महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 519, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यैः सह जलोद्भवैः ॥ ३९ ॥ मल्लाहो! मैं तुम्हारी दी हुई गौ स्वीकार करता हूँ। इस गोदानके प्रभावसे तुम्हारे सारे पाप दूर हो गये। अब तुमलोग जलमें पैदा हुई इन मछलियोंके साथ ही शीघ्र स्वर्गको जाओ ॥ ३९ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तस्य प्रभावात् ते महर्षेर्भावितात्मनः । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययुः ॥ ४० ॥ भीष्मजी कहते हैं—भारत! तदनन्तर विशुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षि च्यवनके पूर्वोक्त बात कहते ही उनके प्रभावसे वे मल्लाह उन मछलियोंके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४० ॥
ततः स राजा नहुषो विस्मितः प्रेक्ष्य धीवरान् । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांश्च भरतर्षभ ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय उन मल्लाहों और मत्स्योंको भी स्वर्गलोककी ओर जाते देख राजा नहुषको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥
ततस्तौ गविजश्चैव च्यवनश्च भृगूद्वहः । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्नृपम् ॥ ४२ ॥ तत्पश्चात् गौसे उत्पन्न महर्षि और भृगुनन्दन च्यवन दोनोंने राजा नहुषसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥
ततो राजा महावीर्यो नहुषः पृथिवीपतिः । परमित्यब्रवीत् प्रीतस्तदा भरतसत्तम ॥ ४३ ॥ भरतभूषण! तब वे महापराक्रमी भूपाल राजा नहुष प्रसन्न होकर बोले—'बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है' ॥
ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः । तथेति चोदितः प्रीतस्तावृषी प्रत्यपूजयत् ॥ ४४ ॥ फिर दोनोंके आग्रहसे उन इन्द्रके समान तेजस्वी नरेशने धर्ममें स्थित रहनेका वरदान माँगा और उनके तथास्तु कहनेपर राजाने उन दोनों ऋषियोंका विधिवत् पूजन किया ॥ ४४ ॥
समाप्तदीक्षश्च्यवनस्ततोऽगच्छत् स्वमाश्रमम् । गविजश्च महातेजाः स्वमाश्रमपदं ययौ ॥ ४५ ॥ उसी दिन महर्षि च्यवनकी दीक्षा समाप्त हुई और वे अपने आश्रमपर चले गये। इसके बाद महातेजस्वी गोजात मुनि भी अपने आश्रमको पधारे ॥ ४५ ॥
निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप ।