भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 533

आँख उठाकर देख भी नहीं सकते ॥ ४६ ॥ अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः । राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ॥ ४७ ॥ 'इन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि भगवान् च्यवनकी तपस्याका बल अद्भुत है। तथा महाराज और महारानीका धैर्य भी कैसा अनूठा है। यह अपनी आँखों देख लो ॥ ४७ ॥ श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेनं समूहतुः । न चैतयोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ॥ ४८ ॥ 'ये इतने थके होनेपर भी कष्ट उठाकर इस रथको खींचे जा रहे हैं। भृगुनन्दन च्यवन अभीतक इनमें कोई विकार नहीं देख सके हैं' ॥ ४८ ॥

भीष्म उवाच

ततः स निर्विकारौ तु दृष्ट्वा भृगुकुलोद्वहः । वसु विश्राणयामास यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ४९ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भृगुकुलशिरोमणि मुनिवर च्यवनने जब इतनेपर भी राजा और रानीके मनमें कोई विकार नहीं देखा तब वे कुबेरकी तरह उनका सारा धन लुटाने लगे ॥ ४९ ॥ तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथादिष्टमथाकरोत् । ततोऽस्य भगवान् प्रीतो बभूव मुनिसत्तमः ॥ ५० ॥ परंतु इस कार्यमें भी राजा कुशिक बड़ी प्रसन्नताके साथ ऋषिकी आज्ञाका पालन करने लगे। इससे मुनिश्रेष्ठ भगवान् च्यवन बहुत संतुष्ट हुए ॥ ५० ॥ अवतीर्य रथश्रेष्ठाद् दम्पती तौ मुमोच ह । विमोच्य चैतौ विधिवत् ततो वाक्यमुवाच ह ॥ ५१ ॥ उस उत्तम रथसे उतरकर उन्होंने दोनों पति-पत्नीको भार ढोनेके कार्यसे मुक्त कर दिया। मुक्त करके इन दोनोंसे विधिपूर्वक वार्तालाप किया ॥ ५१ ॥ स्निग्धगम्भीरया वाचा भार्गवः सुप्रसन्नया । ददानि वां वरं श्रेष्ठं तं ब्रूतामिति भारत ॥ ५२ ॥ भारत! भृगुपुत्र च्यवन उस समय स्नेह और प्रसन्नतासे युक्त गम्भीर वाणीमें बोले—'मैं तुम दोनोंको उत्तम वर देना चाहता हूँ, बतलाओ क्या दूँ?' ॥ ५२ ॥ सुकुमारौ च तौ विद्धौ कराभ्यां मुनिसत्तमः । पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद् भरतसत्तम ॥ ५३ ॥ भरतभूषण! यह कहते-कहते मुनिश्रेष्ठ च्यवन चाबुकसे घायल हुए उन दोनों सुकुमार राजदम्पतिकी पीठपर स्नेहवश अमृतके समान कोमल हाथ फेरने लगे ॥ ५३ ॥ अथाब्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह ।