महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यैः सह जलोद्भवैः ॥ ३९ ॥ मल्लाहो! मैं तुम्हारी दी हुई गौ स्वीकार करता हूँ। इस गोदानके प्रभावसे तुम्हारे सारे पाप दूर हो गये। अब तुमलोग जलमें पैदा हुई इन मछलियोंके साथ ही शीघ्र स्वर्गको जाओ ॥ ३९ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तस्य प्रभावात् ते महर्षेर्भावितात्मनः । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययुः ॥ ४० ॥ भीष्मजी कहते हैं—भारत! तदनन्तर विशुद्ध अन्तःकरणवाले उन महर्षि च्यवनके पूर्वोक्त बात कहते ही उनके प्रभावसे वे मल्लाह उन मछलियोंके साथ ही स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४० ॥
ततः स राजा नहुषो विस्मितः प्रेक्ष्य धीवरान् । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांश्च भरतर्षभ ॥ ४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय उन मल्लाहों और मत्स्योंको भी स्वर्गलोककी ओर जाते देख राजा नहुषको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥
ततस्तौ गविजश्चैव च्यवनश्च भृगूद्वहः । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्नृपम् ॥ ४२ ॥ तत्पश्चात् गौसे उत्पन्न महर्षि और भृगुनन्दन च्यवन दोनोंने राजा नहुषसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥
ततो राजा महावीर्यो नहुषः पृथिवीपतिः । परमित्यब्रवीत् प्रीतस्तदा भरतसत्तम ॥ ४३ ॥ भरतभूषण! तब वे महापराक्रमी भूपाल राजा नहुष प्रसन्न होकर बोले—'बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है' ॥
ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः । तथेति चोदितः प्रीतस्तावृषी प्रत्यपूजयत् ॥ ४४ ॥ फिर दोनोंके आग्रहसे उन इन्द्रके समान तेजस्वी नरेशने धर्ममें स्थित रहनेका वरदान माँगा और उनके तथास्तु कहनेपर राजाने उन दोनों ऋषियोंका विधिवत् पूजन किया ॥ ४४ ॥
समाप्तदीक्षश्च्यवनस्ततोऽगच्छत् स्वमाश्रमम् । गविजश्च महातेजाः स्वमाश्रमपदं ययौ ॥ ४५ ॥ उसी दिन महर्षि च्यवनकी दीक्षा समाप्त हुई और वे अपने आश्रमपर चले गये। इसके बाद महातेजस्वी गोजात मुनि भी अपने आश्रमको पधारे ॥ ४५ ॥
निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप ।
नहुषोऽपि वरं लब्ध्वा प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ ४६ ॥ नरेश्वर! वे मल्लाह और मत्स्य तो स्वर्गलोकमें चले गये और राजा नहुष भी वर पाकर अपनी राजधानीको लौट आये ॥ ४६ ॥ एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । दर्शने यादृशः स्नेहः संवासे वा युधिष्ठिर ॥ ४७ ॥ महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम् । किं भूयः कथ्यतां वीर किं ते हृदि विवक्षितम् ॥ ४८ ॥ तात युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह सारा प्रसंग सुनाया है। दर्शन और सहवाससे कैसा स्नेह होता है? गौओंका माहात्म्य क्या है? तथा इस विषयमें धर्मका निश्चय क्या है? ये सारी बातें इस प्रसंगसे स्पष्ट हो जाती हैं। अब मैं तुम्हें कौन-सी बात बताऊँ? वीर! तुम्हारे मनमें क्या सुननेकी इच्छा है? ॥ ४७-४८ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनका उपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 521)
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा
युधिष्ठिर उवाच
संशयो मे महाप्राज्ञ सुमहान् सागरोपमः ।
तं मे शृणु महाबाहो श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—महाबाहो! मेरे मनमें एक महासागरके समान महान् संदेह हो गया है। महाप्राज्ञ! उसे सुनिये और सुनकर उसकी व्याख्या कीजिये ॥ १ ॥
कौतूहलं मे सुमहज्जामदग्न्यं प्रति प्रभो ।
रामं धर्मभृतां श्रेष्ठं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
प्रभो! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजीके विषयमें मेरा कौतूहल बढ़ा हुआ है; अतः आप मेरे प्रश्नका विशद विवेचन कीजिये ॥ २ ॥
कथमेष समुत्पन्नो रामः सत्यपराक्रमः ।
कथं ब्रह्मर्षिवंशोऽयं क्षत्रधर्मा व्यजायत ॥ ३ ॥
ये सत्यपराक्रमी परशुरामजी कैसे उत्पन्न हुए? ब्रह्मर्षियोंका यह वंश क्षत्रियधर्मसे सम्पन्न कैसे हो गया? ॥ ३ ॥
तदस्य सम्भवं राजन् निखिलेनानुकीर्तय ।
कौशिकाच्च कथं वंशात् क्षत्राद् वै ब्राह्मणो भवेत् ॥ ४ ॥
अतः राजन्! आप परशुरामजीकी उत्पत्तिका प्रसंग पूर्णरूपसे बताइये। राजा कुशिकका वंश तो क्षत्रिय था, उससे ब्राह्मण जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ॥ ४ ॥
अहो प्रभावः सुमहानासीद् वै सुमहात्मनः ।
रामस्य च नरव्याघ्र विश्वामित्रस्य चैव हि ॥ ५ ॥
पुरुषसिंह! महात्मा परशुराम और विश्वामित्रका महान् प्रभाव अद्भुत था ॥ ५ ॥
कथं पुत्रानतिक्रम्य तेषां नप्तृष्वथाभवत् ।
एष दोषः सुतान् हित्वा तत्त्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥
राजा कुशिक और महर्षि ऋचीक—ये ही अपने-अपने वंशके प्रवर्तक थे। उनके पुत्र गाधि और जमदग्निको लाँघकर उनके पौत्र विश्वामित्र और परशुराममें ही यह विजातीयताका दोष क्यों आया? इसमें जो यथार्थ कारण हो, उसकी व्याख्या कीजिये ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । च्यवनस्य च संवादं कुशिकस्य च भारत ॥ ७ ॥ **भीष्मजीने कहा—**भारत! इस विषयमें महर्षि च्यवन और राजा कुशिकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ७ ॥
एतं दोषं पुरा दृष्ट्वा भार्गवश्च्यवनस्तदा । आगामिनं महाबुद्धिः स्ववंशे मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥ निश्चित्य मनसा सर्वं गुणदोषबलाबलम् । दग्धुकामः कुलं सर्वं कुशिकानां तपोधनः ॥ ९ ॥ च्यवनः समनुप्राप्य कुशिकं वाक्यमब्रवीत् । वस्तुमिच्छा समुत्पन्ना त्वया सह ममानघ ॥ १० ॥ पूर्वकालमें भृगुपुत्र च्यवनको यह बात मालूम हुई कि हमारे वंशमें कुशिक-वंशकी कन्याके सम्बन्धसे क्षत्रियत्वका महान् दोष आनेवाला है। यह जानकर उन परम बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठने मन-ही-मन सारे गुण-दोष और बलाबलका विचार किया। तत्पश्चात् कुशिकोंके समस्त कुलको भस्म कर डालनेकी इच्छासे तपोधन च्यवन राजा कुशिकके पास गये और इस प्रकार बोले—‘निष्पाप नरेश! मेरे मनमें कुछ कालतक तुम्हारे साथ रहनेकी इच्छा हुई है’ ॥ ८—१० ॥
कुशिक उवाच भगवन् सहधर्मोऽयं पण्डितैरिह धार्यते । प्रदानकाले कन्यानामुच्यते च सदा बुधैः ॥ ११ ॥ **कुशिकने कहा—**भगवन्! यह अतिथिसेवारूप सहधर्म विद्वान् पुरुष यहाँ सदा धारण करते हैं और कन्याओंके प्रदानकाल अर्थात् कन्याके विवाहके समयमें सदा पण्डितजन इसका उपदेश देते हैं ॥ ११ ॥
यत्त तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन । तत्कार्यं प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १२ ॥ तपोधन! अबतक तो इस धर्मके मार्गका पालन नहीं हुआ और समय निकल गया, परंतु अब आपके सहयोग और कृपासे इसका पालन करूँगा। अतः आप मुझे आज्ञा प्रदान करें कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥
भीष्म उवाच अथासनमुपादाय च्यवनस्य महामुनेः । कुशिको भार्यया सार्धमाजगाम यतो मुनिः ॥ १३ ॥ इतना कहकर राजा कुशिकने महामुनि च्यवनको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे मुनि विराजमान थे ॥
प्रगृह्य राजा भृंगारं पाद्यमस्मै न्यवेदयत् । कारयामास सर्वांश्च क्रियास्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥ राजाने स्वयं गडुआ हाथमें लेकर मुनिको पैर धोनेके लिये जल निवेदन किया। इसके बाद उन महात्माको अर्घ्य आदि देनेकी सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करायीं ॥ १४ ॥
ततः स राजा च्यवनं मधुपर्कं यथाविधि । ग्राहयामास चाव्यग्रो महात्मा नियतव्रतः ॥ १५ ॥ इसके बाद नियमतः व्रत पालन करनेवाले महामनस्वी राजा कुशिकने शान्तभावसे च्यवन मुनिको विधिपूर्वक मधुपर्क भोजन कराया ॥ १५ ॥
सत्कृत्य तं तथा विप्रमिदं पुनरथाब्रवीत् । भगवन् परवन्तौ स्वो ब्रूहि किं करवावहे ॥ १६ ॥ इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिका यथावत् सत्कार करके वे फिर उनसे बोले—‘भगवन्! हम दोनों पति-पत्नी आपके अधीन हैं। बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें ॥ १६ ॥
यदि राज्यं यदि धनं यदि गाः संशितव्रत । यज्ञदानानि च तथा ब्रूहि सर्वं ददामि ते ॥ १७ ॥ इदं गृहमिदं राज्यमिदं धर्मासनं च ते । राजा त्वमसि शाध्युर्वीमहं तु परवांस्त्वयि ॥ १८ ॥ ‘कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! यदि आप राज्य, धन, गौ एवं यज्ञके निमित्त दान लेना चाहते हों तो बतावें। वह सब मैं आपको दे सकता हूँ। यह राजभवन, यह राज्य और यह धर्मानुकूल राज्यसिंहासन—सब आपका है। आप ही राजा हैं, इस पृथ्वीका पालन कीजिये। मैं तो सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ' ॥ १७-१८ ॥
एवमुक्ते ततो वाक्ये च्यवनो भार्गवस्तदा । कुशिकं प्रत्युवाचेदं मुदा परमया युतः ॥ १९ ॥ उनके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और कुशिकसे इस प्रकार बोले— ॥
न राज्यं कामये राजन् न धनं न च योषितः । न च गा न च वै देशान् न यज्ञं श्रूयतामिदम् ॥ २० ॥ ‘राजन्! न मैं राज्य चाहता हूँ न धन। न युवतियोंकी इच्छा रखता हूँ न गौओं, देशों और यज्ञकी ही। आप मेरी यह बात सुनिये ॥ २० ॥
नियमं किंचिदारप्स्ये युवयोर्यदि रोचते । परिचर्योऽस्मि यत्ताभ्यां युवाभ्यामविशङ्कया ॥ २१ ॥ ‘यदि आपलोगोंको जँचे तो मैं एक नियम आरम्भ करूँगा। उसमें आप दोनों पति-पत्नीको सर्वथा सावधान रहकर बिना किसी हिचकके मेरी सेवा करनी होगी' ॥ २१ ॥
एवमुक्ते तदा तेन दम्पती तौ जहर्षतुः ।
