भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

परंतु उन परम बुद्धिमान् दम्पतिने उनपर क्रोध नहीं प्रकट किया। उन दोनोंके देखते-ही-देखते वे मुनि फिर अन्तर्धान हो गये ।। २३ ।। तथैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा । सभार्यो वाग्यतः श्रीमान् न च कोपं समाविशत् ।। २४ ।। वे श्रीमान् राजर्षि अपनी स्त्रीके साथ उसी तरह वहाँ रातभर चुपचाप खड़े रह गये; किंतु उनके मनमें क्रोधका आवेश नहीं हुआ ।। २४ ।। नित्यसंस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि । शयनानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ।। २५ ।। प्रतिदिन भाँति-भाँतिका भोजन तैयार करके राजभवनमें मुनिके लिये परोसा जाता, अच्छे-अच्छे पलंग बिछाये जाते तथा स्नानके लिये बहुत-से पात्र रखे जाते थे ।। २५ ।। वस्त्रं च विविधाकारमभवत् समुपार्जितम् । न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ।। २६ ।। पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् । सभार्यो मां रथेनाशु वह यत्र ब्रवीम्यहम् ।। २७ ।। अनेक प्रकारके वस्त्र ला-लाकर उनकी सेवामें समर्पित किये जाते थे। जब ब्रह्मर्षि च्यवन मुनि इन सब कार्योंमें कोई छिद्र न देख सके, तब फिर राजा कुशिकसे बोले—'तुम स्त्रीसहित रथमें जुत जाओ और मैं जहाँ कहूँ, वहाँ मुझे शीघ्र ले चलो' ।। २६-२७ ।। तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम् । क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत सांग्रामिको रथः ।। २८ ।। तब राजाने निःशंक होकर उन तपोधनसे कहा—'बहुत अच्छा, भगवन्! क्रीड़ाका रथ तैयार किया जाय या युद्धके उपयोगमें आनेवाला रथ?' ।। २८ ।। इत्युक्तः स मुनी राज्ञा तेन हृष्टेन तद्वचः । च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरंजयम् ।। २९ ।। हर्षमें भरे हुए राजाके इस प्रकार पूछनेपर च्यवनमुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले उन नरेशसे कहा— ।। २९ ।। सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते सांग्रामिको मतः । सायुधः सपताकश्च शक्तीकनकयष्टिमान् ।। ३० ।। 'राजन्! तुम्हारा जो युद्धोपयोगी रथ है, उसीको शीघ्र तैयार करो। उसमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र रखे रहें। पताका, शक्ति और सुवर्णदण्ड विद्यमान हों ।। ३० ।। किङ्किणीस्वननिर्घोषो युक्तस्तोरणकल्पनैः । जाम्बूनदनिबद्धश्च परमेषुशतान्वितः ।। ३१ ।। 'उसमें लगी हुई छोटी-छोटी घंटियोंके मधुर शब्द सब ओर फैलते रहें। वह रथ वन्दनवारोंसे सजाया गया हो। उसके ऊपर जाम्बूनद नामक सुवर्ण जड़ा हुआ हो तथा

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 530, कुल 2566 में से · BharatKosha