भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 532

मुनिका यह वचन सुनकर राजाने अपने सेवकोंसे कहा—'ये मुनि जिस-जिस वस्तुके लिये आज्ञा दें, वह सब निःशंक होकर देना' ॥ ३९ ॥
ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रियो युग्यमजाविकम् ।
कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ॥ ४० ॥
अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः ।
हाहाभूतं च तत् सर्वमासीन्नगरमार्तवत् ॥ ४१ ॥
राजाकी इस आज्ञाके अनुसार नाना प्रकारके रत्न, स्त्रियाँ, वाहन, बकरे, भेड़ें, सोनेके अलंकार, सोना और पर्वतोपम गजराज—ये सब मुनिके पीछे-पीछे चले। राजाके सम्पूर्ण मन्त्री भी इन वस्तुओंके साथ थे। उस समय सारा नगर आर्त होकर हाहाकार कर रहा था ॥ ४०-४१ ॥
तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रतोदितौ ।
पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारौ तमूहतुः ॥ ४२ ॥
इतनेहीमें मुनिने सहसा चाबुक उठाया और उन दोनोंकी पीठपर जोरसे प्रहार किया। उस चाबुकका अग्रभाग बड़ा तीखा था। उसकी करारी चोट पड़ते ही राजा-रानीकी पीठ और कमरमें घाव हो गया। फिर भी वे निर्विकारभावसे रथ ढोते रहे ॥ ४२ ॥
वेपमानौ निराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्षितौ ।
कथंचिदूहतुर्वीरौ दम्पती तं रथोत्तमम् ॥ ४३ ॥
पचास राततक उपवास करनेके कारण वे बहुत दुबले हो गये थे, उनका सारा शरीर काँप रहा था; तथापि वे वीर दम्पति किसी प्रकार साहस करके उस विशाल रथका बोझ ढो रहे थे ॥ ४३ ॥
बहुशो भृशविद्धौ तौ स्रवन्तौ च क्षतोद्भवम् ।
ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ४४ ॥
महाराज! वे दोनों बहुत घायल हो गये थे। उनकी पीठपर जो अनेक घाव हो गये थे, उनसे रक्त बह रहा था। खूनसे लथपथ होनेके कारण वे खिले हुए पलाशके फूलोंके समान दिखायी देते थे ॥ ४४ ॥
तौ दृष्ट्वा पौरवर्गस्तु भृशं शोकसमाकुलः ।
अभिशापभयत्रस्तो न च किंचिदुवाच ह ॥ ४५ ॥
पुरवासियोंका समुदाय उन दोनोंकी यह दुर्दशा देखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा था। सब लोग मुनिके शापसे डरते थे; इसलिये कोई कुछ बोल नहीं रहा था ॥ ४५ ॥
द्वन्द्वशश्चाब्रुवन् सर्वे पश्यध्वं तपसो बलम् ।
क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नेह शक्नुमः ॥ ४६ ॥
दो-दो आदमी अलग-अलग खड़े होकर आपसमें कहने लगे—'भाइयो! सब लोग मुनिकी तपस्याका बल तो देखो, हमलोग क्रोधमें भरे हुए हैं तो भी मुनिश्रेष्ठकी ओर यहाँ