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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्गति

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्गति

भीष्म उवाच

नहुषस्तु ततः श्रुत्वा च्यवनं तं तथागतम् ।
त्वरितः प्रययौ तत्र सहामात्यपुरोहितः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भरतनन्दन! च्यवनमुनिको ऐसी अवस्थामें अपने नगरके निकट आया जान राजा नहुष अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको साथ ले शीघ्र वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
शौचं कृत्वा यथान्यायं प्राञ्जलिः प्रयतो नृपः ।
आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय महात्मने ॥ २ ॥
उन्होंने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर मनको एकाग्र रखते हुए न्यायोचित रीतिसे महात्मा च्यवनको अपना परिचय दिया ॥ २ ॥
अर्चयामास तं चापि तस्य राज्ञः पुरोहितः ।
सत्यव्रतं महात्मानं देवकल्पं विशाम्पते ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! राजाके पुरोहितने देवताओंके समान तेजस्वी सत्यव्रती महात्मा च्यवनमुनिका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ३ ॥

नहुष उवाच

करवाणि प्रियं किं ते तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम ।
सर्वं कर्तास्मि भगवन् यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ ४ ॥
**तत्पश्चात् राजा नहुष बोले—**द्विजश्रेष्ठ! बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? भगवन्! आपकी आज्ञासे कितना ही कठिन कार्य क्यों न हो, मैं सब पूरा करूँगा ॥ ४ ॥

च्यवन उवाच

श्रमेण महता युक्ताः कैवर्ता मत्स्यजीविनः ।
मम मूल्यं प्रयच्छैभ्यो मत्स्यानां विक्रयैः सह ॥ ५ ॥
**च्यवनने कहा—**राजन्! मछलियोंसे जीविका चलानेवाले इन मल्लाहोंने आज बड़े परिश्रमसे मुझे अपने जालमें फँसाकर निकाला है; अतः आप इन्हें इन मछलियोंके साथ-साथ मेरा भी मूल्य चुका दीजिये ॥ ५ ॥

नहुष उवाच

सहस्रं दीयतां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित ।
निष्क्रयार्थे भगवतो यथाऽऽह भृगुनन्दनः ॥ ६ ॥
तब नहुषने अपने पुरोहितसे कहा— पुरोहितजी! भृगुनन्दन च्यवनजी जैसी आज्ञा दे रहे हैं, उसके अनुसार इन पूज्यपाद महर्षिके मूल्यके रूपमें मल्लाहोंको एक हजार अशर्फियाँ दे दीजिये ॥ ६ ॥

च्यवन उवाच

सहस्रं नाहमर्हामि किं वा त्वं मन्यसे नृप ।
सदृशं दीयतां मूल्यं स्वबुद्ध्या निश्चयं कुरु ॥ ७ ॥
**च्यवनने कहा—**नरेश्वर! मैं एक हजार मुद्राओंपर बेचने योग्य नहीं हूँ। क्या आप मेरा इतना ही मूल्य समझते हैं, मेरे योग्य मूल्य दीजिये और वह मूल्य कितना होना चाहिये—यह अपनी ही बुद्धिसे विचार करके निश्चित कीजिये ॥ ७ ॥

नहुष उवाच

सहस्राणां शतं विप्र निषादेभ्यः प्रदीयताम् ।
स्यादिदं भगवन् मूल्यं किं वान्यन्मन्यते भवान् ॥ ८ ॥
**नहुष बोले—**विप्रवर! इन निषादोंको एक लाख मुद्रा दीजिये। (यों पुरोहितको आज्ञा देकर वे मुनिसे बोले—) भगवन्! क्या यह आपका उचित मूल्य हो सकता है या अभी आप कुछ और देना चाहते हैं? ॥

च्यवन उवाच

नाहं शतसहस्रेण निमेयः पार्थिवर्षभ ।
दीयतां सदृशं मूल्यममात्यैः सह चिन्तय ॥ ९ ॥
**च्यवनने कहा—**नृपश्रेष्ठ! मुझे एक लाख रुपयेके मूल्यमें ही सीमित न कीजिये। उचित मूल्य चुकाइये। इस विषयमें अपने मन्त्रियोंके साथ विचार कीजिये ॥ ९ ॥

नहुष उवाच

कोटिः प्रदीयतां मूल्यं निषादेभ्यः पुरोहित ।
यदेतदपि नो मूल्यमतो भूयः प्रदीयताम् ॥ १० ॥
**नहुषने कहा—**पुरोहितजी! आप इन निषादोंको एक करोड़ मुद्रा मूल्यके रूपमें दीजिये और यदि यह भी ठीक मूल्य न हो तो और अधिक दीजिये ॥ १० ॥

च्यवन उवाच

राजन् नार्हाम्यहं कोटिं भूयो वापि महाद्युते ।
सदृशं दीयतां मूल्यं ब्राह्मणैः सह चिन्तय ॥ ११ ॥

**च्यवनने कहा—**महातेजस्वी नरेश। मैं एक करोड़ या उससे भी अधिक मुद्राओंमें बेचने योग्य नहीं हूँ। जो मेरे लिये उचित हो वही मूल्य दीजिये और इस विषयमें ब्राह्मणोंके साथ विचार कीजिये ॥ ११ ॥

नहुष उवाच

अर्धं राज्यं समग्रं वा निषादेभ्यः प्रदीयताम् ।
एतन्मूल्यमहं मन्ये किं वान्यन्मन्यसे द्विज ॥ १२ ॥
**नहुष बोले—**ब्रह्मन्! यदि ऐसी बात है तो इन मल्लाहोंको मेरा आधा या सारा राज्य दे दिया जाय। इसे ही मैं आपके लिये उचित मूल्य मानता हूँ। आप इसके अतिरिक्त और क्या चाहते हैं? ॥ १२ ॥

