महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 525, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंविवेश नरेशस्तु सपत्नीकः स्थितोऽभवत् ॥ ३० ॥ इसके बाद मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन शयनागारमें जाकर सो गये और पत्नीसहित राजा कुशिक उनकी सेवामें खड़े रहे ॥ ३० ॥ न प्रबोध्योऽस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवः । संवाहयितव्यौ मे पादौ जागृतव्यं च तेऽनिशम् ॥ ३१ ॥ उस समय भृगुपुत्रने उन दोनोंसे कहा—'तुमलोग सोते समय मुझे जगाना मत। मेरे दोनों पैर दबाते रहना और स्वयं भी निरन्तर जागते रहना' ॥ ३१ ॥ अविशङ्कस्तु कुशिकस्तथेत्येवाह धर्मवित् । न प्रबोधयतां तौ च दम्पती रजनीक्षये ॥ ३२ ॥ धर्मज्ञ राज कुशिकने निःशंक होकर कहा, 'बहुत अच्छा'। रात बीती, सबेरा हुआ, किंतु उन पति-पत्नीने मुनिको जगाया नहीं ॥ ३२ ॥ यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा । बभूवतुर्महाराज प्रयतावथ दम्पती ॥ ३३ ॥ महाराज! वे दोनों दम्पति मन और इन्द्रियोंको वशमें करके महर्षिके आज्ञानुसार उनकी सेवामें लगे रहे ॥ ३३ ॥ ततः स भगवान् विप्रः समादिश्य नराधिपम् । सुष्वापैकेन पार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ॥ ३४ ॥ उधर ब्रह्मर्षि भगवान् च्यवन राजाको सेवाका आदेश देकर इक्कीस दिनोंतक एक ही करवटसे सोते रह गये ॥ ३४ ॥ स तु राजा निराहारः सभार्यः कुरुनन्दन । पर्युपासत तं हृष्टश्च्यवनाराधने रतः ॥ ३५ ॥ कुरुनन्दन! राजा और रानी बिना कुछ खाये-पीये हर्षपूर्वक महर्षिकी उपासना और आराधनामें लगे रहे ॥ भार्गवस्तु समुत्तस्थौ स्वयमेव तपोधनः । अकिंचिदुक्त्वा तु गृहान्निष्चक्राम महातपाः ॥ ३६ ॥ बाईसवें दिन तपस्याके धनी महातपस्वी च्यवन अपने आप उठे और राजासे कुछ कहे बिना ही महलसे बाहर निकल गये ॥ ३६ ॥ तमन्वगच्छतां तौ च क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । भार्यापती मुनिश्रेष्ठस्तावेतौ नावलोकयत् ॥ ३७ ॥ राजा-रानी भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे दुर्बल हो गये थे। तो भी वे मुनिके पीछे-पीछे गये, परंतु उन मुनिश्रेष्ठने इन दोनोंकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं ॥ ३७ ॥