प्रत्यब्रूतां च तमृषिमेवमस्त्विति भारत ॥ २२ ॥ मुनिकी यह बात सुनकर राजदम्पतिको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! उन दोनोंने उन्हें उत्तर दिया, 'बहुत अच्छा, हम आपकी सेवा करेंगे' ॥ २२ ॥ अथ तं कुशिको हृष्टः प्रावेशयदनुत्तमम् । गृहोद्देशं ततस्तस्य दर्शनीयमदर्शयत् ॥ २३ ॥ तदनन्तर राजा कुशिक महर्षि च्यवनको बड़े आनन्दके साथ अपने सुन्दर महलके भीतर ले गये। वहाँ उन्होंने मुनिको एक सजा-सजाया कमरा दिखाया, जो देखने योग्य था ॥ २३ ॥ इयं शय्या भगवतो यथाकाममिहोष्यताम् । प्रयतिष्यावहे प्रीतिमाहर्तुं ते तपोधन ॥ २४ ॥ उस घरको दिखाकर वे बोले—'तपोधन! यह आपके लिये शय्या बिछी हुई है। आप इच्छानुसार यहाँ आराम कीजिये। हमलोग आपको प्रसन्न रखनेका प्रयत्न करेंगे' ॥ २४ ॥ अथ सूर्योऽतिचक्राम तेषां संवदतां तथा । अथर्षिश्चोदयामास पानमन्नं तथैव च ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनमें बातें होते-होते सूर्यास्त हो गया। तब महर्षिने राजाको अन्न और जल ले आनेकी आज्ञा दी ॥ २५ ॥ तमपृच्छत् ततो राजा कुशिकः प्रणतस्तदा । किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापयाम्यहम् ॥ २६ ॥ उस समय राजा कुशिकने उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा—'महर्षे! आपको कौन-सा भोजन अभीष्ट है? आपकी सेवामें क्या-क्या सामान लाऊँ?' ॥ २६ ॥ ततः स परया प्रीत्या प्रत्युवाच नराधिपम् । औपपत्तिकमाहारं प्रयच्छस्वेति भारत ॥ २७ ॥ भरतनन्दन! यह सुनकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ राजासे बोले—'तुम्हारे यहाँ जो भोजन तैयार हो, वही ला दो' ॥ २७ ॥ तद्वचः पूजयित्वा तु तथेत्याह स पार्थिवः । यथोपपन्नमाहारं तस्मै प्रादाज्जनाधिप ॥ २८ ॥ नरेश्वर! राजा मुनिके उस कथनका आदर करते हुए 'जो आज्ञा' कहकर गये और जो भोजन तैयार था, उसे लाकर उन्होंने मुनिके सामने प्रस्तुत कर दिया ॥ २८ ॥ ततः स भुक्त्वा भगवान् दम्पती प्राह धर्मवित् । स्वप्तुमिच्छाम्यहं निद्रा बाधते मामिति प्रभो ॥ २९ ॥ प्रभो! तदनन्तर भोजन करके धर्मज्ञ भगवान् च्यवनने राजदम्पत्तिसे कहा—'अब मैं सोना चाहता हूँ, मुझे नींद सता रही है' ॥ २९ ॥ ततः शय्यागृहं प्राप्य भगवानृषिसत्तमः ।
संविवेश नरेशस्तु सपत्नीकः स्थितोऽभवत् ॥ ३० ॥ इसके बाद मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन शयनागारमें जाकर सो गये और पत्नीसहित राजा कुशिक उनकी सेवामें खड़े रहे ॥ ३० ॥ न प्रबोध्योऽस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवः । संवाहयितव्यौ मे पादौ जागृतव्यं च तेऽनिशम् ॥ ३१ ॥ उस समय भृगुपुत्रने उन दोनोंसे कहा—'तुमलोग सोते समय मुझे जगाना मत। मेरे दोनों पैर दबाते रहना और स्वयं भी निरन्तर जागते रहना' ॥ ३१ ॥ अविशङ्कस्तु कुशिकस्तथेत्येवाह धर्मवित् । न प्रबोधयतां तौ च दम्पती रजनीक्षये ॥ ३२ ॥ धर्मज्ञ राज कुशिकने निःशंक होकर कहा, 'बहुत अच्छा'। रात बीती, सबेरा हुआ, किंतु उन पति-पत्नीने मुनिको जगाया नहीं ॥ ३२ ॥ यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा । बभूवतुर्महाराज प्रयतावथ दम्पती ॥ ३३ ॥ महाराज! वे दोनों दम्पति मन और इन्द्रियोंको वशमें करके महर्षिके आज्ञानुसार उनकी सेवामें लगे रहे ॥ ३३ ॥ ततः स भगवान् विप्रः समादिश्य नराधिपम् । सुष्वापैकेन पार्श्वेन दिवसानेकविंशतिम् ॥ ३४ ॥ उधर ब्रह्मर्षि भगवान् च्यवन राजाको सेवाका आदेश देकर इक्कीस दिनोंतक एक ही करवटसे सोते रह गये ॥ ३४ ॥ स तु राजा निराहारः सभार्यः कुरुनन्दन । पर्युपासत तं हृष्टश्च्यवनाराधने रतः ॥ ३५ ॥ कुरुनन्दन! राजा और रानी बिना कुछ खाये-पीये हर्षपूर्वक महर्षिकी उपासना और आराधनामें लगे रहे ॥ भार्गवस्तु समुत्तस्थौ स्वयमेव तपोधनः । अकिंचिदुक्त्वा तु गृहान्निष्चक्राम महातपाः ॥ ३६ ॥ बाईसवें दिन तपस्याके धनी महातपस्वी च्यवन अपने आप उठे और राजासे कुछ कहे बिना ही महलसे बाहर निकल गये ॥ ३६ ॥ तमन्वगच्छतां तौ च क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । भार्यापती मुनिश्रेष्ठस्तावेतौ नावलोकयत् ॥ ३७ ॥ राजा-रानी भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे दुर्बल हो गये थे। तो भी वे मुनिके पीछे-पीछे गये, परंतु उन मुनिश्रेष्ठने इन दोनोंकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं ॥ ३७ ॥
तयोस्तु प्रेक्षतोरेव भार्गवाणां कुलोद्वहः । अन्तर्हितोऽभूद् राजेन्द्र ततो राजापतत् क्षितौ ॥ ३८ ॥ राजेन्द्र! वे भृगुकुलशिरोमणि राजा-रानीके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये। इससे अत्यन्त दुःखी हो राजा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३८ ॥ स मुहूर्तं समाश्वस्य सह देव्या महाद्युतिः । पुनरन्वेषणे यत्नमकरोत् परमं तदा ॥ ३९ ॥ दो घड़ीमें किसी तरह अपनेको सँभालकर वे महातेजस्वी राजा उठे और महारानीको साथ लेकर पुनः मुनिको ढूँढ़नेका महान् प्रयत्न करने लगे ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 527)
त्रिपञ्चशत्तमोऽध्यायः
च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना
युधिष्ठिर उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत् तदा ।
भार्या चास्य महाभागा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! च्यवन मुनिके अन्तर्धान हो जानेपर राजा कुशिक और उनकी महान् सौभाग्यशालिनी पत्नीने क्या किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया ।
परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! पत्नीसहित भूपालने बहुत ढूँढ़नेपर भी जब ऋषिको नहीं देखा तब वे थककर लौट आये। उस समय उन्हें बड़ा संकोच हो रहा था। वे अचेत-से हो गये थे ॥ २ ॥
स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किंचन ।
तदेव चिन्तयामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ॥ ३ ॥
वे दीनभावसे पुरीमें प्रवेश करके किसीसे कुछ बोले नहीं। केवल च्यवन मुनिके चरित्रपर मन-ही-मन विचार करने लगे ॥ ३ ॥
अथ शून्येन मनसा प्रविश्य स्वगृहं नृपः ।
ददर्श शयने तस्मिन् शयानं भृगुनन्दनम् ॥ ४ ॥
राजाने सूने मनसे जब घरमें प्रवेश किया तब भृगुनन्दन महर्षि च्यवनको पुनः उसी शय्यापर सोते देखा ॥ ४ ॥
विस्मितौ तमृषिं दृष्ट्वा तदाश्चर्यं विचिन्त्य च ।
दर्शनात् तस्य तु तदा विश्रान्तौ सम्बभूवतुः ॥ ५ ॥
उन महर्षिको देखकर उन दोनोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे उस आश्चर्यजनक घटनापर विचार करके चकित हो गये। मुनिके दर्शनसे उन दोनोंकी सारी थकावट दूर हो गयी ॥ ५ ॥
यथास्थानं च तौ स्थित्वा भूयस्तं संववाहतुः ।
अथापरेण पार्श्वेन सुषवाप स महामुनिः ॥ ६ ॥
वे फिर यथास्थान खड़े होकर मुनिके पैर दबाने लगे। अबकी बार वे महामुनि दूसरी करवटसे सोये थे ।।
तेनैव च स कालेन प्रत्यबुद्ध्यत वीर्यवान् । न च तौ चक्रतुः किंचिद् विकारं भयशङ्कितौ ॥ ७ ॥ शक्तिशाली च्यवन मुनि फिर उतने ही समयमें सोकर उठे। राजा और रानी उनके भयसे शंकित थे, अतः उन्होंने अपने मनमें तनिक भी विकार नहीं आने दिया ।। ७ ।।
प्रतिबुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशाम्पते । तैलाभ्यंगो दीयतां मे स्नास्येऽहमिति भारत ॥ ८ ॥ भारत! प्रजानाथ! जब वे मुनि जागे, तब राजा और रानीसे इस प्रकार बोले—‘तुमलोग मेरे शरीरमें तेलकी मालिश करो; क्योंकि अब मैं स्नान करूँगा' ।। ८ ।।
तौ तथेति प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ । शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतुः ॥ ९ ॥ यद्यपि राजा-रानी भूख-प्याससे पीड़ित और अत्यन्त दुर्बल हो गये थे तो भी ‘बहुत अच्छा’ कहकर वे राजदम्पति सौ बार पकाकर तैयार किये हुए बहुमूल्य तेलको लेकर उनकी सेवामें जुट गये ।। ९ ।।
ततः सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतुः । न च पर्याप्तमित्याह भार्गवः सुमहातपाः ॥ १० ॥ ऋषि आनन्दसे बैठ गये और वे दोनों दम्पति मौन हो उनके शरीरमें तेल मलने लगे। परंतु महातपस्वी भृगुपुत्र च्यवनने अपने मुँहसे एक बार भी नहीं कहा कि 'बस, अब रहने दो, तेलकी मालिश पूरी हो गयी' ।। १० ।।
यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षयामास भार्गवः । तत उत्थाय सहसा स्नानशालां विवेश ह ॥ ११ ॥ भृगुपुत्रने इतनेपर भी जब राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा, तब सहसा उठकर वे स्नानागारमें चले गये ।। ११ ।।
क्लृप्तमेव तु तत्रासीत् स्नानीयं पार्थिवोचितम् । असत्कृत्य च तत् सर्वं तत्रैवान्तरधीयत ॥ १२ ॥ स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा । नासूयां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ स्नानके लिये राजोचित सामग्री पहलेसे ही तैयार करके रखी गयी थी; किंतु उस सारी सामग्रीकी अवहेलना करके—उसका किंचित् भी उपयोग न करके वे मुनि पुनः राजाके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये; तो भी उन पति-पत्नीने उनके प्रति दोष-दृष्टि नहीं की ।। १२-१३ ।।
अथ स्नातः सः भगवान् सिंहासनगतः प्रभुः ।
दर्शयामास कुशिकं सभार्यं कुरुनन्दन ।। १४ ।।
कुरुनन्दन! तदनन्तर शक्तिशाली भगवान् च्यवन मुनि पत्नीसहित राजा कुशिकको स्नान करके सिंहासनपर बैठे दिखायी दिये ।। १४ ।।
संहृष्टवदनो राजा सभार्यः कुशिको मुनिम् ।
सिद्धमन्नमिति प्रह्वो निर्विकारो न्यवेदयत् ।। १५ ।।
उन्हें देखते ही पत्नीसहित राजाका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने निर्विकारभावसे मुनिके पास जाकर विनयपूर्वक यह निवेदन किया कि 'भोजन तैयार है' ।। १५ ।।
आनीयतामिति मुनिस्तं चोवाच नराधिपम् ।
स राजा समुपाजह्रे तदन्नं सह भार्यया ।। १६ ।।
तब मुनिने राजासे कहा—'ले आओ।' आज्ञा पाकर पत्नीसहित नरेशने मुनिके सामने भोजन-सामग्री प्रस्तुत की ।। १६ ।।
मांसप्रकारान् विविधान् शाकानि विविधानि च ।
वेसवारविकारांश्च पानकानि लघूनि च ।। १७ ।।
रसालापूपकांश्चित्रान् मोदकानथ खाण्डवान् ।
रसान् नानाप्रकारांश्च वन्यं च मुनिभोजनम् ।। १८ ।।
फलानि च विचित्राणि राजभोज्यानि भूरिशः ।
बदरेङ्गुदकाश्मर्यभल्लातकफलानि च ।। १९ ।।
गृहस्थानां च यद् भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम् ।
सर्वमाहारयामास राजा शापभयात् ततः ।। २० ।।
नाना प्रकारके फलोंके गूदे, भाँति-भाँतिके साग, अनेक प्रकारके व्यंजन, हलके पेय पदार्थ, स्वादिष्ट पूए, विचित्र मोदक (लड्डू), खाँड, नाना प्रकारके रस, मुनियोंके खानेयोग्य जंगली कंद-मूल, विचित्र फल, राजाओंके उपभोगमें आनेवाले अनेक प्रकारके पदार्थ, बेर, इंगुद, काश्मर्य, भल्लातक फल तथा गृहस्थों और वानप्रस्थोंके खाद्य पदार्थ—सब कुछ राजाने शापके डरसे मँगाकर प्रस्तुत कर दिया था ।। १७—२० ।।
अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्च्यवनस्य तत् ।
ततः सर्वं समानीय तच्च शय्यासनं मुनिः ।। २१ ।।
वस्त्रैः शुभैरवच्छाद्य भोजनोपस्करैः सह ।
सर्वमादीपयामास च्यवनो भृगुनन्दनः ।। २२ ।।
यह सब सामग्री च्यवन मुनिके आगे परोसकर रखी गयी। मुनिने वह सब लेकर उसको तथा शय्या और आसनको भी सुन्दर वस्त्रोंसे ढक दिया। इसके बाद भृगुनन्दन च्यवनने भोजन-सामग्रीके साथ उन वस्त्रोंमें भी आग लगा दी ।। २१-२२ ।।
न च तौ चक्रतुः क्रोधं दम्पती सुमहामती ।
तयोः सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितोऽभवत् ।। २३ ।।
परंतु उन परम बुद्धिमान् दम्पतिने उनपर क्रोध नहीं प्रकट किया। उन दोनोंके देखते-ही-देखते वे मुनि फिर अन्तर्धान हो गये ।। २३ ।। तथैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा । सभार्यो वाग्यतः श्रीमान् न च कोपं समाविशत् ।। २४ ।। वे श्रीमान् राजर्षि अपनी स्त्रीके साथ उसी तरह वहाँ रातभर चुपचाप खड़े रह गये; किंतु उनके मनमें क्रोधका आवेश नहीं हुआ ।। २४ ।। नित्यसंस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि । शयनानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ।। २५ ।। प्रतिदिन भाँति-भाँतिका भोजन तैयार करके राजभवनमें मुनिके लिये परोसा जाता, अच्छे-अच्छे पलंग बिछाये जाते तथा स्नानके लिये बहुत-से पात्र रखे जाते थे ।। २५ ।। वस्त्रं च विविधाकारमभवत् समुपार्जितम् । न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ।। २६ ।। पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् । सभार्यो मां रथेनाशु वह यत्र ब्रवीम्यहम् ।। २७ ।। अनेक प्रकारके वस्त्र ला-लाकर उनकी सेवामें समर्पित किये जाते थे। जब ब्रह्मर्षि च्यवन मुनि इन सब कार्योंमें कोई छिद्र न देख सके, तब फिर राजा कुशिकसे बोले—'तुम स्त्रीसहित रथमें जुत जाओ और मैं जहाँ कहूँ, वहाँ मुझे शीघ्र ले चलो' ।। २६-२७ ।। तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम् । क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथः ।। २८ ।। तब राजाने निःशंक होकर उन तपोधनसे कहा—'बहुत अच्छा, भगवन्! क्रीड़ाका रथ तैयार किया जाय या युद्धके उपयोगमें आनेवाला रथ?' ।। २८ ।। इत्युक्तः स मुनी राज्ञा तेन हृष्टेन तद्वचः । च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरंजयम् ।। २९ ।। हर्षमें भरे हुए राजाके इस प्रकार पूछनेपर च्यवनमुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले उन नरेशसे कहा— ।। २९ ।। सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते सांग्रामिको मतः । सायुधः सपताकश्च शक्तीकनकयष्टिमान् ।। ३० ।। 'राजन्! तुम्हारा जो युद्धोपयोगी रथ है, उसीको शीघ्र तैयार करो। उसमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र रखे रहें। पताका, शक्ति और सुवर्णदण्ड विद्यमान हों ।। ३० ।। किङ्किणीस्वननिर्घोषो युक्तस्तोरणकल्पनैः । जाम्बूनदनिबद्धश्च परमेषुशतान्वितः ।। ३१ ।। 'उसमें लगी हुई छोटी-छोटी घंटियोंके मधुर शब्द सब ओर फैलते रहें। वह रथ वन्दनवारोंसे सजाया गया हो। उसके ऊपर जाम्बूनद नामक सुवर्ण जड़ा हुआ हो तथा
उसमें अच्छे-अच्छे सैकड़ों बाण रखे गये हों' ॥ ३१ ॥ ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पयित्वा महारथम् । भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ॥ ३२ ॥ तब राजा 'जो आज्ञा' कहकर गये और एक विशाल रथ तैयार करके ले आये। उसमें बायीं ओरका बोझ ढोनेके लिये रानीको लगाकर स्वयं वे दाहिनी ओर जुट गये ॥ ३२ ॥ त्रिदण्डं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् । सर्वमेतत् तथा दत्त्वा नृपो वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३३ ॥ उस रथपर उन्होंने एक ऐसा चाबुक भी रख दिया, जिसमें आगेकी ओर तीन दण्ड थे और जिसका अग्रभाग सूईकी नोंकके समान तीखा था। यह सब सामान प्रस्तुत करके राजाने पूछा— ॥ ३३ ॥ भगवन् क्व रथो यातु ब्रवीतु भृगुनन्दन । यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ॥ ३४ ॥ 'भगवन्! भृगुनन्दन! बताइये, यह रथ कहाँ जाय? ब्रह्मर्षे! आप जहाँ कहेंगे, वहीं आपका रथ चलेगा' ॥ ३४ ॥ एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाचाथ तं नृपम् । इतः प्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ॥ ३५ ॥ श्रमो मम यथा न स्यात् तथा मच्छन्दचारिणौ । सुसुखं चैव वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ॥ ३६ ॥ राजाके ऐसा पूछनेपर भगवान् च्यवन मुनिने उनसे कहा—'यहाँसे तुम बहुत धीरे-धीरे एक-एक कदम उठाकर चलो। यह ध्यान रखो कि मुझे कष्ट न होने पाये। तुम दोनोंको मेरी मर्जीके अनुसार चलना होगा। तुमलोग इस प्रकार इस रथको ले चलो जिससे मुझे अधिक आराम मिले और सब लोग देखें ॥ ३५-३६ ॥ नोत्सार्याः पथिकाः केचित् तेभ्यो दास्ये वसु ह्यहम् । ब्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थयिष्यन्ति मां पथि ॥ ३७ ॥ 'रास्तेसे किसी राहगीरको हटाना नहीं चाहिये, मैं उन सबको धन दूँगा। मार्गमें जो ब्राह्मण मुझसे जिस वस्तुकी प्रार्थना करेंगे मैं उनको वही वस्तु प्रदान करूँगा ॥ ३७ ॥ सर्वान् दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि । क्रियतां निखिलेनैतन्मा विचारय पार्थिव ॥ ३८ ॥ 'मैं सबको उनकी इच्छाके अनुसार धन और रत्न बाँटूँगा। अतः इन सबके लिये पूरा-पूरा प्रबन्ध कर लो। पृथ्वीनाथ! इसके लिये मनमें कोई विचार न करो' ॥ ३८ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यांस्तथाब्रवीत् । यद् यद् ब्रूयान्मुनिस्तत्तत् सर्वं देयमशङ्कितैः ॥ ३९ ॥