च्यवन उवाच

अर्धं राज्यं समग्रं च मूल्यं नार्हामि पार्थिव ।
सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभिः सह चिन्त्यताम् ॥ १३ ॥
**च्यवनने कहा—**पृथ्वीनाथ! आपका आधा या सारा राज्य भी मेरा उचित मूल्य नहीं है। आप उचित मूल्य दीजिये और वह मूल्य आपके ध्यानमें न आता हो तो ऋषियोंके साथ विचार कीजिये ॥ १३ ॥

भीष्म उवाच

महर्षेर्वचनं श्रुत्वा नहुषो दुःखकर्शितः ।
स चिन्तयामास तदा सहामात्यपुरोहितः ॥ १४ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! महर्षिका यह वचन सुनकर राजा नहुष दुःखसे कातर हो उठे और मन्त्री तथा पुरोहितके साथ इस विषयमें विचार करने लगे ॥ १४ ॥
तत्र त्वन्यो वनचरः कश्चिन्मूलफलाशनः ।
नहुषस्य समीपस्थो गविजातोऽभवन्मुनिः ॥ १५ ॥
स तमाभाष्य राजानमब्रवीद् द्विजसत्तमः ।
इतनेहीमें फल-मूलका भोजन करनेवाले एक दूसरे वनवासी मुनि, जिनका जन्म गायके पेटसे हुआ था, राजा नहुषके समीप आये और वे द्विजश्रेष्ठ उन्हें सम्बोधित करके कहने लगे— ॥ १५ १/२ ॥
तोषयिष्याम्यहं क्षिप्रं यथा तुष्टो भविष्यति ॥ १६ ॥
नाहं मिथ्यावचो ब्रूयां स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
भवतो यदहं ब्रूयां तत्कार्यमविशंकया ॥ १७ ॥
‘राजन्! ये मुनि कैसे संतुष्ट होंगे—इस बातको मैं जानता हूँ। मैं इन्हें शीघ्र संतुष्ट कर दूँगा। मैंने कभी हँसी-परिहासमें भी झूठ नहीं कहा है; फिर ऐसे समयमें असत्य कैसे बोल

सकता हूँ? मैं आपसे जो कहूँ, वह आपको निःशंक होकर करना चाहिये' ।। १६-१७ ।।

नहुष उवाच

ब्रवीतु भगवान् मूल्यं महर्षेः सदृशं भृगोः ।
परित्रायस्व मामस्मद्विषयं च कुलं च मे ।। १८ ।।

नहुषने कहा— भगवन्! आप मुझे भृगुपुत्र महर्षि च्यवनका मूल्य, जो इनके योग्य हो बता दीजिये और ऐसा करके मेरा, मेरे कुलका तथा समस्त राज्यका संकटसे उद्धार कीजिये ।। १८ ।।

हन्याद्धि भगवान् क्रुद्धस्त्रैलोक्यमपि केवलम् ।
किं पुनर्मां तपोहीनं बाहुवीर्यपरायणम् ।। १९ ।।

ये भगवान् च्यवन मुनि यदि कुपित हो जायँ तो तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं; फिर मुझ-जैसे तपोबलशून्य केवल बाहुबलका भरोसा रखनेवाले नरेशको नष्ट करना इनके लिये कौन बड़ी बात है? ।।

अगाधाम्भसि मग्नस्य सामात्यस्य सऋत्विजः ।
प्लवो भव महर्षे त्वं कुरु मूल्यविनिश्चयम् ।। २० ।।

महर्षे! मैं अपने मन्त्री और पुरोहितके साथ संकटके अगाध महासागरमें डूब रहा हूँ। आप नौका बनकर मुझे पार लगाइये। इनके योग्य मूल्यका निर्णय कर दीजिये ।। २० ।।

भीष्म उवाच

नहुषस्य वचः श्रुत्वा गविजातः प्रतापवान् ।
उवाच हर्षयन् सर्वानमात्यान् पार्थिवं च तम् ।। २१ ।।

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! नहुषकी बात सुनकर गायके पेटसे उत्पन्न हुए वे प्रतापी महर्षि राजा तथा उनके समस्त मन्त्रियोंको आनन्दित करते हुए बोले— ।। २१ ।।

(ब्राह्मणानां गवां चैव कुलमेकं द्विधा कृतम् ।
एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्यत्र तिष्ठति ।।)
अनर्घेया महाराज द्विजा वर्णेषु चोत्तमाः ।
गावश्च पुरुषव्याघ्र गौर्मूल्यं परिकल्प्यताम् ।। २२ ।।

'महाराज! ब्राह्मणों और गौओंका कुल एक है, पर ये दो रूपोंमें विभक्त हो गये हैं। एक जगह मन्त्र स्थित होते हैं और दूसरी जगह हविष्य। पुरुषसिंह! ब्राह्मण सब वर्णोंमें उत्तम हैं। उनका और गौओंका कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता; इसलिये आप इनकी कीमतमें एक गौ प्रदान कीजिये' ।। २२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 516)

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महर्षि च्यवनका मूल्याङ्कन

नहुषस्तु ततः श्रुत्वा महर्षेर्वचनं नृप ।
हर्षेण महता युक्तः सहामात्यपुरोहितः ॥ २३ ॥
'नरेश्वर! महर्षिका यह वचन सुनकर मन्त्री और पुरोहितसहित राजा नहुषको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २३ ॥

अभिगम्य भृगोः पुत्रं च्यवनं संशितव्रतम् ।
इदं प्रोवाच नृपते वाचा संतर्पयन्निव ॥ २४ ॥
राजन्! वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले भृगुपुत्र महर्षि च्यवनके पास जाकर उन्हें अपनी वाणीद्वारा तृप्त करते हुए-से बोले ॥ २४ ॥

नहुष उवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ विप्रर्षे गवा क्रीतोऽसि भार्गव ।
एतन्मूल्यमहं मन्ये तव धर्मभृतां वर ॥ २५ ॥
नहुषने कहा— धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! भृगुनन्दन! मैंने एक गौ देकर आपको खरीद लिया; अतः उठिये, उठिये, मैं यही आपका उचित मूल्य मानता हूँ ॥ २५ ॥

