भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 523

प्रगृह्य राजा भृंगारं पाद्यमस्मै न्यवेदयत् । कारयामास सर्वांश्च क्रियास्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥ राजाने स्वयं गडुआ हाथमें लेकर मुनिको पैर धोनेके लिये जल निवेदन किया। इसके बाद उन महात्माको अर्घ्य आदि देनेकी सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करायीं ॥ १४ ॥

ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि । ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रतः ॥ १५ ॥ इसके बाद नियमतः व्रत पालन करनेवाले महामनस्वी राजा कुशिकने शान्तभावसे च्यवन मुनिको विधिपूर्वक मधुपर्क भोजन कराया ॥ १५ ॥

सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् । भगवन् परवन्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे ॥ १६ ॥ इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिका यथावत् सत्कार करके वे फिर उनसे बोले—‘भगवन्! हम दोनों पति-पत्नी आपके अधीन हैं। बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें ॥ १६ ॥

यदि राज्यं यदि धनं यदि गाः संशितव्रत । यज्ञदानानि च तथा ब्रूहि सर्वं ददामि ते ॥ १७ ॥ इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते । राजा त्वमसि शाध्युर्वीमहं तु परवांस्त्वयि ॥ १८ ॥ ‘कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! यदि आप राज्य, धन, गौ एवं यज्ञके निमित्त दान लेना चाहते हों तो बतावें। वह सब मैं आपको दे सकता हूँ। यह राजभवन, यह राज्य और यह धर्मानुकूल राज्यसिंहासन—सब आपका है। आप ही राजा हैं, इस पृथ्वीका पालन कीजिये। मैं तो सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ' ॥ १७-१८ ॥

एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा । कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमया युतः ॥ १९ ॥ उनके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और कुशिकसे इस प्रकार बोले— ॥

न राज्यं कामये राजन् न धनं न च योषितः । न च गा न च वै देशान् न यज्ञं श्रूयतामिदम् ॥ २० ॥ ‘राजन्! न मैं राज्य चाहता हूँ न धन। न युवतियोंकी इच्छा रखता हूँ न गौओं, देशों और यज्ञकी ही। आप मेरी यह बात सुनिये ॥ २० ॥

नियमं किंचिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते । परिचर्योऽस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कया ॥ २१ ॥ ‘यदि आपलोगोंको जँचे तो मैं एक नियम आरम्भ करूँगा। उसमें आप दोनों पति-पत्नीको सर्वथा सावधान रहकर बिना किसी हिचकके मेरी सेवा करनी होगी' ॥ २१ ॥

एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतुः ।