसम् । त्वया ह्याहं सदा विप्र गुरोरर्थेऽभिपूजितः ॥ ४६ ॥ विधिवत् सततं विप्र शुचिना भृगुनन्दन । तस्माच्छ्रेयो विधास्यामि तवैवं कुरु मा चिरम् ॥ ४७ ॥ **घोड़ेने कहा—**ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु जातवेदा अग्नि हूँ, यह तुम अच्छी तरह जान लो। भृगुनन्दन! तुमने अपने गुरुके लिये सदा पवित्र रहकर विधिपूर्वक मेरी पूजा की है। इसलिये मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा। अब तुम मेरे बताये अनुसार कार्य करो, विलम्ब न करो ॥ ४६-४७ ॥
इत्युक्तस्तु तथाकार्षीदुत्तङ्कश्चित्रभानुना ।
घृतार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ४८ ॥
अग्निदेवके ऐसा कहनेपर उतंकने उनकी आज्ञाका पालन किया। तब घृतमयी अर्चिवाले अग्निदेव प्रसन्न होकर नागलोकको जला डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४८ ॥
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो ध्म्यतस्तत्र भारत ।
घनः प्रादुरभूद् धूमो नागलोकभयावहः ॥ ४९ ॥
भारत! जिस समय उतंकने फूँक मारना आरम्भ किया, उसी समय उस अश्वरूपधारी अग्निके रोम-रोमसे घनीभूत धूम उठने लगा; जो नागलोकको भयभीत करनेवाला था ॥ ४९ ॥
तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत ।
नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५० ॥
महाराज भरतनन्दन! बढ़ते हुए उस महान् धूमसे आच्छन्न हुए नागलोकमें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५० ॥
हाहाकृतमभूत् सर्वमैरावतनिवेशनम् ।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय ॥ ५१ ॥
न प्रकाशन्त वेश्मानि धूमरुद्धानि भारत । नीहारसंवृतानीव वनानि गिरयस्तथा ॥ ५२ ॥ जनमेजय! ऐरावतके सारे घरमें हाहाकार मच गया। भारत! वासुकि आदि नागोंके घर धूमसे आच्छादित हो गये। उनमें अँधेरा छा गया। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो कुहासासे ढके हुए वन और पर्वत हों ॥ ५१-५२ ॥
ते धूमरक्तनयना वह्नितेजोऽभितापिताः । आजग्मुर्निश्चयं ज्ञातुं भार्गवस्य महात्मनः ॥ ५३ ॥ धुआँ लगनेसे नागोंकी आँखें लाल हो गयी थीं। वे आगकी आँचसे तप रहे थे। महात्मा भार्गव (उत्तंक)-का क्या निश्चय है, यह जाननेके लिये सभी एकत्र होकर उनके पास आये ॥ ५३ ॥
श्रुत्वा च निश्चयं तस्य महर्षेरतितेजसः । सम्भ्रान्तनयनाः सर्वे पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥ ५४ ॥ उस समय उन अत्यन्त तेजस्वी महर्षिका निश्चय सुनकर सबकी आँखें भयसे कातर हो गयीं तथा सबने उनका विधिवत् पूजन किया ॥ ५४ ॥
सर्वे प्राञ्जलयो नागा वृद्धबालपुरोगमाः । शिरोभिः प्रणिपत्योचुः प्रसीद भगवन्निति ॥ ५५ ॥ अन्तमें सभी नाग बूढ़े और बालकोंको आगे करके हाथ जोड़, मस्तक झुका प्रणाम करके बोले—'भगवन्! हमपर प्रसन्न हो जाइये' ॥ ५५ ॥
प्रसाद्य ब्राह्मणं ते तु पाद्यमर्घ्यं निवेद्य च । प्रायच्छन् कुण्डले दिव्ये पन्नगाः परमार्चिते ॥ ५६ ॥ इस प्रकार ब्राह्मण देवताको प्रसन्न करके नागोंने उन्हें पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया और वे दोनों परम पूजित दिव्य कुण्डल भी वापस कर दिये ॥ ५६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1877)
महारानी मदयन्तीका उत्तङ्कको कुण्डल-दान
अध्याय (पृष्ठ 1878)
उत्तङ्कका गुरुपत्नीको कुण्डल-अर्पण
ततः स पूजितो नागैस्तदोत्तङ्कः प्रतापवान् । अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत् ।। ५७ ।। तदनन्तर नागोंसे सम्मानित होकर प्रतापी उत्तंक मुनि अग्निदेवकी प्रदक्षिणा करके गुरुके आश्रमकी ओर चल दिये ।। ५७ ।।
स गत्वा त्वरितो राजन् गौतमस्य निवेशनम् । प्रायच्छत् कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्यास्तदानघ ।। ५८ ।। निष्पाप नरेश! वहाँ गौतमके घरमें शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर उन्होंने गुरुपत्नीको वे दोनों दिव्य कुण्डल दे दिये ।। ५८ ।।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय । सर्वं शशंस गुरवे यथावद् द्विजसत्तमः ।। ५९ ।। जनमेजय! वासुकि आदि नागोंके यहाँ जो घटना घटी थी, उसका सारा समाचार द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने अपने गुरु महर्षि गौतमसे ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ५९ ।।