च्यवन उवाच

उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक् क्रीतोऽस्मि तेऽनघ।
गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किंचिदिहाच्युत॥ २६॥
च्यवनने कहा— निष्पाप राजेन्द्र! अब मैं उठता हूँ। आपने उचित मूल्य देकर मुझे खरीदा है। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! मैं इस संसारमें गौओंके समान दूसरा कोई धन नहीं देखता हूँ॥ २६॥

कीर्तनं श्रवणं दानं दर्शनं चापि पार्थिव।
गवां प्रशस्यते वीर सर्वपापहरं शिवम्॥ २७॥
वीर भूपाल! गौओंके नाम और गुणोंका कीर्तन तथा श्रवण करना, गौओंका दान देना और उनका दर्शन करना—इनकी शास्त्रोंमें बड़ी प्रशंसा की गयी है। ये सब कार्य सम्पूर्ण पापोंको दूर करके परम कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले हैं॥ २७॥

गावो लक्ष्म्याः सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते।
अन्नमेव सदा गावो देवानां परमं हविः॥ २८॥
गौएँ सदा लक्ष्मीकी जड़ हैं। उनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। गौएँ ही मनुष्योंको सर्वदा अन्न और देवताओंको हविष्य देनेवाली हैं॥ २८॥

स्वाहाकारवषट्कारौ गोषु नित्यं प्रतिष्ठितौ।
गावो यज्ञस्य नेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम्॥ २९॥
स्वाहा और वषट्कार सदा गौओंमें ही प्रतिष्ठित होते हैं। गौएँ ही यज्ञका संचालन करनेवाली तथा उसका मुख हैं॥ २९॥

अमृतं ह्यव्ययं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च।
अमृतायतनं चैताः सर्वलोकनमस्र्कृताः॥ ३०॥
वे विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती और दुहनेपर अमृत ही देती हैं। वे अमृतकी आधारभूत हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है॥ ३०॥

तेजसा वपुषा चैव गावो वह्निसमा भुवि।
गावो हि सुमहत् तेजः प्राणिनां च सुखप्रदाः॥ ३१॥
इस पृथ्वीपर गौएँ अपनी काया और कान्तिसे अग्निके समान हैं। वे महान् तेजकी राशि और समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाली हैं॥ ३१॥

निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुञ्चति निर्भयम्।
विराजयति तं देशं पापं चास्यापकर्षति॥ ३२॥
गौओंका समुदाय जहाँ बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थानकी शोभा बढ़ा देता है और वहाँके सारे पापोंको खींच लेता है॥ ३२॥

गावः स्वर्गस्य सोपानं गावः स्वर्गेऽपि पूजिताः।
गावः कामदुहो देव्यो नान्यत् किंचित् परं स्मृतम्॥ ३३॥

गौएँ स्वर्गकी सीढ़ी हैं। गौएँ स्वर्गमें भी पूजी जाती हैं। गौएँ समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली देवियाँ हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है॥ ३३॥

इत्येतद् गोषु मे प्रोक्तं माहात्म्यं भरतर्षभ।
गुणैकदेशवचनं शक्यं पारायणं न तु॥ ३४॥
भरतश्रेष्ठ! यह मैंने गौओंका माहात्म्य बताया है। इसमें उनके गुणोंका दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। गौओंके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता॥

निषादा ऊचुः

दर्शनं कथनं चैव सहास्माभिः कृतं मुने।
सतां साप्तपदं मैत्रं प्रसादं नः कुरु प्रभो॥ ३५॥
इसके बाद निषादोंने कहा— मुने! सज्जनोंके साथ सात पग चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। हमने तो आपका दर्शन किया और हमारे साथ आपकी इतनी देरतक बातचीत भी हुई; अतः प्रभो! आप हमलोगोंपर कृपा कीजिये॥ ३५॥
हवींषि सर्वाणि यथा ह्युपभुङ्क्ते हुताशनः।
एवं त्वमपि धर्मात्मन् पुरुषाग्निः प्रतापवान्॥ ३६॥
धर्मात्मन्! जैसे अग्निदेव सम्पूर्ण हविष्योंको आत्मसात् कर लेते हैं, उसी प्रकार आप भी हमारे दोष-दुर्गुणोंको दग्ध करनेवाले प्रतापी अग्निरूप हैं॥ ३६॥
प्रसादयामहे विद्वन् भवन्तं प्रणता वयम्।
अनुग्रहार्थमस्माकमियं गौः प्रतिगृह्यताम्॥ ३७॥
विद्वन्! हम आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। आप हमलोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये हमारी दी हुई यह गौ स्वीकार कीजिये॥ ३७॥
(अत्यन्तापदि मग्नानां परित्राणं हि कुर्वताम्।
या गतिर्विदिता त्वद्य नरके शरणं भवान्॥)
अत्यन्त आपत्तिमें डूबे हुए जीवोंका उद्धार करनेवाले पुरुषोंको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आपको विदित है। हमलोग नरकमें डूबे हुए हैं। आज आप ही हमें शरण देनेवाले हैं॥

च्यवन उवाच

कृपणस्य च यच्चक्षुर्मुनेराशीविषस्य च।
नरं समूलं दहति कक्षमग्निरिव ज्वलन्॥ ३८॥
च्यवन बोले— निषादगण! किसी दीन-दुखियाकी, ऋषिकी तथा विषधर सर्पकी रोषपूर्ण दृष्टि मनुष्यको उसी प्रकार जड़मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखे घास-फूसके ढेरको॥ ३८॥
प्रतिगृह्णामि वो धेनुं कैवर्ता मुक्तकिल्बिषाः।

दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यैः सह जलोद्भवैः ॥ ३९ ॥ मल्लाहो! मैं तुम्हारी दी हुई गौ स्वीकार करता हूँ। इस गोदानके प्रभावसे तुम्हारे सारे पाप दूर हो गये। अब तुमलोग जलमें पैदा हुई इन मछलियोंके साथ ही शीघ्र स्वर्गको जाओ ॥ ३९ ॥