मुनिका यह वचन सुनकर राजाने अपने सेवकोंसे कहा—'ये मुनि जिस-जिस वस्तुके लिये आज्ञा दें, वह सब निःशंक होकर देना' ॥ ३९ ॥
ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रियो युग्यमजाविकम् ।
कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ॥ ४० ॥
अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः ।
हाहाभूतं च तत् सर्वमासीन्नगरमार्तवत् ॥ ४१ ॥
राजाकी इस आज्ञाके अनुसार नाना प्रकारके रत्न, स्त्रियाँ, वाहन, बकरे, भेड़ें, सोनेके अलंकार, सोना और पर्वतोपम गजराज—ये सब मुनिके पीछे-पीछे चले। राजाके सम्पूर्ण मन्त्री भी इन वस्तुओंके साथ थे। उस समय सारा नगर आर्त होकर हाहाकार कर रहा था ॥ ४०-४१ ॥
तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रतोदितौ ।
पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारौ तमूहतुः ॥ ४२ ॥
इतनेहीमें मुनिने सहसा चाबुक उठाया और उन दोनोंकी पीठपर जोरसे प्रहार किया। उस चाबुकका अग्रभाग बड़ा तीखा था। उसकी करारी चोट पड़ते ही राजा-रानीकी पीठ और कमरमें घाव हो गया। फिर भी वे निर्विकारभावसे रथ ढोते रहे ॥ ४२ ॥
वेपमानौ निराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्षितौ ।
कथंचिदूहतुर्वीरौ दम्पती तं रथोत्तमम् ॥ ४३ ॥
पचास राततक उपवास करनेके कारण वे बहुत दुबले हो गये थे, उनका सारा शरीर काँप रहा था; तथापि वे वीर दम्पति किसी प्रकार साहस करके उस विशाल रथका बोझ ढो रहे थे ॥ ४३ ॥
बहुशो भृशविद्धौ तौ स्रवन्तौ च क्षतोद्भवम् ।
ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ४४ ॥
महाराज! वे दोनों बहुत घायल हो गये थे। उनकी पीठपर जो अनेक घाव हो गये थे, उनसे रक्त बह रहा था। खूनसे लथपथ होनेके कारण वे खिले हुए पलाशके फूलोंके समान दिखायी देते थे ॥ ४४ ॥
तौ दृष्ट्वा पौरवर्गस्तु भृशं शोकसमाकुलः ।
अभिशापभयत्रस्तो न च किंचिदुवाच ह ॥ ४५ ॥
पुरवासियोंका समुदाय उन दोनोंकी यह दुर्दशा देखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। सब लोग मुनिके शापसे डरते थे; इसलिये कोई कुछ बोल नहीं रहा था ॥ ४५ ॥
द्वन्द्वशश्चाब्रुवन् सर्वे पश्यध्वं तपसो बलम् ।
क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नेह शक्नुमः ॥ ४६ ॥
दो-दो आदमी अलग-अलग खड़े होकर आपसमें कहने लगे—'भाइयो! सब लोग मुनिकी तपस्याका बल तो देखो, हमलोग क्रोधमें भरे हुए हैं तो भी मुनिश्रेष्ठकी ओर यहाँ
आँख उठाकर देख भी नहीं सकते ॥ ४६ ॥ अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः । राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ॥ ४७ ॥ 'इन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि भगवान् च्यवनकी तपस्याका बल अद्भुत है। तथा महाराज और महारानीका धैर्य भी कैसा अनूठा है। यह अपनी आँखों देख लो ॥ ४७ ॥ श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेनं समूहतुः । न चैतयोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ॥ ४८ ॥ 'ये इतने थके होनेपर भी कष्ट उठाकर इस रथको खींचे जा रहे हैं। भृगुनन्दन च्यवन अभीतक इनमें कोई विकार नहीं देख सके हैं' ॥ ४८ ॥
भीष्म उवाच
ततः स निर्विकारौ तु दृष्ट्वा भृगुकुलोद्वहः । वसु विश्राणयामास यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ४९ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भृगुकुलशिरोमणि मुनिवर च्यवनने जब इतनेपर भी राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा तब वे कुबेरकी तरह उनका सारा धन लुटाने लगे ॥ ४९ ॥ तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथादिष्टमथाकरोत् । ततोऽस्य भगवान् प्रीतो बभूव मुनिसत्तमः ॥ ५० ॥ परंतु इस कार्यमें भी राजा कुशिक बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋषिकी आज्ञाका पालन करने लगे। इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन बहुत संतुष्ट हुए ॥ ५० ॥ अवतीर्य रथश्रेष्ठाद् दम्पती तौ मुमोच ह । विमोच्य चैतौ विधिवत् ततो वाक्यमुवाच ह ॥ ५१ ॥ उस उत्तम रथसे उतरकर उन्होंने दोनों पति-पत्नीको भार ढोनेके कार्यसे मुक्त कर दिया। मुक्त करके इन दोनोंसे विधिपूर्वक वार्तालाप किया ॥ ५१ ॥ स्निग्धगम्भीरया वाचा भार्गवः सुप्रसन्नया । ददानि वां वरं श्रेष्ठं तं ब्रूतामिति भारत ॥ ५२ ॥ भारत! भृगुपुत्र च्यवन उस समय स्नेह और प्रसन्नतासे युक्त गम्भीर वाणीमें बोले—'मैं तुम दोनोंको उत्तम वर देना चाहता हूँ, बतलाओ क्या दूँ?' ॥ ५२ ॥ सुकुमारौ च तौ विद्धौ कराभ्यां मुनिसत्तमः । पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद् भरतसत्तम ॥ ५३ ॥ भरतभूषण! यह कहते-कहते मुनिश्रेष्ठ च्यवन चाबुकसे घायल हुए उन दोनों सुकुमार राजदम्पतिकी पीठपर स्नेहवश अमृतके समान कोमल हाथ फेरने लगे ॥ ५३ ॥ अथाब्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह ।