एवं महात्मना तेन त्रींल्लोँकान् जनमेजय । परिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले ।। ६० ।। जनमेजय! इस प्रकार महात्मा उत्तंकने तीनों लोकोंमें घूमकर वे मणिमय दिव्य कुण्डल प्राप्त किये थे ।। ६० ।।
एवंप्रभावः स मुनिरुत्तङ्को भरतर्षभ । परेण तपसा युक्तो यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ६१ ।। भरतश्रेष्ठ! उत्तंक मुनि, जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे थे, ऐसे ही प्रभावशाली और महान् तपस्वी थे ।। ६१ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकका उपाख्यानविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५८ ।।
भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना
एकोनषष्टितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना
जनमेजय उवाच
उत्तङ्कस्य वरं दत्त्वा गोविन्दो द्विजसत्तम ।
अत ऊर्ध्वं महाबाहुः किं चकार महायशाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! महायशस्वी महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने उत्तंकको वरदान देनेके पश्चात् क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
उत्तङ्काय वरं दत्त्वा प्रायात् सात्यकिना सह ।
द्वारकामेव गोविन्दः शीघ्रवेगैर्महाहयैः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**उत्तंकको वर देकर भगवान् श्रीकृष्ण महान् वेगशाली शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा सात्यकि (और सुभद्रा)-के साथ पुनः द्वारकाकी ओर ही चल दिये ॥ २ ॥
सरांसि सरितश्चैव वनानि च गिरींस्तथा ।
अतिक्रम्याससादाथ रम्यां द्वारवतीं पुरीम् ॥ ३ ॥
वर्तमाने महाराज महे रैवतकस्य च ।
उपायात् पुण्डरीकाक्षो युयुधानानुगस्तदा ॥ ४ ॥
मार्गमें अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों और पर्वतोंको लाँघकर वे परम रमणीय द्वारका नगरीमें जा पहुँचे। महाराज! उस समय वहाँ रैवतक पर्वतपर कोई बड़ा भारी उत्सव मनाया जा रहा था। सात्यकिको साथ लिये कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय उस महोत्सवमें पधारे ॥ ३-४ ॥
अलंकृतस्तु स गिरिर्नानारूपैर्विचित्रितैः ।
बभौ रत्नमयैः कोशैः संवृतः पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥
पुरुषप्रवर! वह पर्वत नाना प्रकारके विचित्र रत्नमय ढेरोंद्वारा सजाया गया था, उस समय उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ५ ॥
काञ्चनस्रग्भिरग्र्याभिः सुमनोभिस्तथैव च ।
वासोभिश्च महाशैलः कल्पवृक्षैस्तथैव च ॥ ६ ॥
सोनेकी सुन्दर मालाओं, भाँति-भाँतिके पुष्पों, वस्त्रों और कल्पवृक्षोंसे घिरे हुए उस महान् शैलकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ६ ॥
दीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः ।
गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो बभूव ह ॥ ७ ॥
वृक्षके आकारमें सजाये हुए सोनेके दीप उस स्थानकी शोभाको और भी उद्दीप्त कर रहे थे। वहाँकी गुफाओं और झरनोंके स्थानोंमें दिनके समान प्रकाश हो रहा था ॥ ७ ॥
पताकाभिर्विचित्राभिः सघण्टाभिः समन्ततः ।
पुम्भिः स्त्रीभिश्च संघुष्टः प्रगीत इव चाभवत् ॥ ८ ॥
चारों ओर विचित्र पताकाएँ फहरा रही थीं, उनमें बँधी हुई घण्टियाँ बज रही थीं और स्त्रियों तथा पुरुषोंके सुमधुर शब्द वहाँ व्याप्त हो रहे थे। इससे वह पर्वत संगीतमय-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ८ ॥
अतीव प्रेक्षणीयोऽभून्मेरुर्मुनिगणैरिव ।
मत्तानां हृष्टरूपाणां स्त्रीणां पुंसां च भारत ॥ ९ ॥
गायतां पर्वतेन्द्रस्य दिवस्पृगिव निःस्वनः ।
जैसे मुनिगणोंसे मेरुकी शोभा होती है, उसी प्रकार द्वारकावासियोंके समागमसे वह पर्वत अत्यन्त दर्शनीय हो गया था। भरतनन्दन! उस पर्वतराजके शिखरपर हर्षोन्मत्त होकर गाते हुए स्त्री-पुरुषोंका सुमधुर शब्द मानो स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहा था ॥ ९१/२ ॥
प्रमत्तमत्तसम्मत्तक्ष्वेडितोत्कृष्टसंकुलः ॥ १० ॥
तथा किलकिलाशब्दैर्भूर्धरोऽभून्मनोहरः ।
कुछ लोग क्रीडा आदिमें आसक्त होकर दूसरे कार्योंकी ओर ध्यान नहीं देते थे, कितने ही हर्षसे मतवाले हो रहे थे, कुछ लोग कूदते-फाँदते, उच्च स्वरसे कोलाहल करते और किलकारियाँ भरते थे। इन सभी शब्दोंसे गूँजता हुआ पर्वत परम मनोहर जान पड़ता था ॥ १०१/२ ॥