भीष्म उवाच

ततस्तस्य प्रभावात् ते महर्षेर्भावितात्मनः । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययुः ॥ ४० ॥ भीष्मजी कहते हैं—भारत! तदनन्तर विशुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षि च्यवनके पूर्वोक्त बात कहते ही उनके प्रभावसे वे मल्लाह उन मछलियोंके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४० ॥

ततः स राजा नहुषो विस्मितः प्रेक्ष्य धीवरान् । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांश्च भरतर्षभ ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय उन मल्लाहों और मत्स्योंको भी स्वर्गलोककी ओर जाते देख राजा नहुषको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥

ततस्तौ गविजश्चैव च्यवनश्च भृगूद्वहः । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्नृपम् ॥ ४२ ॥ तत्पश्चात् गौसे उत्पन्न महर्षि और भृगुनन्दन च्यवन दोनोंने राजा नहुषसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥

ततो राजा महावीर्यो नहुषः पृथिवीपतिः । परमित्यब्रवीत् प्रीतस्तदा भरतसत्तम ॥ ४३ ॥ भरतभूषण! तब वे महापराक्रमी भूपाल राजा नहुष प्रसन्न होकर बोले—'बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है' ॥

ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः । तथेति चोदितः प्रीतस्तावृषी प्रत्यपूजयत् ॥ ४४ ॥ फिर दोनोंके आग्रहसे उन इन्द्रके समान तेजस्वी नरेशने धर्ममें स्थित रहनेका वरदान माँगा और उनके तथास्तु कहनेपर राजाने उन दोनों ऋषियोंका विधिवत् पूजन किया ॥ ४४ ॥

समाप्तदीक्षश्च्यवनस्ततोऽगच्छत् स्वमाश्रमम् । गविजश्च महातेजाः स्वमाश्रमपदं ययौ ॥ ४५ ॥ उसी दिन महर्षि च्यवनकी दीक्षा समाप्त हुई और वे अपने आश्रमपर चले गये। इसके बाद महातेजस्वी गोजात मुनि भी अपने आश्रमको पधारे ॥ ४५ ॥

निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप ।

नहुषोऽपि वरं लब्ध्वा प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ ४६ ॥ नरेश्वर! वे मल्लाह और मत्स्य तो स्वर्गलोकमें चले गये और राजा नहुष भी वर पाकर अपनी राजधानीको लौट आये ॥ ४६ ॥ एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । दर्शने यादृशः स्नेहः संवासे वा युधिष्ठिर ॥ ४७ ॥ महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम् । किं भूयः कथ्यतां वीर किं ते हृदि विवक्षितम् ॥ ४८ ॥ तात युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह सारा प्रसंग सुनाया है। दर्शन और सहवाससे कैसा स्नेह होता है? गौओंका माहात्म्य क्या है? तथा इस विषयमें धर्मका निश्चय क्या है? ये सारी बातें इस प्रसंगसे स्पष्ट हो जाती हैं। अब मैं तुम्हें कौन-सी बात बताऊँ? वीर! तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है? ॥ ४७-४८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनका उपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 521)

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा

युधिष्ठिर उवाच

संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान् सागरोपमः ।
तं मे शृणु महाबाहो श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—महाबाहो! मेरे मनमें एक महासागरके समान महान् संदेह हो गया है। महाप्राज्ञ! उसे सुनिये और सुनकर उसकी व्याख्या कीजिये ॥ १ ॥

कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो ।
रामं धर्मभृतां श्रेष्ठं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
प्रभो! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजीके विषयमें मेरा कौतूहल बढ़ा हुआ है; अतः आप मेरे प्रश्नका विशद विवेचन कीजिये ॥ २ ॥

कथमेष समुत्पन्नो रामः सत्यपराक्रमः ।
कथं ब्रह्मर्षिवंशोऽयं क्षत्रधर्मा व्यजायत ॥ ३ ॥
ये सत्यपराक्रमी परशुरामजी कैसे उत्पन्न हुए? ब्रह्मर्षियोंका यह वंश क्षत्रियधर्मसे सम्पन्न कैसे हो गया? ॥ ३ ॥

तदस्य सम्भवं राजन् निखिलेनानुकीर्तय ।
कौशिकाच्च कथं वंशात् क्षत्राद् वै ब्राह्मणो भवेत् ॥ ४ ॥
अतः राजन्! आप परशुरामजीकी उत्पत्तिका प्रसंग पूर्णरूपसे बताइये। राजा कुशिकका वंश तो क्षत्रिय था, उससे ब्राह्मण जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ॥ ४ ॥

अहो प्रभावः सुमहानासीद् वै सुमहात्मनः ।
रामस्य च नरव्याघ्र विश्वामित्रस्य चैव हि ॥ ५ ॥
पुरुषसिंह! महात्मा परशुराम और विश्वामित्रका महान् प्रभाव अद्भुत था ॥ ५ ॥

कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्वथाभवत् ।
एष दोषः सुतान् हित्वा तत्त्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥
राजा कुशिक और महर्षि ऋचीक—ये ही अपने-अपने वंशके प्रवर्तक थे। उनके पुत्र गाधि और जमदग्निको लाँघकर उनके पौत्र विश्वामित्र और परशुराममें ही यह विजातीयताका दोष क्यों आया? इसमें जो यथार्थ कारण हो, उसकी व्याख्या कीजिये ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत ॥ ७ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भारत! इस विषयमें महर्षि च्यवन और राजा कुशिकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ७ ॥

एतं दोषं पुरा दृष्ट्वा भार्गवश्च्यवनस्तदा । आगामिनं महाबुद्धिः स्ववंशे मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥ निश्चित्य मनसा सर्वं गुणदोषबलाबलम् । दग्धुकामः कुलं सर्वं कुशिकानां तपोधनः ॥ ९ ॥ च्यवनः समनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमब्रवीत् । वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वया सह ममानघ ॥ १० ॥ पूर्वकालमें भृगुपुत्र च्यवनको यह बात मालूम हुई कि हमारे वंशमें कुशिक-वंशकी कन्याके सम्बन्धसे क्षत्रियत्वका महान् दोष आनेवाला है। यह जानकर उन परम बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठने मन-ही-मन सारे गुण-दोष और बलाबलका विचार किया। तत्पश्चात् कुशिकोंके समस्त कुलको भस्म कर डालनेकी इच्छासे तपोधन च्यवन राजा कुशिकके पास गये और इस प्रकार बोले—‘निष्पाप नरेश! मेरे मनमें कुछ कालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा हुई है’ ॥ ८—१० ॥

