भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 527

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त्रिपञ्चशत्तमोऽध्यायः

च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना

युधिष्ठिर उवाच

तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत् तदा ।
भार्या चास्य महाभागा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! च्यवन मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर राजा कुशिक और उनकी महान् सौभाग्यशालिनी पत्नीने क्या किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया ।
परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— राजन्! पत्नीसहित भूपालने बहुत ढूँढ़नेपर भी जब ऋषिको नहीं देखा तब वे थककर लौट आये। उस समय उन्हें बड़ा संकोच हो रहा था। वे अचेत-से हो गये थे ॥ २ ॥

स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किंचन ।
तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ॥ ३ ॥

वे दीनभावसे पुरीमें प्रवेश करके किसीसे कुछ बोले नहीं। केवल च्यवन मुनिके चरित्रपर मन-ही-मन विचार करने लगे ॥ ३ ॥

अथ शून्येन मनसा प्रविश्य स्वगृहं नृपः ।
ददर्श शयने तस्मिन् शयानं भृगुनन्दनम् ॥ ४ ॥

राजाने सूने मनसे जब घरमें प्रवेश किया तब भृगुनन्दन महर्षि च्यवनको पुनः उसी शय्यापर सोते देखा ॥ ४ ॥

विस्मितौ तमृषिं दृष्ट्वा तदाश्चर्यं विचिन्त्य च ।
दर्शनात् तस्य तु तदा विश्रान्तौ सम्बभूवतुः ॥ ५ ॥

उन महर्षिको देखकर उन दोनोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे उस आश्चर्यजनक घटनापर विचार करके चकित हो गये। मुनिके दर्शनसे उन दोनोंकी सारी थकावट दूर हो गयी ॥ ५ ॥

यथास्थानं च तौ स्थित्वा भूयस्तं संववाहतुः ।
अथापरेण पार्श्वेन सुषवाप स महामुनिः ॥ ६ ॥