महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे फिर यथास्थान खड़े होकर मुनिके पैर दबाने लगे। अबकी बार वे महामुनि दूसरी करवटसे सोये थे ।।
तेनैव च स कालेन प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । न च तौ चक्रतुः किंचिद् विकारं भयशङ्कितौ ॥ ७ ॥ शक्तिशाली च्यवन मुनि फिर उतने ही समयमें सोकर उठे। राजा और रानी उनके भयसे शंकित थे, अतः उन्होंने अपने मनमें तनिक भी विकार नहीं आने दिया ।। ७ ।।
प्रतिबुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशाम्पते । तैलाभ्यंगो दीयतां मे स्नास्येऽहमिति भारत ॥ ८ ॥ भारत! प्रजानाथ! जब वे मुनि जागे, तब राजा और रानीसे इस प्रकार बोले—‘तुमलोग मेरे शरीरमें तेलकी मालिश करो; क्योंकि अब मैं स्नान करूँगा' ।। ८ ।।
तौ तथेति प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतुः ॥ ९ ॥ यद्यपि राजा-रानी भूख-प्याससे पीड़ित और अत्यन्त दुर्बल हो गये थे तो भी ‘बहुत अच्छा’ कहकर वे राजदम्पति सौ बार पकाकर तैयार किये हुए बहुमूल्य तेलको लेकर उनकी सेवामें जुट गये ।। ९ ।।
ततः सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतुः । न च पर्याप्तमित्याह भार्गवः सुमहातपाः ॥ १० ॥ ऋषि आनन्दसे बैठ गये और वे दोनों दम्पति मौन हो उनके शरीरमें तेल मलने लगे। परंतु महातपस्वी भृगुपुत्र च्यवनने अपने मुँहसे एक बार भी नहीं कहा कि 'बस, अब रहने दो, तेलकी मालिश पूरी हो गयी' ।। १० ।।
यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षयामास भार्गवः । तत उत्थाय सहसा स्नानशालां विवेश ह ॥ ११ ॥ भृगुपुत्रने इतनेपर भी जब राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा, तब सहसा उठकर वे स्नानागारमें चले गये ।। ११ ।।
क्लृप्तमेव तु तत्रासीत् स्नानीयं पार्थिवोचितम् । असत्कृत्य च तत् सर्वं तत्रैवान्तरधीयत ॥ १२ ॥ स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा । नासूयां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ स्नानके लिये राजोचित सामग्री पहलेसे ही तैयार करके रखी गयी थी; किंतु उस सारी सामग्रीकी अवहेलना करके—उसका किंचित् भी उपयोग न करके वे मुनि पुनः राजाके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये; तो भी उन पति-पत्नीने उनके प्रति दोष-दृष्टि नहीं की ।। १२-१३ ।।
अथ स्नातः सः भगवान् सिंहासनगतः प्रभुः ।