कुशिक उवाच भगवन् सहधर्मोऽयं पण्डितैरिह धार्यते । प्रदानकाले कन्यानामुच्यते च सदा बुधैः ॥ ११ ॥ **कुशिकने कहा—**भगवन्! यह अतिथिसेवारूप सहधर्म विद्वान् पुरुष यहाँ सदा धारण करते हैं और कन्याओंके प्रदानकाल अर्थात् कन्याके विवाहके समयमें सदा पण्डितजन इसका उपदेश देते हैं ॥ ११ ॥

यत्त तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन । तत्कार्यं प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १२ ॥ तपोधन! अबतक तो इस धर्मके मार्गका पालन नहीं हुआ और समय निकल गया, परंतु अब आपके सहयोग और कृपासे इसका पालन करूँगा। अतः आप मुझे आज्ञा प्रदान करें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥

भीष्म उवाच अथासनमुपादाय च्यवनस्य महामुनेः । कुशिको भार्यया सार्धमाजगाम यतो मुनिः ॥ १३ ॥ इतना कहकर राजा कुशिकने महामुनि च्यवनको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे मुनि विराजमान थे ॥

प्रगृह्य राजा भृंगारं पाद्यमस्मै न्यवेदयत् । कारयामास सर्वांश्च क्रियास्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥ राजाने स्वयं गडुआ हाथमें लेकर मुनिको पैर धोनेके लिये जल निवेदन किया। इसके बाद उन महात्माको अर्घ्य आदि देनेकी सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करायीं ॥ १४ ॥

ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि । ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रतः ॥ १५ ॥ इसके बाद नियमतः व्रत पालन करनेवाले महामनस्वी राजा कुशिकने शान्तभावसे च्यवन मुनिको विधिपूर्वक मधुपर्क भोजन कराया ॥ १५ ॥

सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् । भगवन् परवन्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे ॥ १६ ॥ इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिका यथावत् सत्कार करके वे फिर उनसे बोले—‘भगवन्! हम दोनों पति-पत्नी आपके अधीन हैं। बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें ॥ १६ ॥

यदि राज्यं यदि धनं यदि गाः संशितव्रत । यज्ञदानानि च तथा ब्रूहि सर्वं ददामि ते ॥ १७ ॥ इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते । राजा त्वमसि शाध्युर्वीमहं तु परवांस्त्वयि ॥ १८ ॥ ‘कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! यदि आप राज्य, धन, गौ एवं यज्ञके निमित्त दान लेना चाहते हों तो बतावें। वह सब मैं आपको दे सकता हूँ। यह राजभवन, यह राज्य और यह धर्मानुकूल राज्यसिंहासन—सब आपका है। आप ही राजा हैं, इस पृथ्वीका पालन कीजिये। मैं तो सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ' ॥ १७-१८ ॥

एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा । कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमया युतः ॥ १९ ॥ उनके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और कुशिकसे इस प्रकार बोले— ॥

न राज्यं कामये राजन् न धनं न च योषितः । न च गा न च वै देशान् न यज्ञं श्रूयतामिदम् ॥ २० ॥ ‘राजन्! न मैं राज्य चाहता हूँ न धन। न युवतियोंकी इच्छा रखता हूँ न गौओं, देशों और यज्ञकी ही। आप मेरी यह बात सुनिये ॥ २० ॥

नियमं किंचिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते । परिचर्योऽस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कया ॥ २१ ॥ ‘यदि आपलोगोंको जँचे तो मैं एक नियम आरम्भ करूँगा। उसमें आप दोनों पति-पत्नीको सर्वथा सावधान रहकर बिना किसी हिचकके मेरी सेवा करनी होगी' ॥ २१ ॥

एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतुः ।

प्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ॥ २२ ॥ मुनिकी यह बात सुनकर राजदम्पतिको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! उन दोनोंने उन्हें उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा, हम आपकी सेवा करेंगे' ॥ २२ ॥ अथ तं कुशिको हृष्टः प्रावेशयदनुत्तमम् । गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत् ॥ २३ ॥ तदनन्तर राजा कुशिक महर्षि च्यवनको बड़े आनन्दके साथ अपने सुन्दर महलके भीतर ले गये। वहाँ उन्होंने मुनिको एक सजा-सजाया कमरा दिखाया, जो देखने योग्य था ॥ २३ ॥ इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् । प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ॥ २४ ॥ उस घरको दिखाकर वे बोले—'तपोधन! यह आपके लिये शय्या बिछी हुई है। आप इच्छानुसार यहाँ आराम कीजिये। हमलोग आपको प्रसन्न रखनेका प्रयत्न करेंगे' ॥ २४ ॥ अथ सूर्योऽतिचक्राम तेषां संवदतां तथा । अथर्षिश्चोदयामास पानमन्नं तथैव च ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनमें बातें होते-होते सूर्यास्त हो गया। तब महर्षिने राजाको अन्न और जल ले आनेकी आज्ञा दी ॥ २५ ॥ तमपृच्छत् ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा । किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम् ॥ २६ ॥ उस समय राजा कुशिकने उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा—'महर्षे! आपको कौन-सा भोजन अभीष्ट है? आपकी सेवामें क्या-क्या सामान लाऊँ?' ॥ २६ ॥ ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् । औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत ॥ २७ ॥ भरतनन्दन! यह सुनकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ राजासे बोले—'तुम्हारे यहाँ जो भोजन तैयार हो, वही ला दो' ॥ २७ ॥ तद्वचः पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः । यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप ॥ २८ ॥ नरेश्वर! राजा मुनिके उस कथनका आदर करते हुए 'जो आज्ञा' कहकर गये और जो भोजन तैयार था, उसे लाकर उन्होंने मुनिके सामने प्रस्तुत कर दिया ॥ २८ ॥ ततः स भुक्त्वा भगवान् दम्पती प्राह धर्मवित् । स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो ॥ २९ ॥ प्रभो! तदनन्तर भोजन करके धर्मज्ञ भगवान् च्यवनने राजदम्पत्तिसे कहा—'अब मैं सोना चाहता हूँ, मुझे नींद सता रही है' ॥ २९ ॥ ततः शय्यागृहं प्राप्य भगवानृषिसत्तमः ।

