महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 524, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ॥ २२ ॥ मुनिकी यह बात सुनकर राजदम्पतिको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! उन दोनोंने उन्हें उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा, हम आपकी सेवा करेंगे' ॥ २२ ॥ अथ तं कुशिको हृष्टः प्रावेशयदनुत्तमम् । गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत् ॥ २३ ॥ तदनन्तर राजा कुशिक महर्षि च्यवनको बड़े आनन्दके साथ अपने सुन्दर महलके भीतर ले गये। वहाँ उन्होंने मुनिको एक सजा-सजाया कमरा दिखाया, जो देखने योग्य था ॥ २३ ॥ इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् । प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ॥ २४ ॥ उस घरको दिखाकर वे बोले—'तपोधन! यह आपके लिये शय्या बिछी हुई है। आप इच्छानुसार यहाँ आराम कीजिये। हमलोग आपको प्रसन्न रखनेका प्रयत्न करेंगे' ॥ २४ ॥ अथ सूर्योऽतिचक्राम तेषां संवदतां तथा । अथर्षिश्चोदयामास पानमन्नं तथैव च ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनमें बातें होते-होते सूर्यास्त हो गया। तब महर्षिने राजाको अन्न और जल ले आनेकी आज्ञा दी ॥ २५ ॥ तमपृच्छत् ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा । किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम् ॥ २६ ॥ उस समय राजा कुशिकने उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा—'महर्षे! आपको कौन-सा भोजन अभीष्ट है? आपकी सेवामें क्या-क्या सामान लाऊँ?' ॥ २६ ॥ ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् । औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत ॥ २७ ॥ भरतनन्दन! यह सुनकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ राजासे बोले—'तुम्हारे यहाँ जो भोजन तैयार हो, वही ला दो' ॥ २७ ॥ तद्वचः पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः । यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप ॥ २८ ॥ नरेश्वर! राजा मुनिके उस कथनका आदर करते हुए 'जो आज्ञा' कहकर गये और जो भोजन तैयार था, उसे लाकर उन्होंने मुनिके सामने प्रस्तुत कर दिया ॥ २८ ॥ ततः स भुक्त्वा भगवान् दम्पती प्राह धर्मवित् । स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो ॥ २९ ॥ प्रभो! तदनन्तर भोजन करके धर्मज्ञ भगवान् च्यवनने राजदम्पत्तिसे कहा—'अब मैं सोना चाहता हूँ, मुझे नींद सता रही है' ॥ २९ ॥ ततः शय्यागृहं प्राप्य भगवानृषिसत्तमः ।