भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 539

हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिवः ।। १५ ।। राजा कभी संगीतकी मधुर ध्वनि सुनते, कभी वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष उनके कानोंमें पड़ता और कभी हंसोंकी मीठी वाणी उन्हें सुनायी देती थी ।। १५ ।।

तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा । स्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु ।। १६ ।। उस अति अद्भुत दृश्यको देखकर राजा मन-ही-मन सोचने लगे—'अहो! यह स्वप्न है या मेरे चित्तमें भ्रम हो गया है अथवा यह सब कुछ सत्य ही है ।। १६ ।।

अहो सह शरीरेण प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् । उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम् ।। १७ ।। 'अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें-आ पहुँचा हूँ ।। १७ ।।

किंचेदं महदाश्चर्यं सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् । एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम् ।। १८ ।। 'यह महान् आश्चर्यकी बात जो मुझे दिखायी दे रही है, क्या है?' इस तरह वे बारंबार विचार करने लगे। राजा इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिप्रवर च्यवनपर पड़ी ।। १८ ।।

तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले । महार्हे शयने दिव्ये शयानं भृगुनन्दनम् ।। १९ ।। मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यंकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ।।

तमभ्ययात् प्रहर्षेण नरेन्द्रः सह भार्यया । अन्तर्हितस्ततो भूयश्च्यवनः शयनं च तत् ।। २० ।। उन्हें देखते ही पत्नीसहित महाराज कुशिक बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े। इतनेहीमें फिर महर्षि च्यवन अन्तर्धान हो गये। साथ ही उनका वह पलंग भी अदृश्य हो गया ।। २० ।।

ततोऽन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् । कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम् ।। २१ ।। तदनन्तर वनके दूसरे प्रदेशमें राजाने फिर उन्हें देखा, उस समय वे महान् व्रतधारी महर्षि कुशकी चटाईपर बैठकर जप कर रहे थे ।। २१ ।।

एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् । क्षणेन तद् वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणाः ।। २२ ।। गन्धर्वाः पादपाश्चैव सर्वमन्तरधीयत । निःशब्दमभवच्चापि गंगाकूलं पुनर्नृप ।। २३ ।।