संविवेश नरेशस्तु सपत्नीकः स्थितोऽभवत् ॥ ३० ॥ इसके बाद मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन शयनागारमें जाकर सो गये और पत्नीसहित राजा कुशिक उनकी सेवामें खड़े रहे ॥ ३० ॥ न प्रबोध्योऽस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवः । संवाहयितव्यौ मे पादौ जागृतव्यं च तेऽनिशम् ॥ ३१ ॥ उस समय भृगुपुत्रने उन दोनोंसे कहा—'तुमलोग सोते समय मुझे जगाना मत। मेरे दोनों पैर दबाते रहना और स्वयं भी निरन्तर जागते रहना' ॥ ३१ ॥ अविशङ्कस्तु कुशिकस्तथेत्येवाह धर्मवित् । न प्रबोधयतां तौ च दम्पती रजनीक्षये ॥ ३२ ॥ धर्मज्ञ राज कुशिकने निःशंक होकर कहा, 'बहुत अच्छा'। रात बीती, सबेरा हुआ, किंतु उन पति-पत्नीने मुनिको जगाया नहीं ॥ ३२ ॥ यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा । बभूवतुर्महाराज प्रयतावथ दम्पती ॥ ३३ ॥ महाराज! वे दोनों दम्पति मन और इन्द्रियोंको वशमें करके महर्षिके आज्ञानुसार उनकी सेवामें लगे रहे ॥ ३३ ॥ ततः स भगवान् विप्रः समादिश्य नराधिपम् । सुष्वापैकेन पार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ॥ ३४ ॥ उधर ब्रह्मर्षि भगवान् च्यवन राजाको सेवाका आदेश देकर इक्कीस दिनोंतक एक ही करवटसे सोते रह गये ॥ ३४ ॥ स तु राजा निराहारः सभार्यः कुरुनन्दन । पर्युपासत तं हृष्टश्च्यवनाराधने रतः ॥ ३५ ॥ कुरुनन्दन! राजा और रानी बिना कुछ खाये-पीये हर्षपूर्वक महर्षिकी उपासना और आराधनामें लगे रहे ॥ भार्गवस्तु समुत्तस्थौ स्वयमेव तपोधनः । अकिंचिदुक्त्वा तु गृहान्निष्चक्राम महातपाः ॥ ३६ ॥ बाईसवें दिन तपस्याके धनी महातपस्वी च्यवन अपने आप उठे और राजासे कुछ कहे बिना ही महलसे बाहर निकल गये ॥ ३६ ॥ तमन्वगच्छतां तौ च क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । भार्यापती मुनिश्रेष्ठस्तावेतौ नावलोकयत् ॥ ३७ ॥ राजा-रानी भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे दुर्बल हो गये थे। तो भी वे मुनिके पीछे-पीछे गये, परंतु उन मुनिश्रेष्ठने इन दोनोंकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं ॥ ३७ ॥

तयोस्तु प्रेक्षतोरेव भार्गवाणां कुलोद्वहः । अन्तर्हितोऽभूद् राजेन्द्र ततो राजापतत् क्षितौ ॥ ३८ ॥ राजेन्द्र! वे भृगुकुलशिरोमणि राजा-रानीके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये। इससे अत्यन्त दुःखी हो राजा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३८ ॥ स मुहूर्तं समाश्वस्य सह देव्या महाद्युतिः । पुनरन्वेषणे यत्नमकरोत् परमं तदा ॥ ३९ ॥ दो घड़ीमें किसी तरह अपनेको सँभालकर वे महातेजस्वी राजा उठे और महारानीको साथ लेकर पुनः मुनिको ढूँढ़नेका महान् प्रयत्न करने लगे ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 527)

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त्रिपञ्चशत्तमोऽध्यायः

च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना

युधिष्ठिर उवाच

तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत् तदा ।
भार्या चास्य महाभागा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! च्यवन मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर राजा कुशिक और उनकी महान् सौभाग्यशालिनी पत्नीने क्या किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया ।
परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— राजन्! पत्नीसहित भूपालने बहुत ढूँढ़नेपर भी जब ऋषिको नहीं देखा तब वे थककर लौट आये। उस समय उन्हें बड़ा संकोच हो रहा था। वे अचेत-से हो गये थे ॥ २ ॥

स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किंचन ।
तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ॥ ३ ॥

वे दीनभावसे पुरीमें प्रवेश करके किसीसे कुछ बोले नहीं। केवल च्यवन मुनिके चरित्रपर मन-ही-मन विचार करने लगे ॥ ३ ॥

अथ शून्येन मनसा प्रविश्य स्वगृहं नृपः ।
ददर्श शयने तस्मिन् शयानं भृगुनन्दनम् ॥ ४ ॥

राजाने सूने मनसे जब घरमें प्रवेश किया तब भृगुनन्दन महर्षि च्यवनको पुनः उसी शय्यापर सोते देखा ॥ ४ ॥

विस्मितौ तमृषिं दृष्ट्वा तदाश्चर्यं विचिन्त्य च ।
दर्शनात् तस्य तु तदा विश्रान्तौ सम्बभूवतुः ॥ ५ ॥

उन महर्षिको देखकर उन दोनोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे उस आश्चर्यजनक घटनापर विचार करके चकित हो गये। मुनिके दर्शनसे उन दोनोंकी सारी थकावट दूर हो गयी ॥ ५ ॥

