महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्यामान् वारणपुष्पांश्च तथाष्टपदिका लताः । तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपतिः ॥ ७ ॥ राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया ॥ ७ ॥
रम्यान् पङ्कजोत्पलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्चापि प्रासादान् शैलसंनिभान् ॥ ८ ॥ कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे। कहीं पर्वत-सदृश ऊँचे-ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे। वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे ॥ ८ ॥
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च ॥ ९ ॥ भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं ॥ ९ ॥
पर्यङ्कान् रत्नसौवर्णान् परार्घ्यास्तरणावृतान् । भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम् ॥ १० ॥ सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे ॥ १० ॥
वाणीवादान् शुकांश्चैव सारिकान् भृङ्गराजकान् । कोकिलान् शतपत्रांश्च सकोयष्टिककुक्कुभान् ॥ ११ ॥ मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहान् जीवजीवकान् । चकोरान् वानरान् हंसान् सारसांश्चक्रसाह्वयान् ॥ १२ ॥ समन्ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं ॥ ११-१२½ ॥
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव ॥ १३ ॥ कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह । न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नृपः ॥ १४ ॥ पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोंके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे ॥ १३-१४ ॥
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् ।