विपणापणवान् रम्यो भक्ष्यभोज्यविहारवान् ॥ ११ ॥
वस्त्रमाल्योत्करयुतो वीणावेणुमृदङ्गवान् ।
सुरामैरेयमिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह ॥ १२ ॥
दीनान्धकृपणादिभ्यो दीयमानेन चानिशम् ।
बभौ परमकल्याणो महस्तस्य महागिरेः ॥ १३ ॥
उस महान् पर्वतपर होनेवाला वह महोत्सव परम मंगलमय प्रतीत होता था। वहाँ दूकानें और बाजार लगी थीं। भक्ष्य-भोज्य पदार्थ यथेष्ट रूपसे प्राप्त होते थे। सब ओर घूमने-फिरनेकी सुविधा थी। वस्त्रों और मालाओंके ढेर लगे थे। वीणा, वेणु और मृदंग बज रहे थे। इन सबके कारण वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँ दीनों, अन्धों और अनाथोंके लिये निरन्तर सुरा-मैरेयमिश्रित भक्ष्य-भोज्य पदार्थ दिये जाते थे ॥ ११—१३ ॥
पुण्यावसथवान् वीर पुण्यकृद्भिर्निषेवितः ।
विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतकस्य ह ॥ १४ ॥
स नगो वेश्मसंकीर्णो देवलोक इवाबभौ । वीरवर! उस पर्वतपर पुण्यानुष्ठानके लिये बहुत-से गृह और आश्रम बने थे, जिनमें पुण्यात्मा पुरुष निवास करते थे। रैवतक पर्वतके उस महोत्सवमें वृष्णिवंशी वीरोंका विहार-स्थल बना हुआ था। वह गिरिप्रदेश बहुसंख्यक गृहोंसे व्याप्त होनेके कारण देवलोकके समान शोभा पाता था ।। १४ १/२ ।। तदा च कृष्णसांनिध्यमासाद्य भरतर्षभ ।। १५ ।। (स्तुवन्त्यन्तर्हिता देवा गन्धर्वाश्च सहर्षिभिः । भरतश्रेष्ठ! उस समय देवता, गन्धर्व और ऋषि अदृश्यरूपसे श्रीकृष्णके निकट आकर उनकी स्तुति करने लगे ।। १५ ।।
देवगन्धर्वा ऊचुः
साधकः सर्वधर्माणामसुराणां विनाशकः । त्वं स्रष्टा सृज्यमाधारं कारणं धर्मवेदवित् ।। त्वया यत् क्रियते देव न जानीमोऽत्र मायया । केवलं त्वाभिजानीमः शरणं परमेश्वरम् ।। ब्रह्मादीनां च गोविन्द सांनिध्यं शरणं नमः ।। देवता और गन्धर्व बोले— भगवन्! आप समस्त धर्मोंके साधक और असुरोंके विनाशक हैं। आप ही स्रष्टा, आप ही सृज्य जगत् और आप ही उसके आधार हैं। आप ही सबके कारण तथा धर्म और वेदके ज्ञाता हैं। देव! आप अपनी मायासे जो कुछ करते हैं, हमलोग उसे नहीं जान पाते हैं। हम केवल आपको जानते हैं। आप ही सबके शरणदाता और परमेश्वर हैं। गोविन्द! आप ब्रह्मा आदिको भी सामीप्य और शरण प्रदान करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ।।
वैशम्पायन उवाच
इति स्तुतेऽमानुषैश्च पूजिते देवकीसुते ।) शक्रसद्मप्रतीकाशो बभूव स हि शैलराट् । वैशम्पायनजी कहते हैं— इस प्रकार मानवेतर प्राणियों—देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा जब देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा की जा रही थी, उस समय वह पर्वतराज रैवतक इन्द्रभवनके समान जान पड़ता था ।। १५ १/२ ।। ततः सम्पूज्यमानः स विवेश भवनं शुभम् ।। १६ ।। गोविन्दः सात्यकिश्चैव जगाम भवनं स्वकम् । तदनन्तर सबसे सम्मानित हो भगवान् श्रीकृष्णने अपने सुन्दर भवनमें प्रवेश किया और सात्यकि भी अपने घरमें गये ।। १६ १/२ ।। विवेश च प्रहृष्टात्मा चिरकालप्रवासतः ।। १७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1883)
कृत्वा नसुकरं कर्म दानवेष्विव वासवः ।
जैसे इन्द्र दानवोंपर महान् पराक्रम प्रकट करके आये हों, उसी प्रकार दुष्कर कर्म करके दीर्घकालके प्रवाससे प्रसन्नचित्त होकर लौटे हुए भगवान् श्रीकृष्णने अपने भवनमें प्रवेश किया ।। १७ १/२ ।।
भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता-माता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं
उपायान्तं तु वार्ष्णेयं भोजवृष्ण्यन्धकास्तथा ।। १८ ।।
अभ्यगच्छन् महात्मानं देवा इव शतक्रतुम् ।
जैसे देवता देवराज इन्द्रकी अगवानी करते हैं, उसी प्रकार भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके यादवोंने अपने निकट आते हुए महात्मा श्रीकृष्णका आगे बढ़कर स्वागत किया ।। १८ १/२ ।।
स तानभ्यर्च्य मेधावी पृष्ट्वा च कुशलं तदा ।
अभ्यवादयत प्रीतः पितरं मातरं तदा ।। १९ ।।