यथास्थानं च तौ स्थित्वा भूयस्तं संववाहतुः ।
अथापरेण पार्श्वेन सुषवाप स महामुनिः ॥ ६ ॥

वे फिर यथास्थान खड़े होकर मुनिके पैर दबाने लगे। अबकी बार वे महामुनि दूसरी करवटसे सोये थे ।।

तेनैव च स कालेन प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । न च तौ चक्रतुः किंचिद् विकारं भयशङ्कितौ ॥ ७ ॥ शक्तिशाली च्यवन मुनि फिर उतने ही समयमें सोकर उठे। राजा और रानी उनके भयसे शंकित थे, अतः उन्होंने अपने मनमें तनिक भी विकार नहीं आने दिया ।। ७ ।।

प्रतिबुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशाम्पते । तैलाभ्यंगो दीयतां मे स्नास्येऽहमिति भारत ॥ ८ ॥ भारत! प्रजानाथ! जब वे मुनि जागे, तब राजा और रानीसे इस प्रकार बोले—‘तुमलोग मेरे शरीरमें तेलकी मालिश करो; क्योंकि अब मैं स्नान करूँगा' ।। ८ ।।

तौ तथेति प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतुः ॥ ९ ॥ यद्यपि राजा-रानी भूख-प्याससे पीड़ित और अत्यन्त दुर्बल हो गये थे तो भी ‘बहुत अच्छा’ कहकर वे राजदम्पति सौ बार पकाकर तैयार किये हुए बहुमूल्य तेलको लेकर उनकी सेवामें जुट गये ।। ९ ।।

ततः सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतुः । न च पर्याप्तमित्याह भार्गवः सुमहातपाः ॥ १० ॥ ऋषि आनन्दसे बैठ गये और वे दोनों दम्पति मौन हो उनके शरीरमें तेल मलने लगे। परंतु महातपस्वी भृगुपुत्र च्यवनने अपने मुँहसे एक बार भी नहीं कहा कि 'बस, अब रहने दो, तेलकी मालिश पूरी हो गयी' ।। १० ।।

यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षयामास भार्गवः । तत उत्थाय सहसा स्नानशालां विवेश ह ॥ ११ ॥ भृगुपुत्रने इतनेपर भी जब राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा, तब सहसा उठकर वे स्नानागारमें चले गये ।। ११ ।।

क्लृप्तमेव तु तत्रासीत् स्नानीयं पार्थिवोचितम् । असत्कृत्य च तत् सर्वं तत्रैवान्तरधीयत ॥ १२ ॥ स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा । नासूयां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ स्नानके लिये राजोचित सामग्री पहलेसे ही तैयार करके रखी गयी थी; किंतु उस सारी सामग्रीकी अवहेलना करके—उसका किंचित् भी उपयोग न करके वे मुनि पुनः राजाके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये; तो भी उन पति-पत्नीने उनके प्रति दोष-दृष्टि नहीं की ।। १२-१३ ।।

अथ स्नातः सः भगवान् सिंहासनगतः प्रभुः ।

दर्शयामास कुशिकं सभार्यं कुरुनन्दन ।। १४ ।।
कुरुनन्दन! तदनन्तर शक्तिशाली भगवान् च्यवन मुनि पत्नीसहित राजा कुशिकको स्नान करके सिंहासनपर बैठे दिखायी दिये ।। १४ ।।
संहृष्टवदनो राजा सभार्यः कुशिको मुनिम् ।
सिद्धमन्नमिति प्रह्वो निर्विकारो न्यवेदयत् ।। १५ ।।
उन्हें देखते ही पत्नीसहित राजाका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने निर्विकारभावसे मुनिके पास जाकर विनयपूर्वक यह निवेदन किया कि 'भोजन तैयार है' ।। १५ ।।
आनीयतामिति मुनिस्तं चोवाच नराधिपम् ।
स राजा समुपाजह्रे तदन्नं सह भार्यया ।। १६ ।।
तब मुनिने राजासे कहा—'ले आओ।' आज्ञा पाकर पत्नीसहित नरेशने मुनिके सामने भोजन-सामग्री प्रस्तुत की ।। १६ ।।
मांसप्रकारान् विविधान् शाकानि विविधानि च ।
वेसवारविकारांश्च पानकानि लघूनि च ।। १७ ।।
रसालापूपकांश्चित्रान् मोदकानथ खाण्डवान् ।
रसान् नानाप्रकारांश्च वन्यं च मुनिभोजनम् ।। १८ ।।
फलानि च विचित्राणि राजभोज्यानि भूरिशः ।
बदरेङ्गुदकाश्मर्यभल्लातकफलानि च ।। १९ ।।
गृहस्थानां च यद् भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम् ।
सर्वमाहारयामास राजा शापभयात् ततः ।। २० ।।
नाना प्रकारके फलोंके गूदे, भाँति-भाँतिके साग, अनेक प्रकारके व्यंजन, हलके पेय पदार्थ, स्वादिष्ट पूए, विचित्र मोदक (लड्डू), खाँड, नाना प्रकारके रस, मुनियोंके खानेयोग्य जंगली कंद-मूल, विचित्र फल, राजाओंके उपभोगमें आनेवाले अनेक प्रकारके पदार्थ, बेर, इंगुद, काश्मर्य, भल्लातक फल तथा गृहस्थों और वानप्रस्थोंके खाद्य पदार्थ—सब कुछ राजाने शापके डरसे मँगाकर प्रस्तुत कर दिया था ।। १७—२० ।।
अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्च्यवनस्य तत् ।
ततः सर्वं समानीय तच्च शय्यासनं मुनिः ।। २१ ।।
वस्त्रैः शुभैरवच्छाद्य भोजनोपस्करैः सह ।
सर्वमादीपयामास च्यवनो भृगुनन्दनः ।। २२ ।।
यह सब सामग्री च्यवन मुनिके आगे परोसकर रखी गयी। मुनिने वह सब लेकर उसको तथा शय्या और आसनको भी सुन्दर वस्त्रोंसे ढक दिया। इसके बाद भृगुनन्दन च्यवनने भोजन-सामग्रीके साथ उन वस्त्रोंमें भी आग लगा दी ।। २१-२२ ।।
न च तौ चक्रतुः क्रोधं दम्पती सुमहामती ।
तयोः सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितोऽभवत् ।। २३ ।।