विश्रान्तौ च प्रभावात् ते ऊचतुस्तौ तु भार्गवम् ॥ ५४ ॥
अथ तौ भगवान् प्राह प्रहृष्टश्च्यवनस्तदा ।
न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मया तद् भविष्यति ॥ ५५ ॥
उस समय राजाने भृगुपुत्र च्यवनसे कहा—'अब हम दोनोंको यहाँ तनिक भी थकावटका अनुभव नहीं हो रहा है। हम दोनों आपके प्रभावसे पूर्ण विश्राम-सुखका अनुभव करने लगे हैं।' जब दोनोंने इस प्रकार कहा, तब भगवान् च्यवन पुनः हर्षमें भरकर बोले—'मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह व्यर्थ नहीं होगा, पूर्ण होकर ही रहेगा ॥ ५४-५५ ॥
रमणीयः समुद्देशो गंगातीरमिदं शुभम् ।
किंचित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव ॥ ५६ ॥
'पृथ्वीनाथ! यह गंगाका सुन्दर तट बड़ा ही रमणीय स्थान है। मैं कुछ कालतक व्रतपरायण होकर यहीं रहूँगा ॥ ५६ ॥
गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्तः पुनरेष्यसि ।
इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप ॥ ५७ ॥
'बेटा! इस समय तुम अपने नगरमें जाओ और अपनी थकावट दूर करके कल सबेरे अपनी पत्नीके साथ फिर यहाँ आना। नरेश्वर! कल पत्नीसहित तुम मुझे यहीं देखोगे ॥ ५७ ॥
न च मन्युस्त्वया कार्यः श्रेयस्ते समुपस्थितम् ।
यत् काङ्क्षितं हृदिस्थं ते तत् सर्वं हि भविष्यति ॥ ५८ ॥
'तुम्हें अपने मनमें खेद नहीं करना चाहिये। अब तुम्हारे कल्याणका समय उपस्थित हुआ है। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा होगी वह सब पूर्ण हो जायगी' ॥ ५८ ॥
इत्येवमुक्तः कुशिकः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
प्रोवाच मुनिशार्दूलमिदं वचनमर्थवत् ॥ ५९ ॥
न मे मन्युर्महाभाग पूतौ स्वो भगवंस्त्वया ।
संवृत्तौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्तौ बलान्वितौ ॥ ६० ॥
मुनिके ऐसा कहनेपर राजा कुशिकने मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न होकर उन मुनिश्रेष्ठसे यह अर्थयुक्त वचन कहा—'भगवन्! महाभाग! आपने हमलोगोंको पवित्र कर दिया। हमारे मनमें तनिक भी खेद या रोष नहीं है। हम दोनोंकी तरुण अवस्था हो गयी तथा हमारा शरीर सुन्दर और बलवान् हो गया ॥ ५९-६० ॥
प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य त्वया कृताः ।
तान् न पश्यामि गात्रेषु स्वस्थोऽस्मि सह भार्यया ॥ ६१ ॥
'आपने पत्नीसहित मेरे शरीरपर चाबुक मार-मारकर जो घावकर दिये थे, उन्हें भी अब मैं अपने अंगोंमें नहीं देख रहा हूँ। मैं पत्नीसहित पूर्ण स्वस्थ हूँ ॥ ६१ ॥
इमां च देवीं पश्यामि वपुषाप्सरसोपमाम् ।
श्रिया परमया युक्तां यथा दृष्टा पुरा मया ॥ ६२ ॥ 'मैं अपनी इन महारानीको परम उत्तम कान्तिसे युक्त तथा अप्सराके समान मनोहर देख रहा हूँ। ये पहले मुझे जैसी दिखायी देती थीं वैसी ही हो गयी हैं' ॥ ६२ ॥ तव प्रसादसंवृत्तमिदं सर्वं महामुने । नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वयि सत्यपराक्रम ॥ ६३ ॥ 'महामुने! यह सब आपके कृपाप्रसादसे सम्भव हुआ है। भगवन्! आप सत्यपराक्रमी हैं। आप-जैसे तपस्वियोंमें ऐसी शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है' ॥ ६३ ॥ इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं कुशिकं च्यवनस्तदा । आगच्छेथाः सभार्यश्च त्वमिहेति नराधिप ॥ ६४ ॥ उनके ऐसा कहनेपर मुनिवर च्यवन पुनः राजा कुशिकसे बोले—'नरेश्वर! तुम पुनः अपनी पत्नीके साथ कल यहाँ आना' ॥ ६४ ॥ इत्युक्तः समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम् । प्रययौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत् ॥ ६५ ॥ महर्षिकी यह आज्ञा पाकर राजर्षि कुशिक उन्हें प्रणाम करके विदा ले देवराजके समान तेजस्वी शरीरसे युक्त हो अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ६५ ॥ तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः । बलस्था गणिकायुक्ताः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ॥ ६६ ॥ तदनन्तर उनके पीछे-पीछे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, नर्तकियाँ तथा समस्त प्रजावर्गके लोग चले ॥ ६६ ॥ तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिया परमया ज्वलन् । प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ बन्दिभिः ॥ ६७ ॥ उनसे घिरे हुए राजा कुशिक उत्कृष्ट तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने बड़े हर्षके साथ नगरमें प्रवेश किया। उस समय वन्दीजन उनके गुण गा रहे थे ॥ ६७ ॥ ततः प्रविश्य नगरं कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः । भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महाद्युतिः ॥ ६८ ॥ नगरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्नकालकी सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्न कीं। फिर पत्नीसहित भोजन करके उन महातेजस्वी नरेशने रातको महलमें निवास किया ॥ ६८ ॥ ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं परस्परं विगतरुजाविवामरौ । ननन्दतुः शयनगतौ वपुर्धरौ श्रिया युतौ द्विजवरदत्तया तदा ॥ ६९ ॥ वे दोनों पति-पत्नी नीरोग देवताओंके समान दिखायी देते थे। वे एक दूसरेके शरीरमें नयी जवानीका प्रवेश हुआ देखकर शय्यापर सोये-सोये बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे।
द्विजश्रेष्ठ च्यवनकी दी हुई उत्तम शोभासे सम्पन्न नूतन शरीर धारण किये वे दोनों दम्पति बहुत प्रसन्न थे॥ ६९॥
अथाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन- स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत् । मनीषया बहुविधरत्नभूषितं ससर्ज यन्न पुरि शतक्रतोरपि ॥ ७० ॥
इधर भृगुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले, तपस्याके धनी महर्षि च्यवनने गंगातटके तपोवनको अपने संकल्पद्वारा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित करके समृद्धिशाली एवं नयनाभिराम बना दिया। वैसा कमनीय कानन इन्द्रपुरी अमरावतीमें भी नहीं था॥ ७०॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥
अध्याय (पृष्ठ 537)
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना
भीष्म उवाच
ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामनाः ।
कृतपूर्वाह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वनं प्रति ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होनेपर महामना राजा कुशिक जागे और पूर्वाह्नकालके नैत्यिक नियमोंसे निवृत्त होकर अपनी रानीके साथ उस तपोवनकी ओर चल दिये ॥ १ ॥
ततो ददर्श नृपतिः प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।
मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ २ ॥
वहाँ पहुँचकर नरेशने एक सुन्दर महल देखा, जो सारा-का-सारा सोनेका बना हुआ था। उसमें मणियोंके हजारों खम्भे लगे हुए थे और वह अपनी शोभासे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा ।
पर्वतान् रूप्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः ॥ ३ ॥
चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत ।
शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ॥ ४ ॥
भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत-से दिव्य पदार्थ देखे। कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति-भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे। भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी-हरी घासकी बहार थी ॥
सहकारान् प्रफुल्लांश्च केतकोद्दालकान् वरान् ।
अशोकान् सहकुन्दांश्च फुल्लांश्चैवातिमुक्तकान् ॥ ५ ॥
चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वञ्जुलानपि ।
पुष्पितान् कर्णिकारांश्च तत्र तत्र ददर्श ह ॥ ६ ॥
अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा ॥ ५-६ ॥
श्यामान् वारणपुष्पांश्च तथाष्टपदिका लताः । तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपतिः ॥ ७ ॥ राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया ॥ ७ ॥
रम्यान् पङ्कजोत्पलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्चापि प्रासादान् शैलसंनिभान् ॥ ८ ॥ कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे। कहीं पर्वत-सदृश ऊँचे-ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे। वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे ॥ ८ ॥
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च ॥ ९ ॥ भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं ॥ ९ ॥
पर्यङ्कान् रत्नसौवर्णान् परार्घ्यास्तरणावृतान् । भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम् ॥ १० ॥ सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे ॥ १० ॥
वाणीवादान् शुकांश्चैव सारिकान् भृङ्गराजकान् । कोकिलान् शतपत्रांश्च सकोयष्टिककुक्कुभान् ॥ ११ ॥ मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहान् जीवजीवकान् । चकोरान् वानरान् हंसान् सारसांश्चक्रसाह्वयान् ॥ १२ ॥ समन्ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं ॥ ११-१२½ ॥
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव ॥ १३ ॥ कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह । न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नृपः ॥ १४ ॥ पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोंके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे ॥ १३-१४ ॥
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् ।