मेधावी श्रीकृष्णने उन सबका आदर करके उनका कुशल-समाचार पूछा और प्रसन्नतापूर्वक अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ १९ ॥ ताभ्यां स सम्परिष्वक्तः सान्त्वितश्च महाभुजः। उपोपविष्टैः सर्वैस्तैर्वृष्णिभिः परिवारितः ॥ २० ॥ उन दोनोंने उन महाबाहु श्रीकृष्णको अपनी छातीसे लगा लिया और मीठे वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना दी। इसके बाद सभी वृष्णिवंशी उनको घेरकर आस-पास बैठ गये ॥ २१ ॥ स विश्रान्तो महातेजाः कृतपादावनेजनः। कथयामास तत्सर्वं पृष्टः पित्रा महाहवम् ॥ २१ ॥ महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब हाथ-पैर धोकर विश्राम कर चुके, तब पिताके पूछनेपर उन्होंने उस महायुद्धकी सारी घटना कह सुनायी ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णस्य द्वारकाप्रवेशे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाप्रवेशविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1885)
षष्टितमोऽध्यायः
वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना
वसुदेव उवाच
श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय संग्रामं परमाद्भुतम् ।
नराणां वदतां तत्र कथं वा तेषु नित्यशः ॥ १ ॥
**वसुदेवजीने पूछा—**वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत-युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ? ॥ १ ॥
त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्च महाभुज ।
तस्मात् प्रब्रूहि संग्रामं याथातथ्येन मेऽनघ ॥ २ ॥
महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते हो; अतः अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो ॥ २ ॥
यथा तदभवद् युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् ।
भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम् ॥ ३ ॥
महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ? ॥ ३ ॥
अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकशः ।
नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम् ॥ ४ ॥
दूसरे-दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति-भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था? ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षः पित्रा मातुस्तदन्तिके ।
शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे ॥ ५ ॥
वासुदेव उवाच
अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
बहुलत्वान्न संख्यातुं शक्यान्यब्दशतैरपि ॥ ६ ॥ श्रीकृष्णने कहा— पिताजी! महाभारत-युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अद्भुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोंमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु । कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ॥ ७ ॥ अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य-मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये ॥ ७ ॥ भीष्मः सेनापतिर्भूदेकादशचमूपतिः । कौरव्यः कौरवेन्द्राणां देवानाामिव वासवः ॥ ८ ॥ जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे। वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे ॥ ८ ॥ शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपतिः । बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना ॥ ९ ॥ पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे। बुद्धिमान् शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे ॥ ९ ॥ तेषां तदभवद् युद्धं दशाहानि महात्मनाम् । कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम् ॥ १० ॥ उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ ॥ १० ॥ ततः शिखण्डी गाङ्गेयं युध्यमानं महाहवे । जघान बहुभिर्बाणैः सह गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥ फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गंगानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया ॥ ११ ॥ अकरोत् स ततः कालं शरतल्पगतो मुनिः । अयनं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये। जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं। दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है ॥ १२ ॥ ततः सेनापतिर्भूद् द्रोणोऽस्त्रविदुषां वरः । प्रवीरः कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव ॥ १३ ॥ तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये। वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिकी सेनाके प्रधान संरक्षक