परंतु उन परम बुद्धिमान् दम्पतिने उनपर क्रोध नहीं प्रकट किया। उन दोनोंके देखते-ही-देखते वे मुनि फिर अन्तर्धान हो गये ।। २३ ।। तथैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा । सभार्यो वाग्यतः श्रीमान् न च कोपं समाविशत् ।। २४ ।। वे श्रीमान् राजर्षि अपनी स्त्रीके साथ उसी तरह वहाँ रातभर चुपचाप खड़े रह गये; किंतु उनके मनमें क्रोधका आवेश नहीं हुआ ।। २४ ।। नित्यसंस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि । शयनानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ।। २५ ।। प्रतिदिन भाँति-भाँतिका भोजन तैयार करके राजभवनमें मुनिके लिये परोसा जाता, अच्छे-अच्छे पलंग बिछाये जाते तथा स्नानके लिये बहुत-से पात्र रखे जाते थे ।। २५ ।। वस्त्रं च विविधाकारमभवत् समुपार्जितम् । न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ।। २६ ।। पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् । सभार्यो मां रथेनाशु वह यत्र ब्रवीम्यहम् ।। २७ ।। अनेक प्रकारके वस्त्र ला-लाकर उनकी सेवामें समर्पित किये जाते थे। जब ब्रह्मर्षि च्यवन मुनि इन सब कार्योंमें कोई छिद्र न देख सके, तब फिर राजा कुशिकसे बोले—'तुम स्त्रीसहित रथमें जुत जाओ और मैं जहाँ कहूँ, वहाँ मुझे शीघ्र ले चलो' ।। २६-२७ ।। तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम् । क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथः ।। २८ ।। तब राजाने निःशंक होकर उन तपोधनसे कहा—'बहुत अच्छा, भगवन्! क्रीड़ाका रथ तैयार किया जाय या युद्धके उपयोगमें आनेवाला रथ?' ।। २८ ।। इत्युक्तः स मुनी राज्ञा तेन हृष्टेन तद्वचः । च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरंजयम् ।। २९ ।। हर्षमें भरे हुए राजाके इस प्रकार पूछनेपर च्यवनमुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले उन नरेशसे कहा— ।। २९ ।। सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते सांग्रामिको मतः । सायुधः सपताकश्च शक्तीकनकयष्टिमान् ।। ३० ।। 'राजन्! तुम्हारा जो युद्धोपयोगी रथ है, उसीको शीघ्र तैयार करो। उसमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र रखे रहें। पताका, शक्ति और सुवर्णदण्ड विद्यमान हों ।। ३० ।। किङ्किणीस्वननिर्घोषो युक्तस्तोरणकल्पनैः । जाम्बूनदनिबद्धश्च परमेषुशतान्वितः ।। ३१ ।। 'उसमें लगी हुई छोटी-छोटी घंटियोंके मधुर शब्द सब ओर फैलते रहें। वह रथ वन्दनवारोंसे सजाया गया हो। उसके ऊपर जाम्बूनद नामक सुवर्ण जड़ा हुआ हो तथा

उसमें अच्छे-अच्छे सैकड़ों बाण रखे गये हों' ॥ ३१ ॥ ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् । भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ॥ ३२ ॥ तब राजा 'जो आज्ञा' कहकर गये और एक विशाल रथ तैयार करके ले आये। उसमें बायीं ओरका बोझ ढोनेके लिये रानीको लगाकर स्वयं वे दाहिनी ओर जुट गये ॥ ३२ ॥ त्रिदण्डं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् । सर्वमेतत् तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३३ ॥ उस रथपर उन्होंने एक ऐसा चाबुक भी रख दिया, जिसमें आगेकी ओर तीन दण्ड थे और जिसका अग्रभाग सूईकी नोंकके समान तीखा था। यह सब सामान प्रस्तुत करके राजाने पूछा— ॥ ३३ ॥ भगवन् क्व रथो यातु ब्रवीतु भृगुनन्दन । यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ॥ ३४ ॥ 'भगवन्! भृगुनन्दन! बताइये, यह रथ कहाँ जाय? ब्रह्मर्षे! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपका रथ चलेगा' ॥ ३४ ॥ एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाचाथ तं नृपम् । इतः प्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ॥ ३५ ॥ श्रमो मम यथा न स्यात् तथा मच्छन्दचारिणौ । सुसुखं चैव वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ॥ ३६ ॥ राजाके ऐसा पूछनेपर भगवान् च्यवन मुनिने उनसे कहा—'यहाँसे तुम बहुत धीरे-धीरे एक-एक कदम उठाकर चलो। यह ध्यान रखो कि मुझे कष्ट न होने पाये। तुम दोनोंको मेरी मर्जीके अनुसार चलना होगा। तुमलोग इस प्रकार इस रथको ले चलो जिससे मुझे अधिक आराम मिले और सब लोग देखें ॥ ३५-३६ ॥ नोत्सार्याः पथिकाः केचित् तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम् । ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि ॥ ३७ ॥ 'रास्तेसे किसी राहगीरको हटाना नहीं चाहिये, मैं उन सबको धन दूँगा। मार्गमें जो ब्राह्मण मुझसे जिस वस्तुकी प्रार्थना करेंगे मैं उनको वही वस्तु प्रदान करूँगा ॥ ३७ ॥ सर्वान् दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि । क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव ॥ ३८ ॥ 'मैं सबको उनकी इच्छाके अनुसार धन और रत्न बाँटूँगा। अतः इन सबके लिये पूरा-पूरा प्रबन्ध कर लो। पृथ्वीनाथ! इसके लिये मनमें कोई विचार न करो' ॥ ३८ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाब्रवीत् । यद् यद् ब्रूयान्मुनिस्तत्तत् सर्वं देयमशङ्कितैः ॥ ३९ ॥